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कांग्रेस वही अपराध कर रही है जिसका आरोप वो भाजपा पर लगाती रही है

पाणिनि आनंद | Updated on: 15 December 2015, 18:18 IST
QUICK PILL
  • संसद के पिछले सत्र की तरह ही मौजूदा शीतकालीन सत्र में भी अब तक कोई सार्थक काम नहीं हो सका है. न ही कोई महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुआ है.
  • कांग्रेस संसद की कार्यवाही को ठप करके जनता के प्रति जिम्मेदारी के संग न्याय नहीं कर रही है. कांग्रेस पार्टी खुद को निशाना बनाए जाने का बहाना बनाकर चुनाव प्रचार मोड में काम कर रही है.
जब संसद के शीतकालीन सत्र में 14 दिसंबर को राज्यसभा में विपक्षी नेता नारे लगा रहे थे तब उप सभापति पीजे कुरियन ने कहा, "कुछ सदस्यों ने सदन को अगवा कर लिया है. आप लोगों ने सदन को अगवा कर लिया है. ये बहुत ही अलोकतांत्रिक और दुर्भाग्यपूर्ण है."

कुरियन के कड़े बयान पर हैरान होने की जरूरत नहीं है. संसद में जारी गतिरोध की स्थिति में किसी मंझे हुए नेता के लिए भी अपना संयम बरकरार रखना मुश्किल होता है. पिछले दो सत्रों से संसद में कोई ठोस कामकाज नहीं हुआ है. कोई महत्वपूर्ण विधेयक पारित नहीं हो सका है.

कांग्रेस के पंजाब से आने वाले सासंद राज्य में हुए हालिया दलित उत्पीड़न की घटनाओं के लिए राज्य सरकार को बर्खास्त किए जाने की मांग कर रहे थे. उनका आरोप था कि जिस फार्महाउस में दो दलितों के हाथ-पैर काटे गए वो अकाली दल (बादल) के एक नेता का है. उनकी मांग थी कि राज्य में अकाली दल की सहयोगी भाजपा घटना की तीखी निंदा करे और विधान सभा को भंग करे.

भाजपा के उस आरोप में काफी दम है कि कांग्रेस जानबूझकर संसद नहीं चलने दे रही है


इस हंगामाखेज विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस को सभी विपक्षी पार्टियों का साथ नहीं मिला. जबकि उनमें से कुछ ने इस घटना के खिलाफ सदन में आधिकारिक तौर पर अपना विरोध भी दर्ज कराया था. बसपा प्रमुख मायावती ने भी राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग की.

उधर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी हालिया पाकिस्तान यात्रा पर सदन में बयान दिया. लेकिन सदन में मच रहे शोरगुल के कारण उसे सुनना मुश्किल था. सुषमा ने जब लोकसभा में बयान देने की कोशिश तो विपक्ष ने सदन से वॉकआउट कर दिया.

भाजपा का दावा है कि कांग्रेस जानबूझकर संसद नहीं चलने दे रही है. आम जनता में भी उसके विचार को समर्थन बढ़ता जा रहा है.

संसद के शीतकालीन सत्र के बस कुछ ही दिन और बचे हैं इसलिए इस बात की कम उम्मीद है कि इस सत्र में भी सदन में कोई सार्थक कार्यवाही हो सकेगी. हो सकता है कि कांग्रेस के मौजूदा रवैये से सदन के बाहर उसकी छवि खराब हो रही हो लेकिन लगता नहीं है कि पार्टी के अंदर किसी को इसकी चिंता है.

कांग्रेस का आरोप है कि सदन की कार्यवाही न चलने के लिए भाजपा सरकार जिम्मेदार है. लेकिन वो अपनी बात को साबित नही कर पा रही

इस पूरे मामले में सबसे सीधा सवाल ये है कि आखिर कांग्रेस ऐसा क्यों कर रही है और इसका राजनीतिक खमियाजा कौन भुगत रहा है?

विधेयक पारित कराने की बात आप भूल भी जाएं तो सदन में किसी विषय पर सार्थक बहस नहीं हो पा रही है. दरअसल इस देश के नागरिकों के लिए ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है.

कांग्रेस सदन के बाहर और अंदर लड़ाई लड़ने के मूड में है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शकील अहमद सदन की कार्यवाही नहीं चलने के लिए सरकार को जिम्मेदार बताते हैं. उन्होंने कैच से कहा, "हम चाहते हैं कि सदन चले. हम चाहते हैं कि विधेयक पारित हों. लेकिन सरकार बहस के लिए नहीं तैयार है. वो जरूरी मुद्दों पर कार्रवाई नहीं करना चाहती."

क्या सदन की कार्यवाही न चलना राष्ट्रीय क्षति नहीं है? इस पर अहमद कहते हैं, "15वीं लोक सभा (2009-2014) में कुल संभावित 1350 घंटों में से भाजपा ने 950 घंटे भी सदन नहीं चलने दिया था."

एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा कहते हैं, "सरकार और विपक्ष के बीच सहयोग को किसी एक मुद्दे तक नहीं सीमित किया जा सकता. विपक्ष से 18 महीनों तक संवाद नहीं करने वाली सरकार अब बस एक विधयेक (जीएसटी) के लिए विपक्ष से बातचीत के लिए आतुर है."

जेटली ने दिया नेहरू का हवाला


सोमवार को भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने फेसबुक पेज पर 'पंडित नेहरू और संसद' नाम से एक नोट लिखा. जेटली ने लिखा, "संसद के पिछले सत्र में कार्यवाही नहीं चल सकी थी. संसद का मौजूदा सत्र पर भी वही तलवार लटक रही है. मौजूदा सत्र में कामकाज न होने देने के लिए हर घंटे एक नया कारण खोज लिया जा रहा है."

जेटली ने नेहरू के बयान को कोट किया जिसमें उन्होंने कहा था, "हम जिस संसद में बैठे हैं वो भारत के संप्रभु अधिकारों की प्रतीक है. इसके ऊपर भारत के प्रशासन की जिम्मेदारी है. इस संप्रभु संस्था का सदस्य होने से बड़ा अधिकार और दायित्व नहीं हो सकता क्योंकि इस देश में रहने वाले विशाल जनसमूह के भाग्य की जिम्मेदारी इस संसद पर है.

हम सभी को हमेशा नहीं तो कभी-कभी जो दायित्व और अधिकार मिले हैं उसे जरूर याद करना चाहिए. हमें सोचना चाहिए कि हम इसके योग्य थे या नहीं, ये अलग विषय है. इन पांच सालों के दौरान हम न केवल इतिहास की सीमारेखा पर खड़े हैं बल्कि इतिहास निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा भी हैं."

सबकी निगाहें अब 19  दिसंबर को अदालत में होने वाली सोनिया गांधी और नेहरू गांधी की पेशी पर है

जेटली ने लिखा है, "जो लोग पंडितजी की विरासत पर दावा करते हैं उन्हें खुद से ये पूछना चाहिए कि वो किस तरह का इतिहास बना रहे हैं."

कांग्रेस ने जेटली के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया. आनंद शर्मा ने पत्रकारों से कहा, "हम हर घंटे नहीं बदल रहे. मोदी सरकार नए मुद्दे खड़े कर रही है और जिन राज्यों में हमारी सरकार है उन्हें अस्थिर करने की कोशिश कर रही है."

शर्मा ने कहा कि गैर-भाजपा शासित राज्यों को जिस तरह 'निशाना' बनाया जा रहा है वो एक गंभीर मुद्दा है और हो सकता है कि कांग्रेस इसपर एक विस्तृत बयान जारी करे.

शर्मा की बात से साफ है कि संसद में हंगामे की एक और वजह दरवाजे पर खड़ी है. यानी सदन की कार्यवाही में गतिरोध बरकरार रहेगा.

आगे क्या हो सकता है?

जीएसटी विधेयक पर बहस नहीं होने देने के पीछे कांग्रेस जो तर्क दे रही है वो अतार्किक नजर आते हैं. पार्टी ने अभी तक ये साफ नहीं किया है कि वो इसपर बहस को तैयार है या नहीं.

जब पार्टी के सांसद राज्यसभा में और संसद के गेट पर विरोध प्रदर्शन में व्यस्त थे. वहीं पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी दिल्ली में झुग्गियां गिराए जाने का विरोध कर रहे थे.

कांग्रेस पर नजर रखने वाले एक प्रेक्षक कहते हैं, "जीएसटी विधेयक के पारित होने की संभावनना शून्य है. अगर ये पारित हो भी गया तो सरकार की तरफ से घोषित तारीख एक फरवरी से लागू नहीं हो पाएगा. इसे लागू करने से पहले दोनों सदनों में पारित करना होगा. उसके बाद एक संविधान संशोधन की जरूरत होगी. इसके लिए इससे जुड़े तीन और विधेयक पारित कराने होंगे. उसके बाद 50 प्रतिशत विधान सभाओं को उसपर सहमति की मुहर लगानी होगी. फिर स्थानीय निकायों और संस्थानों को इसके अनुरूप तैयार करना होगा. ये सब जल्दबाजी में नहीं हो सकता. कांग्रेस को पता है कि निकट भविष्य में इन विधेयकों को पारित कराने का श्रेय उसे नहीं मिलने वाला. इसलिए उसे कोई जल्दी नहीं है."

नेशनल हेरल्ड मामले पर नजर

पूरे देश की निगाहें 19 दिसंबर को राहुल गांधी और सोनिया गांधी की अदालत में होने वाली पेशी पर है. दोनों को नेशनल हेरल्ड मामले में अदालत में हाजिर होना है.

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस चुनाव प्रचार मोड में है. वो खुद को 'निशाना' बनाए जाने और सरकार की किरकिरी कराने वाले कुछ दूसरे मुद्दों को आधार बना रही है.

सदन की कार्यवाही चले या न चले कांग्रेस को इसकी चिंता नहीं है. निजी आक्रोश का असर पार्टी के राजनीतिक निर्णयों पर पड़ रहा है. इसका सीधा असर सदन की कार्यवाही पर पड़ रहा है.

कांग्रेस को ये समझना होगा कि वो वही अपराध कर रही है जिसका आरोप वह पिछले दस सालों के अपने शासनकाल में भाजपा पर लगाती थी.

First published: 15 December 2015, 18:18 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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