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फेल-पास से ही मजबूत होगा बच्चा

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

स्कूली बच्चों को पास-फेल करना एक बार फिर चर्चाओं में है. अभी तक, आठवीं तक के छात्र-छात्राओं को फेल नहीं किया जा रहा है. पूर्व कैबिनेट सचिव टी एस आर सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता वाली समिति ने सिफारिश की है कि भविष्य में पांचवीं कक्षा तक ही फेल नहीं किया जाए. छठी से आगे फिर परीक्षाएं हों और विद्यार्थियों को बाकायदा पास-फेल किया जाए.

शिक्षा का मामला है. निश्चित रूप से हर निर्णय बड़े-बड़े शिक्षाविद् बैठकर ही करते होंगे. पहले वाला निर्णय भी उन्हीं का होगा. आगे कोई बदलाव होगा, तो भी उन्हीं का होगा. वे यह कहकर तो बरी हो नहीं सकते कि सब कुछ सरकारों का किया धरा है. उनकी जिम्मेदारी भी, निर्णय लेने वाले राजनेताओं से कम नहीं है. यहां महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर हम शिक्षा प्रणाली में रोज-रोज बदलाव क्यों कर रहे हैं?

आजादी के सैकड़ों-हजारों साल पहले से भारत में परीक्षाओं की परंपरा रही है

आजादी के बाद से नहीं, आजादी के सैकड़ों-हजारों साल पहले से भारत में परीक्षाओं की परंपरा रही है. गुरु तो बिना परीक्षा 'गुरुकुल' से बाहर आने ही नहीं देता था. पढ़ने वाला चाहे राम हो या कृष्ण. कर्ण हो या एकलव्य. सभी की परीक्षा होती थी. सब पास-फेल होते थे. ज्यादा पीछे नहीं जाएं, तो महात्मा गांधी से लेकर जवाहर लाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी तक सब ने परीक्षा के इसी सिस्टम से आगे बढ़कर अपना मुकाम बनाया है.

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फिर समझ नहीं आता, हमारी सरकारें क्यूं देश के बच्चों और उनकी पढ़ाई-लिखाई से खिलवाड़ करना चाहती हैं? वे क्यूं आज के बच्चों को कमजोर मानती हैं? लगता तो ऐसा है जैसे हमारी सरकारें और हमारे राजनेता अपने नकारापन को छिपाने के लिए इस देश के बच्चों को नकारा बनाना चाहते हैं. वे उन्हें शरीर से ही नहीं, दिल-दिमाग से भी कमजोर बनाना चाहते हैं.

जरा आज की दुनिया को देखिए. हमारे हिन्दुस्तानी बच्चे कहां नहीं हैं? अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक, इंजीनियरिंग से लेकर डॉक्टरी तक, हर देश और हर क्षेत्र में अपना जलवा बिखेर रहे हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो अपने आठ साल के कार्यकाल में में कम से कम आठ ही बार इस बारे में चिंता व्यक्त की है. अमेरिकी बच्चों को चेताया है कि, पढ़ो नहीं तो भारतीय बच्चे आ जाएंगे. सारे अमेरिका में छा जाएंगे. सारी की सारी नौकरियां खा जाएंगे.

ये वे बच्चे हैं जो पुरानी व्यवस्था से पढ़कर निकले हैं. बस्ते का बोझ लादकर मीलों पैदल चलते थे. स्कूल में शिक्षकों का प्यार भी पाते और गलती पर डांट और मार भी खाते. सोलह मई को नतीजा आता, तो पास-फेल होते और फिर एक जुलाई को स्कूल खुलते ही अपने आप जाकर अपनी क्लास में बैठ जाते. तब न कोई बच्चे के दुख-तकलीफ की बात करता था न अधिकारों की.

मास्टर जी, एक तमाचा देते तो पिता जाकर दो तमाचे जड़ने का आग्रह कर आता था. शिक्षक का भी एक मात्र काम तब बच्चों को पढ़ाना-लिखाना और गुणवान बनाना होता था. वे रोज स्कूल आते और पूरे समय पढ़ाते थे. आज की तरह ना तो वे खुद गायब होते थे और ना ही सरकार उनकी पच्चीस तरह की ड्यूटियां लगाती थी. आज तो सरकारी स्कूल के शिक्षकों से सरकार बच्चों को पढ़ाने के अलावा सारे काम लेती है. जब वह खुद शिक्षकों को, बच्चों को पढ़ाने नहीं देती, तब परीक्षा क्यों लेने देगी, इसीलिए फेल ही नहीं करने देती.

सवाल यह है कि जब बच्चा बस्ते का बोझ नहीं उठाएगा तब कैसे उसे पढ़ाई का अहसास होगा

अब सवाल यह है कि जब बच्चा बस्ते का बोझ नहीं उठाएगा तब कैसे उसे पढ़ाई का अहसास होगा और कैसे उसके शरीर में ताकत आएगी? जब बच्चे के चांटा मारते या उसे डांटने-फटकारने पर शिक्षक के खिलाफ मुकदमा दर्ज होगा, तब कोई शिक्षक क्यों पढ़ाएगा? और जब यह सब नहीं होगा, नींव ही कमजोर होगी तब कुछ सालों बाद इमारतें कितनी बुलंद होगी, हम अंदाजा ही लगा सकते हैं. सब भरभरा कर गिरेंगी. फिर न अमेरिका में जगह मिलेगी, न ब्रिटेन में. जरा-जरा सी बात पर बच्चे पश्चिमी देशों की तरह हिंसा या आत्महत्या पर उतारू होते दिखेंगे.

इससे पहले कि, बड़े नुकसान की नींव पूरी तरह भर जाए, हमारे राजनेताओं को संभल जाना चाहिए. सबसे पहले उन्हें यह सोचना चाहिए कि क्या वे किसी भी चुनाव में नामांकन पत्र भरने वाले हर व्यक्ति को लोकसभा/राज्यसभा/ विधानसभा अथवा अन्य संस्थाओं में बैठने की इजाजत देंगे? भले वे कितना भी प्रचार कर लें, लेकिन निर्णय तो मतदान और मतगणना से ही होगा. तभी लोकतंत्र मजबूत होगा. इसी तरह शिक्षा व्यवस्था और छात्र तभी मजबूत होंगे, जब बच्चे बस्ते का बोझ उठाएंगे, कमजोरी पर शिक्षक की डांट और मार खाएंगे और समय आने पर परीक्षा में पास-फेल होंगे.

First published: 31 May 2016, 1:36 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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