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केजरीवाल को लगे करेंट से कांग्रेस-भाजपा में छाई खुशी

आकाश बिष्ट | Updated on: 15 June 2016, 22:04 IST

21 आप विधायक जो दिल्ली सरकार द्वारा संसदीय सचिव नियुक्त किये गये थे उनमें प्रवीण कुमार, शरद कुमार, मदनलाल, चरण गोयल, सरिता सिंह, अलका लांबा, नरेश यादव, राजेश गुप्ता, आदर्श शास्त्री, जरनैल सिंह के नाम शामिल हैं.

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के द्वारा लाभ के पद कानून में संशोधन को नामंजूर किये जाने के कारण आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को एक बड़ा झटका लगा है. राष्ट्रपति के संशोधन को नामंजूर करने से दिल्ली सरकार द्वारा आप पार्टी के 21 विधायकों जो संसदीय सचिव नियुक्त किए गए थे उनके भविष्य पर सवाल खड़े हो गये हैं.

दिल्ली सरकार को राष्ट्रपति ने संशोधन को नामंजूर करते हुए पत्र भेजा है. इसके विरोध में आप पार्टी कोर्ट में जाने की तैयारी में है. राष्ट्रपति के संशोधन को नामंजूर करने के साथ ही समाज और सोशल मीडिया में प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई. केजरीवाल ने प्रधानमंत्री पर बरसते हुऐ कहा कि मोदी ने कभी काम नही किया और ना ही किसी को काम करने देंगे.

इसके लिए आप पार्टी की अकुशल, तानाशाही सोच, अलोकतांत्रिक रवैया जिम्मेदार है

कांग्रेस नेता अजय माकन ने अपने ट्वीट में लिखा है कि, "21 आप विधायकों को कार, आॅफिस और अन्य सुविधाएं मुहैया करवाने वाला बिल सिर्फ नैतिक तौर पर ही नही बल्कि कानूनी रूप से भी गलत है. इसलिए बिल नामंजूर हुआ है. हम इसका स्वागत करते है."

वहीं, कानून और संविधान के विशेषज्ञों के मुताबिक राष्ट्रपति द्वारा बिल नामंजूर होने के बाद आप के 21 विधायक स्वत: ही अयोग्य हो गये हैं. अगर ऐसा होता है तो दिल्ली में इन सीटों पर उपचुनाव होंगे. अटकलें हैं कि कांग्रेस और भाजपा में कड़ा मुकाबला हो सकता है. 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस दिल्ली में अपना खाता खोलने में नाकामयाब साबित हुई थी. 

वहीं, भाजपा भी राष्ट्रपति के फैसले से काफी उत्साहित नजर आ रही है. अब भाजपा इस उपचुनाव में अपने आपको मजबूत स्थिति में लाने के अवसर के रूप में देख रही है. फिलहाल दिल्ली विधानसभा में भाजपा के 70 में से सिर्फ तीन विधायक हैं.

भाजपा और विपक्ष के नेता विजेन्द्र गुप्ता ने कहा, "यह केजरीवाल और आप पार्टी की नैतिक हार है. इसके लिए आप पार्टी की अकुशल, तानाशाही सोच और अलोकतांत्रिक रवैया जिम्मेदार है."

दिल्ली उपचुनाव में दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को आप द्वारा हराने के साथ ही उनकी पार्टी के वोटों में बढ़ोत्तरी की उम्मीद है. 

13 मार्च 2015 को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने एक निर्देश जारी करते हुऐ 21 आप विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया था. इन विधायकों को उसी दिन मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा शपथ दिलायी गई थी.

उस वक्त बिल को कानून बनने के लिए सिर्फ राष्ट्रपति की ही मंजूरी की आवश्यकता थी

वर्तमान में आप के पास 70 में से 67 सीटें हैं. जब से ये विवाद सार्वजनिक हुआ है तब से आप पार्टी ये स्पष्ट करने में जुटी है कि विधायकों को कोई पारिश्रमिक नही दिया गया इसलिए ये लाभ के पद की श्रेणी में नही आते. 

राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा (आरएमएम) ने पीआईएल दाखिल कर सरकार के निर्णय को चुनौती दी है. पीआईएल में इसे कानून और संविधान की धारा 239ए का उल्लघंन बताते हुए विधायकों को अयोग्य घोषित किये जाने की मांग की गई है. इस मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को होगी.

दिल्ली सरकार ने 2015 में विवादित बिल संसदीय सचिवों को लाभ के पद से अलग रखने के लिए पारित किया था. उस वक्त बिल को कानून बनाने के लिए सिर्फ राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता थी. जो वर्तमान में नामंजूर कर दी गई है. 

राष्ट्रपति को इसी विषय में एक याचिका भी दी गई है. इस याचिका को राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग में भेजा है जो कि वर्तमान में विचाराधीन है.

2006 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लाभ के पद पर रहने के आरोपों के चलते अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. उन्होंने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का अध्यक्ष पद भी संभाल रखा था. इन आरोपों की वजह से सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और रायबरेली से अपनी लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था.

उस वक्त यूपीए की कांग्रेस सरकार आर्डिनेंस बिल लाने की तैयारी में जुटी थी लेकिन विपक्ष ने कांग्रेस सरकार की मंशा को भाप कर उसे असफल कर दिया. 

क्या अरविन्द केजरीवाल भी सोनिया के नक्शे कदम पर चलेंगें? या वे इस मुद्दे को कोर्ट में ले जायेंगे जहां मामला उनके खिलाफ जाने की पूरी संभावना है.

First published: 15 June 2016, 22:04 IST
 
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