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15अगस्त को उड़ेगी पतंग, लेकिन ‘चीनी’ मांझे पर बैन नहीं लगाएगी दिल्ली सरकार

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 August 2016, 15:31 IST
(एजेंसी)

राजधानी दिल्ली आगामी पंद्रह अगस्त को 70वें स्वतंत्रता दिवस को धूम-धाम से मनाने की तैयारी कर रही है. दिल्ली वाले इस महापर्व को पतंगबाजी के जरिए मनाते हैं.

इसके साथ ही इस बार भी दिल्ली वालों को संभल कर पंतगबाजी करनी होगी, क्योंकि दिल्ली सरकार ने पतंग उड़ाने में इस्तेमाल किये जाने वाले खतरनाक ‘चीनी’ मांझे पर प्रतिबंध लगाने से हाथ खड़े कर दिए हैं.

दिल्ली सरकार की मजबूरी से पतंग व्यवसायियों के मन में भी निराशा है. पतंग व्यवसायियों ने इससे होने वाले खतरों और आर्थिक नुकसान को देखते हुए दिल्ली सरकार से इसे फौरन प्रतिबंधित करने की मांग की है.

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पुरानी दिल्ली के लाल कुआं इलाके में लगने वाले पतंग बाजार के दुकानदारों का कहना है कि, "इस दिन पतंगबाजी शौक और मनोरंजन के लिए होती है और जब यही शौक जानलेवा हो जाए तो इसे बंद कर देना चाहिए. उनका कहना है कि ‘चीनी’ मांझा बहुत ज्यादा खतरनाक है और सरकार के द्वारा इसे फौरन प्रतिबंधित किया जाना चाहिए."

'इंसान-परिंदों दोनों के लिए जानलेवा'

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर बीते 20 बरस से लाल कुआं में पतंग की दुकान लगाने के लिए जयपुर से आने वाले मोहम्मद जावेद और मोहम्मद खालिद ने बताया, "यह मांझा बहुत ही खतरनाक है. यह मांझा नायलॉन से बनता है और इसमें कांच और लोहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को लगाया जाता है और यह स्ट्रेचेबल भी होता है. यही कारण है कि यह आसानी से नहीं टूटता है और खिंचता जाता है.

उनका कहना है कि यह इंसान और परिंदों दोनों के लिए ही जानलेवा है. दुकानदारों के मुताबिक देसी मांझा सूत से बनता है और यह अगर किसी परिंदे के अंग में फंसता है, तो वह टूट जाता है, लेकिन ‘चीनी’ मांझा जिस अंग में फंसता है, उसे काट के ही रहता है."

उन्होंने कहा कि इस मांझे में लौह कण लगे होने की वजह से बिजली के तारों से टकराने पर यह शॉट कर सकता है और पतंग उड़ाने वाले को करंट लग सकता हैै, जबकि देसी मांझा अटकने पर टूट जाता है.

दुकानदार मोहम्मद निजाम कुरैशी ने कहा, "पतंगबाजी शौक और मनोरंजन के लिए की जाती है और ‘चीनी’ मांझे से पतंग उड़ाना खतरनाक है. जो शौक लोगों के लिए खतरा बने उसे बंद कर देना चाहिए."

'बैन से खुदरा दुकानदारों को नुकसान'

कुरैशी का कहना है, "इस मांझे को बेचना दुकानदारों के लिए भी फायदेमंद नहीं है. इसमें मुनाफा भी बहुत कम है. ‘चीनी’ मांझे की छह रील की एक चरखी (एक रील में करीब एक हजार मीटर) 400 रुपये की आती है, जबकि देसी मांझे की छह रील की चरखी 1800 रुपए तक की आती है."

इस मामले में हथकरघा लघु पतंग उद्योग समिति के (दिल्ली क्षेत्र) के महासचिव सचिन गुप्ता ने कहा, "नायलॉन से बना यह मांझा ‘चीनी’ नहीं बल्कि भारतीय ही है. यह मांझा मशीन से बनता है और इसकी पैकिंग की वजह से लोग इसे ‘चीनी’ मांझा समझते हैं."

उन्होंने कहा, "15 अगस्त से पहले अगर सरकार इसे प्रतिबंधित करती है तो थोक दुकानदारों को इसका नुकसान नहीं होगा, लेकिन खुदरा दुकानदारों को जरूर नुकसान उठाना होगा."

First published: 11 August 2016, 15:31 IST
 
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