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कांग्रेस का संकट: पुरानी पार्टी और वही पुरानी समस्याएं

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार पर आए संकट के बाद पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट के माध्यम से अपनी चुप्पी तोड़ी. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ‘‘बिहार चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद खरीद-फरोख्त करना और पैसे के दुरुपयोग और ताकत के बल पर चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करना बीजेपी का नया माॅडल है.’’

इसके बाद उन्होंने एक और ट्वीट किया और कहा, ‘‘यह हमारे लोकतंत्र और संविधान पर हमला है. पहले अरुणाचल और अब उत्तराखंड, यही मोदीजी की बीजेपी का असल चेहरा है.’’

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अगर राहुल गांधी को वास्तव में ऐसा लगता है कि यह राजनीतिक संकट बीजेपी की करतूत है तो कांग्रेस कभी यह जानने में सफल नहीं होगी कि अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में उसके विधायक खुद उससे दूर हुए हैं. आने वाले समय में हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल सकता है. इसके अलावा पार्टी मणिपुर में भी असंतुष्ट नेताओं में से एक को राज्य इकाई का अध्यक्ष नियुक्त कर अंदरूनी कलह और असंतोष पर अस्थाई काबू पाने में सफल रही है.

कांग्रेस में निरंतर उभरता इस प्रकार का असंतोष और विरोध इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. दूसरे राजनीतिक दलों की तरह ही कांग्रेस भी वैचारिक जड़ें खोने के बाद अपने काडरों और कार्यकर्ताओं में पैदा हुई राजनैतिक अवसरवादिता से त्रस्त होती जा रही है.

अवसरवाद

पश्चिम बंगाल में वाम दलों के साथ गठबंधन करके कांगेस ने अपने कार्यकर्ताओं को भ्रमित कर दिया है. इसके अलावा पार्टी के पुराने वफादार भी अबतक वैचारिक रूप से विरोध रखने वाले दलबदलुओं को पार्टी में लेने और महत्वपूर्ण पद दिये जाने से असमंजस की स्थिति में हैं.

मूलतः बीजेपी से संबंधित मधुसूदन मिस्त्री को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया जाना, पूर्व में शिव सेना से संबद्ध रहे संजय निरुपम को मुंबई प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त करना और वर्ष 2006 में जनता दल (एस) से अलग होने वाले सिद्धरमैया को कर्नाटक का मुख्यमंत्री नियुक्त करना इस बात के मात्र कुछ उदाहरण भर हैं.

कांग्रेस भी वैचारिक जड़ें खोने के बाद अपने लोगों में पैदा हुई राजनैतिक अवसरवादिता से त्रस्त होती जा रही है

पार्टी को अपना सर्वस्व देने वाले पुराने कार्यकर्ता ऐसे में स्वयं को ठगा हुआ महसूस करते हैं. अगर पार्टी स्वयं ही वैचारिक रूप से अवसरवादी हो तो इस बात का कोई कारण नहीं कि उसके विधायक भी इसी परिपाटी पर न चलें.

इसके अलावा शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच संवादहीनता की स्थिति आसानी से महसूस की जा सकती है. कांग्रेसियों का कहना है कि गांधी परिवार की मौजूदा पीढ़ी के नेता अपनी दादी या पिता की तरह कार्यकर्ताओं से आमने-सामने मिलने से बचते हैं और वे एकाकी रहते हैं. यहां तक कि जब कभी वे उन्हें दर्शन देते हैं तब क्षणिक मुलाकात ही हो पाती है और वे उन्हें दूसरे कर्मचारियों के पास भेज देते हैं.

जाहिर है ऐसे में उनसे मुलाकात में सफल होने वालों में से अधिकतर असंतुष्ट रहते हैं और वे दोबारा उनके पास जाने को तत्पर नहीं होते. उत्तराखंड में कांग्रेस के बागी नेताओं का नेतृत्व करने वाले विजय बहुगुणा ने खुलकर यह बात कही है कि एक तरफ जहां बीते दो वर्षों में वे पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से एक बार मिल पाए हैं वहीं इस दौरान उन्हें राहुल गांधी से मिलने के लिये समय तक नहीं मिल सका.

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यह एक ऐसी पार्टी के लिये अच्छे संकेत नहीं हैं जिसमें शीर्ष नेतृत्व कार्यकर्ताओं को उनके नाम से जानने के लिये मशहूर रहा हो. इसके चलते कार्यकर्ता उनसे अपनी नजदीकी का दिखावा कर सकते थे. नाम से पहचाना जाना और शीर्ष नेतृत्व के साथ निकटता प्रदर्शित होने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि स्थानीय नेतृत्व समूह तैयार करने को तैयार रहता है जिससे पार्टी को स्थापित करने और विस्तार में मदद मिलती है.

बीते समय पर नजर डालें तो ऐसे ही नेताओं के बल पर पार्टी कई राज्यों में नियंत्रण करती आई है.

राहुल गांधी की कार्यशैली

यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है कि पार्टी की राज्य इकाईयों में राहुल गांधी की कोई पकड़ नहीं है और पार्टी कार्यकर्ता उन्हें एक बोझ की तरह समझते हैं.

राहुल गांधी के नेतृत्व में आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) अब आॅल इंडिया कांग्रेस काॅर्पोरेशन का रूप ले चुकी है जहां सोनिया गांधी अध्यक्ष और उनके बेटे प्रबंध निदेशक की भूमिका निभा रहे हैं और कई कर्मचारी उन्हें निरंतर रिपोर्ट करने के लिये तैयार खड़े रहते हैं.

शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच संवादहीनता की स्थिति आसानी से महसूस की जा सकती है

दिल्ली में बैठा करीब 2 दर्जन नेताओं का एक छोटा सा समूह पार्टी को नियंत्रित कर रहा है. सत्ता में आने पर मंत्री पद पाने वाले और सत्ता से बाहर होने पर पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित होने वाले इन चुनिंदा नेताओं को आसानी से पहचाना जा सकता है. चाहे पार्टी सत्ता में हो या न हो ये लोग हमेशा ही सत्ता में होते हैं. एक महासचिव दिल्ली छोड़कर एक राज्य के मुख्यमंत्री का पद ग्रहण कर चुके हैं लेकिन एआईसीसी में अभी भी उनकी नाम पट्टिका और कमरा जस का तस है. इस बात की पूरी संभावना है कि वे कुछ वर्षों बाद दोबारा इसी पद पर आसीन होंगे.

अगर ये नेता लोकसभा के चुनाव में खेत भी हो जाते हैं तो उन्हें बेहद जल्दबाजी में पिछले दरवाजे से राज्यसभा में मनोनीत किया जाता है. उन्हें चुनावों में पार्टी के जीतने या हारने का अधिक फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनकी शक्ति बरकरार रहती है.

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उच्च सदन ऐसे नेताओं या उनके चेलों के लिये घर जैसा हो गया है. उदाहरण के तौर पर एक लोकसभा सांसद को उनका कार्यकाल पूरा होने से 6 महीने पहले ही इस्तीफा दिलवाया गया ताकि उन्हें राज्यसभा भेजा जा सके. इसी प्रकार लोकसभा चुनावों में 2 लाख से भी अधिक मतों से हारने वाले एक नेता को उच्च सदन भेजा गया.

इसके अलावा कभी फिल्मों में कलाकार रहे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 5.7 लाख मतों से हारने वाले को नजदीकी उत्तराखंड से राज्यसभा भेजा गया.

पार्टी में सोनिया गांधी और उनके पुत्र से की कोई जवाबदेही नहीं है और न ही कोई उनसे कुछ पूछने की हिम्मत कर सकता है.

इसके बाद वे लोग आते हैं तो राज्यों और केंद्र के चुनावों के लिये उम्मीदवारों का चयन करते हैं. अधिकतर मामलों में इसका संबंध पैसा कमाने से है वर्ना क्यों कोई ऐसे चुनाव या क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी बनना चाहे जहां हार निश्चित हो?

कांग्रेस को नजदीक से जानने वाले आपको बता सकते हैं कि चुनाव के दौरान प्रत्येक प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिये एक निश्चित रकम दी जाती है. अधिकतर मामलों में इस राशि का एक बड़ा हिस्सा टिकट दिलवाने वाले के हिस्से जाता है और बचा हुआ हिस्सा चुनाव अभियान में फर्जी तरीके से खर्च करते हुए बाकी को प्रत्याशी अपनी जेब के हवाले कर लेता है.

कांग्रेस में सोनिया गांधी और उनके पुत्र से की कोई जवाबदेही नहीं है और न ही कोई उनसे कुछ पूछने की हिम्मत कर सकता है

इसके अलावा विरोधी प्रत्याशी से उसके खिलाफ तेज-तर्रार प्रचार न करने का वायदा करके भी अतिरिक्त पैसा कमा लिया जाता है. ऐसे प्रत्याशी इस पैसे के माध्यम से कार, मकान खरीदने के अलावा शादी तक में प्रयोग करने के लिये मशहूर हैं. वर्ष 2009 में पश्चिमी भारत में चुनावों के ऐन पहले एक वरिष्ठ पार्टी प्रभारी को चुनावों के टिकट बेचने के आरोप में उनके पद से हटाया गया था.

दिल्ली में पार्टी की कमान संभालने वालों के इन्हीं निहित स्वार्थों के चलते पार्टी के संस्थागत तंत्र जो मुख्यतः नियंत्रण रखने, शिकायतें सुनने और पार्टी की राज्य इकाईयों और पार्टी शासित राज्य सरकारों में आपसी प्रतिद्वंदिता से जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाने के लिये जिम्मेदार हैं, निष्क्रिय हो चुके हैं. यह एक जानी-मानी सच्चाई है कि कांग्रेस शासित प्रदेशों के कई केंद्रीय नेता पार्टी के मुख्यमंत्रियों के रहमोकरम पर टिके हुए हैं. उन्हें राज्य स्तर पर पार्टी में चल रही आपसी प्रतिद्वंदिता को दिल्ली में किसी के सामने लाने में कोई रुचि नहीं होती है.

एक कांग्रेसी नेता का कहना है, ‘‘इस पार्टी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अगर यहां कुछ गलत भी हो रहा है तो हमारे सामने ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके सामने अपनी बात कह सकें और सुधारात्मक कार्रवाई की उम्मीद कर सकें.’’ एक और कांग्रेसी कड़वाहट के साथ कहते हैं, ‘‘पार्टी का शीर्ष नेतृत्व एक आत्मकेंद्रित तंत्र के नियंत्रण में हैं जो उन्हें चुनौती देने वाले को सोनिया और राहुल के माध्यम से निबटवा देते हैं. समय के साथ कोई भी उनके रास्ते में आने की हिम्मत ही नहीं करता है.’’

राहुल गांधी बार-बार इस बारे में बात करते हैं कि बिहार चुनाव में हार के बाद कैसे बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है. लेकिन उनकी सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद वे पार्टी की कार्यशैली में कोई भी बदलाव लाने में असफल रहे हैं. इस हार के लिये जिम्मेदार लोग अभी भी केंद्रीय नेतृत्व में शीर्ष पदों पर कब्जा जमाये बैठे हैं. कांग्रेस के अलावा हर राजनीतिक दल प्रत्येक चुनाव में हार या जीत के बाद पार्टी पदाधिकारियों में बदलाव करता है.

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इसका नतीजा यह हुआ है कि पार्टी आत्मकेंद्रित और आत्मसंतुष्ट नेताओं का अखाड़ा बन गई है और इस नीति के चलते नैतिक पतन अपने शीर्ष पर है.

इन सब कारकों के साथ अगर गांधी परिवार के सदस्यों को अपनी ओर आकर्षित करने में अक्षम रहने के बाद राजनीतिक सफलता पाने को तत्पर विधायक, नेता इधर-उधर देखने को मजबूर हो जाते हैं. उन्हें जहां मौका दिखता हैं वहीं चले जाते हैं. और ठीक ऐसा ही कांग्रेस शासित प्रदेशों में भी देखने को मिल रहा है.

अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस की वर्तमान स्थिति के लिये और कुछ नहीं बल्कि उनका अपना कुप्रबंधन जिम्मेदार है. ऐसे में बीजेपी के हाथों तो सिर्फ किस्मत से बटेर ही लग रही है.

First published: 3 April 2016, 8:49 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

एडिटर, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में 25 से ज्यादा सालों का अनुभव. इस दौरान मेल टुडे के संस्थापक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी संपादक, द टेलीग्राफ, दिल्ली के संपादक, एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के संपादक, इंडियन एक्सप्रेस के वॉशिंगटन संवाददाता, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सहायक संपादक के रूप में काम किया.

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