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सागर में सड़क बनाकर आपदा को न्योता

निहार गोखले | Updated on: 6 January 2016, 18:40 IST
QUICK PILL
  • तटीय इलाकों में पर्यावरण नियमों के मुताबिक निर्माण कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए किसी सक्षम निगरानी एजेंसी का अभाव होने के बावजूद मुंबई के अरब सागर के तटीय इलाके में सड़क परियोजना को हरी झंडी दी गई है.
  • पर्यावरणविद और तटीय इलाकों में रहने वाले मछुआरे आजीविका संकट का हवाला देते हुए इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं. पर्यावरणविदों का कहना है कि मैंग्रोव की कटाई से शहर में बाढ़ का खतरा बढ़ जाएगा.

मुंबई ने अरब सागर के बिल्कुल करीब पश्चिमी तट पर सड़क बनाने का फैसला कर लिया है. आज से करीब पचास सालों बाद शहर इस फैसले को कैसे देखेगा?

सरकार इस परियोजना को शहर की यातायात समस्या से छुटकारे के तौर पर पेश कर रही है लेकिन हकीकत में यह आपदा साबित हो सकती है. 11,300 करोड़ रुपये की लागत से बन रही यह परियोजना किसी भी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से महंगी है. सबसे ताज्जुब की बात कि इस परियोजना से मुंबई की महज 2 फीसदी आबादी को राहत मिलेगी.

पूरी सड़क परियोजना को मुंबई के पुराने लोगों यानी मछुआरों की पहुंच से बाहर रखा गया है. उन्हें इस बात को लेकर चिंता है कि सड़क बनाने की वजह से मछलियों की संख्या में गिरावट आएगी जो कि पहले से ही कम होती जा रही है. इसके अलावा मछुआरों को अपनी नौका रखने में परेशानी होगी और उनकी आजीविका पर गहरा असर होगा. लेकिन उनकी आवाज को कोई सुनने वाला नहीं है.

पर्यावरण और स्थानीय लोगों की आजीविका पर इस परियोजना की वजह से खतरा मंडरा रहा है. लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है. परियोजना की आलोचना करने वालों में पुर्तगाल के राजदूत भी शामिल हैं जिनका कहना है कि इससे पूरा तट ही तबाह हो जाएगा. वहीं अन्य का कहना है कि इस सड़क परियोजना से बाढ़ का खतरा बढ़ेगा और सांस्कृतिक विरासत को भी नुकसान होगा. सड़क परियोजना शहर के ईको सिस्टम को तबाह कर रख देगी.

क्या है तटीय सड़क परियोजना

परियोजना के तहत मुंबई के पश्चिमी तट पर अरब सागर में सड़क का निर्माण किया जाना है. यह सड़क करीब 35 किलोमीटर लंबी होगी और दक्षिण में नरीमन प्वाइंट से शुरू होकर उत्तर में कांदीवली में खत्म होगी. 

पिछले पांच दशक से इस परियोजना पर विचार किया जा रहा था लेकिन भारत के तटीय सुरक्षा कानूनों की वजह से इस पर काम नहीं हो सका. कॉस्टल रेग्युलेशन जोन नोटिफिकेशन के तहत ऐसे सड़क परियोजना को अनुमति नहीं थी.

महाराष्ट्र की फडनवीस सरकार अब इस परियोजना पर आगे बढ़ने का फैसला कर चुकी है और जून 2015 में पर्यावरण मंत्रालय ने इस अधिसूचना को संशोधित कर दिया. जिसके बाद इन इलाकों में सड़कों के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है. 30 दिसंबर को इस संशोधन को नियम में जोड़ दिया गया.

चिंता का कारण

आलोचकों ने अक्टूबर 2015 में हुए स्वतंत्र पंचाट में अपनी आपत्ति दर्ज की थी. हालांकि अभी तक किसी आलोचक की आपत्ति को अधिसूचना जारी करते वक्त ध्यान में नहीं रखा गया. यहां हम कु वैसी चिंताओं का जिक्र कर रहे हैं जिसे सरकार ने नजरअंदाज कर दिया है:

कितने लोगों को इस सड़क परियोजना से फायदा होगा? सरकार की मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डिवेलपमेंट अथॉरिटी की 2008 के सर्वे के मुताबिक इस परियोजना से शहर की महज 2 फीसदी आबादी को फायदा होगा जिनके पास कार है. जबकि 20 फीसदी लोग ट्रेन से यात्रा करते हैं जबकि 10 फीसदी लोग बस और 60 फीसदी लोग पैदल यात्रा करते हैं.

मुंबई के केआरवी इंस्टीट्यूट फॉर आर्किटेक्चर एंड एनवायरमेंटल स्टडीज के सहायक प्रोफेसर हुसैन इंदौरवाला ने स्वतंत्र पंचाट को दिए गए बयान में कहा, 'यही कारण है कि सड़क पब्लिक गुड की बजाय प्राइवेट एमेनिटी है.' इसके बावजूद इसमें पर जनता का पैसा खर्च किया जाएगा.

मुंबई एन्वायरमेंटल सोशल नेटवर्क के अशोक दातार और सोनाली केलकर की तरफ से दर्ज की गई आपत्ति में कहा गया है कि तटीय सड़क लोकल ट्रेन के बेड़े में एसी ट्रेन शामिल करने के मुकाबले नौ गुणा ज्यादा महंगा है.

उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाली सड़क को बनाने में 11,300 करोड़ रुपये की लागत आएगी और 2 फीसदी लोगों को मदद मिलेगी

वहीं दो अतिरिक्त रेलवे ट्रैक जोड़ने से परिवहन व्यवस्था में 6.6 लाख लोगों को जोड़ने में मदद मिलेगी और बस व्यवस्था में सुधार करने से रोजाना 8 लाख अतिरिक्त यात्रियों को ढोने में मदद मिलेगी.

सरकार की मुंबई हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी ने कई आपत्तियां जताई हैं. इसमें कहा गया है कि कैसे इस परियोजना की योजना बनाते वक्त कई हेरिटेज स्ट्रक्चर को नजरअंदाज किया गया. योजना की वजह से समुदंर का किनारा और मैंग्रोव पूरी तरह से तबाह हो जाएंगे.

डीपीआर के मुताबिक करीब 3 किलोमीटर सड़क का निर्माण मैंग्रोव पर किया जाएगा. इससे शहर में बाढ़ और तूफान का खतरा बढ़ जाएगा. वहीं नए नियम के मुताबिक नष्ट किए गए मैंग्रोव के बदले तीन गुणा अधिक क्षेत्रफल में मैंग्रोव लगाने में कई साल लग जाएंगे. इसके अलावा उन्हें कई अलग-अलग जगहों पर लगाया जाएगा जिससे बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिलेगा.

मछुआरों को इस बात का आशंका है कि मैंग्रोव की कटाई किए जाने से मछलियां तट से काफी दूर चली जाएंगी

कई पर्यावरणविदों की तरफ से आपत्ति जताए जाने के बावजूद सरकार ने इस बात को समझा कि सड़क परियोजना से समंदर की लहरों में रुकावट आएगी लेकिन सरकार ने इसे फिर भी नजरअंदाज कर दिया.

मुंबई के मछुआरों ने मैंग्रोव की कटाई का यह कहते हुए विरोध किया है कि इससे मछलियां तट से दूर चली जाएंगी. इसके अलावा बड़ी नौकाओं के रखने की जगह में अड़चन आएगी. एक अनुमान के मुताबिक इससे कम से कम 35,000 मछुआरों पर असर पड़ेगा जो करीब 23 गांवों में रहते हैं.

वॉचडॉग फाउंडेशन के मुंबई स्थित वकील गॉडफ्रे पिमेंटा ने कहा, 'मुंबई में ऐसे कुछ तटीय इलाके हैं जहां निर्माण कार्य की अनुमति नहीं है. इसमें अक्सा बीच और गोराई शामिल है. सीआरजेड नियमों के मुताबिक पहले इन तटीय इलाकों को ग्रामीण से शहरी इलाके के तौर पर अधिसूचित करना होगा. इसके बाद यहां निर्माण कार्यों को आगे बढ़ाया जा सकता है.'

सीपीआर की प्रोग्राम मैनेजर मीनाक्षी कपूर बताती हैं, 'तटीय सड़क के निर्माण को वैसे समय में अनुमति दी गई है जब पहले से ही पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर चुस्त उपायों का अभाव है. तटीय नियमों की निगरानी के लिए अभी भी निगरानी तंत्र का पूरी तरह से अभाव है.'

First published: 6 January 2016, 18:40 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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