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झारखंड: आदिवासियों को अल्पसंख्यकों पर हमला करने के लिए उकसाया जा रहा है

एन कुमार | Updated on: 21 October 2016, 9:19 IST
(सुमन/कैच न्यूज़ )
QUICK PILL
  • 16 अक्तूबर को संथाल परगना और अगले दिन राज्य के दूसरे छोर गुमला में हुए दो प्रोग्राम एक ख़तरनाक हादसे की तरफ़ इशारा कर रहे हैं. 
  • झारखंड में आदिवासी बनाम मुसलमान के टकराव का प्रयोग किया जा रहा है जिसमें शासन की भूमिका \'संदिग्ध\' है.

16 अक्तूबर को झारखंड के संथाल परगना के सुदूरवर्ती इलाके में बसे लेकिन मशहूर गांव भोगनाडीह में सात राज्यों के करीब 25 हजार आदिवासियों का जुटान हुआ है. भोगनाडीह के आदिवासियों ने यहां स्थापित सिदो-कान्हू की प्रतिमा को दूषित करने की अफ़वाह फैलने के बाद एक शुद्धिकरण कार्यक्रम चलाया था. 

यहां आदिवासियों ने सिदो कान्हू के वंशजों को अपमानित करनेवालों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने और उन्हें फांसी की सज़ा दिए जाने, गैर आदिवासी-आदिवासी समुदाय की महिलाओं के संग विवाह कर कथित फायदा उठाने वालों पर रोक जैसी तमाम मांग उठाई है. 

16 अक्तूबर की सुबह जब हज़ारों की संख्या में यहां आदिवासियों का जुटान पारंपरिक हथियारों के साथ होने लगा तो आनन-फानन में बरहेट थाना क्षेत्र में धारा 144 लगा दी गई. साथ ही, मुख्य आयोजनकर्ता रामकृष्ण सोरेन, जोसेफ सोरेन, नीलू सोरेन, सरकार हांसदा, जमेलियल हांसदा जैसे नेताओं को नजरबंद कर लिया गया. यह आह्वान ऑल इंडिया मांझी परगना, दिसोम मांझी थान, जाहेर थान समिति जैसे कई संगठनों ने किया था. 

ठेंगे पर कानून

यहां 144 को ठेंगे पर रखते हुए, बैरिकेडिंग को तोड़ते हुए आदिवासियों का जुटान हुआ, सिदो कान्हू की प्रतिमा का शुद्धिकरण हुआ, उसके बाद एक विशाल सभा में हुंकार भरी गई और शासन ने नजरबंद नेताओं को न सिर्फ छोड़ा बल्कि सरकारी अफ़सर उन्हें मंच तक लेकर आए और फिर नजरबंद रहे नेताओं ने तीखा भाषण दिया. 

यहां हज़ारों की संख्या में हुए जुटान से मेले जैसा नजारा दिखने लगा. तमाम मुख्य मांगों के अलावा दूसरी जाति से शादी करनेवाले को वोट नहीं देने, आगामी चुनाव से पहले बैठक कर सामूहिक फैसला के आधार पर एकतरफा वोट देने का फैसला लिया जाएगा. इसके अलावा पंचायती राज व्यवस्था खत्म करने और एसपीटी-सीएनटी एक्ट के संशोधन जैसे कई प्रस्ताव पारित किये गए. 

मगर प्रणेता सिदो कान्हू और आदिवासी धर्म के नाम पर हुआ जुटान धीरे-धीरे एक राजनीतिक भीड़ के रूप में बदलता चला गया. पृष्ठभूमि एक माह पहले की है. यहां 15 सितंबर को एक अफ़वाह फैली कि सिदो कान्हू की प्रतिमा पर किसी ने पान थूक दिया है. इसके बाद सिदो कान्हू के वंशजों ने विरोध किया और फिर बरहेट थाने में यहीं के महबूल अंसारी व उनके भाइयों के खिलाफ मामला दर्जकर उन्हें जेल भेज दिया. 

प्रतिमा पर पान थूकने के अलावा इसे तोड़ने की अफ़वाह भी फैली. जंगल में आग की तरह यह अफवाह फैलने के बाद एक महीने तक आदिवासियों के बीच लामबंदी होती रही, फिर 16 अक्तूबर को यह विशाल सभा की गई. 

बढ़ती घृणा

सिदो कान्हू की प्रतिमा का शुद्धिकरण और इस जुटान के नेतृत्वकर्ता दिसोम नाईकी देवा सनम मुरमू कहते हैं कि सिदो कान्हू हमारे लिए भगवान हैं. इनका अपमान हमलोग कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे. भोगनाडीह ही हमारा तीर्थस्थल है, इसे गंदा करनेवाले का समाज से बहिष्कार कर देना चाहिए. 

विस्थापन विरोधी एकता मंच के संयोजक निर्मल टुडू कहते हैं कि हेमंत सोरेन और झामुमो सांसद विजय हांसदा के कारण यह हालात ऐसे बन गए. उन लोगों ने ही शासन को कहकर धारा 144 लगवाई और आदिवासियों को तीर्थस्थल भोगनाडीह जाने से रोकने की साजिश रची. 

16 अक्तूबर को जब भोगनाडीह में आदिवासियों की यह सभा हो रही थी, उसी समय अल्पसंख्यक समुदाय के एक टोले में धार्मिक स्थल के गुंबद टूटने की भी खबर फैली जिसकी मरम्मत प्रशासन ने जल्दबाज़ी में करवा दी. फिलहाल यह ख़बर भी मिल रही है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के पुरूष अभी गांव-टोले से गायब हैं. टकराव अलग रूप ना ले, इस शंका-आशंका को कोई टाल नहीं पा रहा.

शासन की शह?

साहेबगंज में इतिहास के प्राध्यापक प्रोफेसर रंजीत कहते हैं कि एक महीने तक पान थूकने की कथित घटना के बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैलती रहीं, फिर भी शासन इसे शांत नहीं करवा पाया और अब आदिवासियों का यह जुटान हो गया. 

कहीं सबकुछ शासन की शह पर तो नही हुआ? प्रोफेसर रंजीत कहते हैं कि किसके कहने पर हुआ यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन शासन का रवैया ढीला ढाला रहा, यह साफ दिखता है. संथाल परगना के पत्रकार पल्लव कहते हैं कि यह विशुद्ध रूप से राजनीति ही है और अब यहां टकराव की स्थिति बढ़ती जा रही है. 

आदिवासियों का राजनीतिकरण

संथाल परगना में फिलहाल 18 विधानसभा क्षेत्र हैं, जिनमें से पांच पर अभी भाजपा का कब्जा है. तीन संसदीय क्षेत्र हैं, जिनमें से एक पर भाजपा सांसद हैं. यह भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि क्योंकि कभी यहां पार्टी एक-एक विधानसभा सीट के लिए तरसते रहती थी. 

दूसरी ओर झामुमो को लगता है कि झारखंड की राजनीति में अगर उसे बने रहना है कि तो संथाल परगना की जमीन खिकसनी नहीं चाहिए. इसलिए वह भी यहां पूरी तरह सक्रिय है. 

पिछले दिनों आजसू पार्टी के नेता व राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो सिदो कान्हू के वंशजों में से एक लड़के को सौंपने भोगनाडीह पहुंचे थे. यहां उन्होंने कहा था कि सिदो कान्हू के वंशजों में से एक को उन्होंने इंजिनियरिंग की पढ़ाई करवायी है, संथाल परगना इसका ध्यान रखे, आशीर्वाद दे.

कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री रघुवर दास भी भोगनाडीह आये थे. आदिवासियों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने यहां तमाम घोषणाएं कीं.  संथाल को पूरी तरह साधने के लिए ही यहां के ताला मरांडी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया.

अभी ख़बर है कि रघुवर दास एक बार फिर संथाल परगना का दौरा कर सकते हैं. 26 अक्टूबर को बाबूलाल मरांडी भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को यहां बुलाकर धरना प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं. 

आरएसएस की दस्तक

भोगनाडीह में आदिवासियों की भीड़ अल्पसंख्यकों पर हमलावर थी. क्या बिना किसी की शह के इतना बड़ा राजनीतिक जुटान किया गया? सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि शासन की शह पर ऐसा किया गया है और सरकार इन दिनों ऐसे आयोजन और करवाना चाहती है.

अधिकारी कहते हैं कि 16 अक्तूबर के ठीक अगले दिन 17 अक्तूबर को झारखंड के दूसरे छोर पर गुमला जिले में एक आयोजन किया गया. दोनों घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं. 

17 अक्तूबर को गुमला के परमवीर अलबर्ट एक्का स्टेडियम में हिंदू जागरण मंच की ओर से सरना सनातन महासम्मेलन आयोजन हुआ जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार आए. यहां आदिवासियों को जुटाकर उन्होंने भाषण दिया कि सनातन और सरना धर्म एक ही है, जिसे अलग-अलग बताकर तोड़ने की साजिश चल रही है. 

इंद्रेश ने इसके बाद नियंत्रण रेखा पर हुई सर्जिकल स्ट्राइक का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को कई बार चेतावनी दी गयी, क्योंकि हम फसाद नहीं चाहते, दंगा, झगड़ा नहीं चाहते लेकिन पाकिस्तान नहीं माना तो सर्जिकल स्ट्राइक हुई.

इसी तरह गुमला की धरती पर भी धर्मांतरण के खिलाफ हम सबों को मिलकर सर्जिकल स्ट्राइक चलाने की जरूरत है. एक छोर पर बसे गुमला और दूसरे छोर पर बसे संथाल परगना में इन दिनों बहुत कुछ घट रहा है, इसपर नज़र बनाए रखने की ज़रूरत है. 

First published: 21 October 2016, 9:19 IST
 
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