Home » इंडिया » Congress, Akalis fight it out over the legacy of Longowal in Punjab
 

पंजाब विधानसभा चुनावः चंडीगढ़ के बाद कांग्रेस और अकाली अब लोंगोवाल पर भिड़े

राजीव खन्ना | Updated on: 7 February 2017, 8:20 IST

आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पंजाब में ऐसे मुद्दे फिर से बाहर निकल कर आ रहे है, जो पिछले दस सालों में और पंजाब में उग्रवाद के दिनों में बड़े मुद्दे थे.

दो पारम्परिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और अकाली दल इन संवेदनशील मुद्दों पर चुनावी फसल काटने को तैयार हैं और इसी गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा में ये दोनों राजनीतिक प्रतिद्वंदी अकाली नेता संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की विरासत पर अपना-अपना हक जता रहे हैं. 

संत लोंगोवाल को राजीव गांधी के साथ की गई प्रसिद्ध पंजाब संधि के कुछ दिन बाद ही गोली मार दी गई थी. राज्य में पिछले सप्ताह चंडीगढ़ को लेकर काफी खींचतान मची थी, जो कि 1985 में की गई पंजाब संधि का हिस्सा था.

यह विवाद तब खड़ा हुआ जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने चंडीगढ़ के लिए एक स्वतंत्र प्रशासक नियुक्त किया है और बाद में शिरोमणि अकाली दल प्रमुख प्रकाश सिंह बादल के दबाव में उसे हटा दिया.

विधानसभा चुनाव में अभी छह महीने बाकी हैं और दोनों ही दलों ने इस मुद्दे को उछाल दिया है और लगता है चुनाव प्रचार के दौरान इस मुद्दे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे क्योंकि अब भी पंजाब का एक मतदाता वर्ग लोंगोवाल की विचारधरा का अनुयायी है.

लोंगोवाल विचारधारा

इस वर्ष अप्रैल माह में कांग्रेस ने अकाली दल (लोंगोवाल) का अपनी पार्टी में विलय कर बड़ा राजनीतिक कदम उठाया था. अकाली दल (लोंगोवाल) में नरमपंथी सिख शामिल हैं. कांग्रेस के इस दांव से अकाली दल (बादल) सकते में है.

जानकारों का मानना है कि सारे लोंगोवाल समर्थक कांग्रेस में शामिल नहीं हुए हैं क्योंकि इनमें से काफी लोगों का अब तक यह मानना है कि अकाली लोंगोवाल विचारधारा के अधिक नजदीक हैं. इस प्रकार, दोनों दलों को लगता है कि लोंगोवाल की राजनीतिक विरासत पर उनका हक है.

इस बार यह विवाद उस समय उठा जब लोंगोवाल गांव में 20 अगस्त को लोंगोवाल शहीद दिवस के अवसर पर बादल ने कहा कि उनकी मौत की जिम्मेदार कांग्रेस है, जिसने पंजाब संधि का पालन नहीं करके उनकी पीठ में छुरा घोंपा है.

बादल ने कहा, 'संधि के नियम व शर्तें नहीं मानने के कारण ही लोंगोवाल की हत्या हुई. मुख्यमंत्री ने कहा कि लोंगोवाल ने पंजाब में शांति, सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया.' बादल ने कहा कि शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन की सरकार राज्य में संत लोंगोवाल के सिद्धांतों पर ही कार्य कर रही है, जो संत को सच्ची श्रद्धांजलि है. कांग्रेस ने सदा ही अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई है, जबकि शिअद-भाजपा गठबंधन ने हमेशा साम्प्रदायिक सौहार्द्र, भाईचारे के सिद्धांत का पालन किया है.

कांग्रेस का पलटवार

बादल पर तुरंत पलटवार करते हुए कांग्रेस प्रमुख कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, 'बादल के हाथ लोंगोवाल के खून से सने हैं.' उन्होंने कहा, ‘बादल के हाथ संत के खून से सने हैं और वे उनकी शहादत पर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं. इससे न तो उनके पाप धुलेंगे और न ही उनके खून से सने हाथ, क्योंकि उन्होंने संत के साथ धोखा किया था और राजीव-लोंगोवाल संधि का समर्थन नहीं किया था, जो उनकी मौत का कारण बना. या तो उनकी अंतरात्मा मर चुकी है या फिर प्रकाश सिंह बादल की याददाश्त कमजोर हो गई है, वरना वे दूसरों को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं, जबकि दोष खुद उनका है.' 

अमरिंदर सवाल करते हैं, 'क्या अकालियों ने राजीव-लोंगोवाल संधि को खारिज नहीं किया था और क्या उसने लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करके उन्हें भड़काया नहीं था जो संत की शहादत का कारण बना.'

अमरिंदर के मुताबिक बादल ने ही लोंगोवाल को उक्त संधि करने के लिए तैयार किया था लेकिन बाद में अंतिम समय पर वे खुद पीछे हट गए. न केवल वे पीछे हटे बल्कि इस संधि का इतना पुरजोर विरोध किया कि लोगों की संवेदनशील भावनाएं भड़क गईं, जिसकी कीमत संत लोंगोवाल को जान देकर चुकानी पड़ी.

विवाद और गहराया

अकाली दल ने मामले को और बढ़ाते हुए कहा कि लोंगोवाल को राजीव गांधी और उनके साथियों ने धोखा दिया, जो उनकी हत्या के जिम्मेदार हैं. अमरिंदर राजीव गांधी और पूरे गांधी परिवार के ज्यादा नजदीक और विश्वासपात्र थे.

अकाली दल के महासचिव बलविंदर सिंह भुंदर ने कहा, ‘राजीव गांधी ने एक पुण्यात्मा को धोखा दिया. उन्होंने चंडीगढ़ पंजाब को देने का वादा किया था. साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों और संधि के मुताबिक सिखों की बाकी समस्याएं भी सुलझाने का वादा किया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री ने सोच-समझ कर संत को धोखा दिया था, जो हजारों सिखों के नरसंहार के भी दोषी थे. अमरिंदर को इस पूरे मामले में अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए.’

राजीव गांधी के जन्म दिन और लोंगोवाल की शहादत एक ही दिन होने को विचित्र संयोग बताते हुए उन्होंने कहा, ‘यह इतिहास का राजीव गांधी को सबक है.'

भुंदर ने कहा कि बादल ने पार्टी और पंजाबियों को चेताया था कि केंद्र लोंगोवाल को धोखा देगा और कभी संधि नहीं मानेगा और यह सही साबित हुआ, क्योंकि 25-26 जनवरी 1986 को राजीव गांधी चंडीगढ़ को पंजाब को देने के अपने वादे से पीछे हट गए, जबकि अगले ही दिन सुबह चंडीगढ़ हस्तांतरण कार्यक्रम आयोजित किया जाना था, जिसके कार्ड भेजे जा चुके थे.

लोंगोवाल की मृत्यु जिन हालात में हुई, वह आज भी रहस्य है, अमरिंदर को इस संबंध में स्पष्ट वक्तव्य देना चाहिए क्योंकि उस वक्त वे उस सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री थे, जो संत जी के बलिदान पर बनी थी. बादल इस सरकार का हिस्सा नहीं थे. 

पर्यवेक्षकों का मत

रेडियो जर्नलिस्ट शिव इंदर का मानना है कि लोगों के बीच सत्ता परिवर्तन की संभावना को देखते हुए अकाली अब गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं, जैसे लोंगोवाल की हत्या, चंडीगढ़ का हस्तांतरण और पड़ोसी राज्यों के साथ जल बंटवारे का विवाद. उन्होंने कैच से कहा, 'अभी कुछ माह पहले तक लोंगोवाल का परिवार अकालियों पर उनकी विरासत से हटने का अरोप लगा रहा था.

वरिष्ठ राजनीतिक विशेषज्ञ बलजीत बाली कहते हैं, 'बादल लोंगोवाल की हर पुण्यतिथि पर लोंगोवाल की हत्या का मामला उठाते हैं लेकिन इस बार चुनावी साल होने के नाते शोर मच गया है. कांग्रेस ने भी इस अवसर को अकालियों के खिलाफ इसतेमाल कर लिया है. परन्तु एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि अकालियों ने पंजाब संधि का विरोध किया था.'

जब तक चुनाव नहीं हो जाते पंजाब के नेताओं के भाषणों का मुख्य विषय ऐसे ही मुद्दे रहेंगे.

First published: 25 August 2016, 7:49 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी