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पेरिस में मोदी-नवाज की बातचीत से नई शुरुआत की सुगबुगाहट

विवेक काटजू | Updated on: 3 December 2015, 22:28 IST
QUICK PILL
  • 2016 में पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन का न्योता स्वीकार कर प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली बातचीत को आगे बढ़ाने के संकेत दिए हैं.
  • भारत उफा समझौते के आधार पर पाकिस्तान के साथ बातचीत करना चाहता है जबकि पाकिस्तानी सेना इस बात को लेकर नाराज चल रही है कि उफा समझौते में कश्मीर का जिक्र नहीं किया गया है.

30 नवंबर से शुरू हुए पेरिस जलवायु सम्मेलन के लिए फ्रांस पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच करीब तीन-चार मिनट तक बातचीत हुई. हालांकि दोनों पक्षों ने बातचीत के बारे में कोई जानकारी नहीं दी. लेकिन नवाज शरीफ ने इस बात के संकेत दिए कि दोनों ही देश द्विपक्षीय मसलों को लेकर होने वाली बातचीत को आगे बढ़ाना चाहते हैं.

पाक पर साफ नीति का अभाव

कुछ दिनों पहले ही माल्टा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा था कि बिना किसी पूर्व निर्धारित शर्तों के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत होनी चाहिए. दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत फिलहाल रूक गई है. तो क्या इस मुलाकात को बातचीत आगे बढ़ाने की कोशिश मानी जानी चाहिए ?

मोदी अभी तक पाकिस्तान को लेकर कोई साफ नीति नहीं बना पाए हैं. वह स्वाभाविक तौर पर दोनों देशों के बीच के रिश्तों को आगे बढ़ाना चाहते हैं. मई 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में शरीफ को न्योता देकर उन्होंने अपनी इस मंशा को जाहिर कर दिया था.

इसके बाद पिछले साल उन्होंने काठमांडू में नवाज शरीफ से मुलाकात की क्योंकि मार्च महीने में विदेश सचिव एस जयशंकर को पाकिस्तान की यात्रा पर भेजा जाना था.

उफा और पेरिस की बैठक सकारात्मक बातचीत की दिशा में उठाया गया कदम है. मोदी ने अगले साल पाकिस्तान में होने वाली सार्क बैठक में शामिल होने का न्योता स्वीकार कर अपनी मंशा साफ कर दी है.

शरीफ चाहे तो भी पाकिस्तानी सेना उन्हें हुर्रियत को पूरे परिदृश्य से बाहर रखने की छूट नहीं दे सकती

इस बात की संभावना कम ही है कि मोदी अपनी पाकिस्तान यात्रा को सामान्य रखने की कोशिश करेंगे. 2016 में पाकिस्तान में सार्क का अगला सम्मेलन होना है. हालांकि मोदी भारत के प्रति पाकिस्तान की नीतियों को लेकर सख्त रहे हैं.

भारत के खिलाफ माहौल बनाने में पाकिस्तान के राजनीतिक वर्ग के मुकाबले सेना के लोगों की ज्यादा भूमिका रही है. पाकिस्तानी सेना लगातार भारत के लिए मुश्किलें खड़ी करता रही है. शरीफ चाहे तो भी पाकिस्तानी सेना उन्हें हुर्रियत को पूरे परिदृश्य से बाहर रखने की छूट नहीं दे सकती.

उद्योगपतियों का दबाव

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत के उद्योगपति मोदी और शरीफ के बीच होने वाली बातचीत के लिए पर्दे के पीछे काम कर रहे हैं. वास्तव में इस तरह के माहौल का पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल राहिल शरीफ के लिए ज्यादा महत्व नहीं है. इसका महत्व केवल पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के लिए है.

विडंबना यह है कि जनरल राहिल को नवाज शरीफ ने आर्मी चीफ बनाया लेकिन अब राहिल को देश के रक्षक के तौर पर आगे बढ़ाया जा रहा है. जब आर्मी सत्ता में होती है तब पर्दे के पीछे होने वाली बातचीत का मतलब बनता है. परवेज मुशर्रफ के पाकिस्तान के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान ऐसा ही हुआ था.

मौजूदा परिस्थिति में नवाज शरीफ तक पर्दे के पीछे से पहुंचने का कोई मतलब नहीं है. वास्तव में इसका उल्टा असर हो सकता है.

फिलहाल द्विपक्षीय बातचीत को शुरू किए जाने में नवाज शरीफ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सेना को भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच दिल्ली में होने वाली बातचीत के लिए मनाने में विफल रहे हैं. इस बैठक में आतंकवाद पर विशेष रूप से चर्चा की जानी थी जिसके बारे में उफा में सहमति बनी थी.

उफा के संयुक्त बयान में कश्मीर का सीधे तौर पर जिक्र नहीं किए जाने से पाकिस्तानी सेना के बड़े अधिकारी नाराज चल रहे हैं. वह इस बात के लिए दबाव बना रहे हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच होने वाली किसी भी बातचीत में द्विपक्षीय वार्ता को आगे बढ़ाने के अलावा कश्मीर पर भी चर्चा होनी चाहिए.

उफा पर पाक को कायम रखने की जरूरत

पाकिस्तानी सेना की स्थिति को देखते हुए शरीफ के माल्टा में दिए गए बयान को इस तरह से नहीं देखा जाना चाहिए कि आर्मी ने एनएसए स्तर की बातचीत को लेकर अपने रुख से पीछे हट गई है.

बल्कि यह इस बात की तरफ इशारा करता है कि भारत को इस बात की उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि पाकिस्तान उफा के मुताबिक ही चलेगा. जबकि भारत की जरूरत पाकिस्तान को उफा के स्टैंड पर बनाए रखने की है. अगर ऐसा नहीं होता है तो विश्वसनीयता का संकट उत्पन्न हो जाएगा. वहीं भारत को हुर्रियत के मसले पर भी अपनी स्थिति बनाए रखनी चाहिए.

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान को उफा समझौते के लाइन पर बनाए रखने की है

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर होने वाले सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को आमंत्रित किया है. अगले कुछ दिनों में इस सम्मेलन की शुरुआत होने वाली है.

हालांकि यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है कि स्वराज इस बैठक में भाग लेने के लिए इस्लामाबाद जाएंगी या नहीं. ऐसे किसी सम्मेलन से इतर मेजबान देश के साथ बातचीत की परंपरा रही है.

ऐसे में अगर सुषमा स्वराज पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से या विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज से मिलती हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. बातचीत के दौरान कश्मीर मसले को उठाए जाने के बाद भी इस तरह की मुलाकात हो सकती है.

सबसे अहम मसला उफा समझौते पर बने रहने का है. स्वराज बैठक के दौरान इस मसले को लेकर भारत की स्थिति साफ कर सकती हैं. मोदी को यह बात समझनी होगी कि भावावेश के आधार पर नीतियां नहीं बनाई जा सकतीं. हड़बड़ी में लिया गया कोई फैसला टिकाऊ नहीं हो सकता.

काफी लंबे समय से भारतीय नेता पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध बहाल करने को लेकर भावावेश में कदम उठाते रहे हैं. इसकी वजह से दोनों देशों के बीच बातचीत 'कभी हां, कभी ना' की तर्ज पर चलती रही है. इसी कारण भारत में पाकिस्तान पर कोई व्यापक नीति नहीं बन पाई. इसलिए मोदी को पाकिस्तानी सेना की प्रभावी और प्रतिकूल रुख को ध्यान में रखते हुए एक ठोस, टिकाऊ और स्थायी नीति बनानी होगी.

First published: 3 December 2015, 22:28 IST
 
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