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ग्वादर पोर्ट और आर्थिक गलियारा बचाने के लिए पाकिस्तान को चीन देने जा रहा है चार हमलावर ड्रोन

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 July 2020, 10:25 IST

सीमा पर भारत के साथ तनाव के बीच चीन, पकिस्तान को चार सशस्त्र ड्रोनों की आपूर्ति करने की प्रक्रिया में है. एक रिपोर्ट के अनुसार चीन ग्वादर बंदरगाह पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी के नए बेस की सुरक्षा और चीन-पाकिस्तान-आर्थिक गलियारे की सुरक्षा करने के लिए पाकिस्तान को ये ड्रोन देने जा रहा है. ग्वादर, बलूचिस्तान का अत्यधिक अशांत दक्षिण-पश्चिम प्रांत हैं, जहां बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजनाओं में चीन ने 60 बिलियन डॉलर का निवेश किया है.

रिपोर्ट के अनुसार दो प्रणालियों (प्रत्येक में दो ड्रोन और एक ग्राउंड स्टेशन) की आपूर्ति की योजना बीजिंग ने ऐसे समय बनाई है, जब वह संयुक्त रूप से पाकिस्तान के साथ 48 GJ-2 ड्रोन के उत्पादन करने पर काम कर रहा है, जो विंग लूंग II का सैन्य संस्करण है. 48 GJ-2 ड्रोन पाकिस्तान की वायु सेना के लिए चीन ने डिज़ाइन किया है. चीन पहले से ही एशिया और पश्चिम एशिया के कई देशों में टोही और स्ट्राइक ड्रोन विंग लूंग II बेच रहा है और वह सशस्त्र ड्रोन के सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा है.


स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आर्म ट्रांसफर डेटाबेस के अनुसार चीन ने 2008 से 2018 तक कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अल्जीरिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात सहित 12 से अधिक देशों में 163 UAVs वितरित किए थे. इसके विपरीत अमेरिका अपने हाई -एंड वैपन के उपयोग को निर्धारित करने के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया का अनुसरण करता है, चीन के पास ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है.

12 एयर-टू-सतह मिसाइलों से लैस चीन का हमलावर ड्रोन वर्तमान में सीमित सफलता के साथ त्रिपोली में तुर्की समर्थित सरकार के खिलाफ लीबिया में यूएई समर्थित बलों द्वारा उपयोग किया जा रहा है. ड्रोन वार्स के आंकड़ों के अनुसार, लीबिया में पिछले दो महीनों में उनमें से चार को मार गिरा दिया गया है.

लद्दाख में भारत और चीन के बीच तनाव के बीच पाकिस्तान को इसकी आपूर्ति ने भारत को अमेरिका से मीडियम -एल्टीट्यूड लॉन्ग- एंडुरेन्स (MALE) में रुचि व्यक्त करने के लिए प्रेरित किया है. यह ड्रोन न केवल निगरानी और टोही के माध्यम से खुफिया जानकारी एकत्र करता है, बल्कि मिसाइलों या लेजर-निर्देशित बमों के साथ टारगेट का पता लगाता है और नष्ट कर देता है.

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भारतीय नौसेना 30 सी गार्डियन के लिए अमेरिका के साथ बातचीत कर रही है. भविष्य के लिए नई दिल्ली के बाहरी इलाके में भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियां भारत के लिए मध्यम ऊंचाई वाले ड्रोन विकसित करने की प्रक्रिया में हैं. रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन की भी इस साल के अंत तक रूस्तम ड्रोन प्रोटोटाइप के उत्पादन की योजना है.

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First published: 6 July 2020, 10:12 IST
 
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