Home » इंडिया » Congress is reorienting its political strategy to counter an aggressive BJP in North East
 

नॉर्थ ईस्ट में कांग्रेस की दरकती ज़मीन, क्या संगमा करिश्मा कर पाएंगे?

आकाश बिष्ट | Updated on: 5 November 2016, 7:59 IST
QUICK PILL
  • उत्तर-पूर्व में भीतर के असंख्य बाग़ियों से हिली कांग्रेस हमलावर भाजपा पर पलटवार करने के लिए नए सिरे से तैयारी में जुट गई है. 
  • वजह यह है कि अभी भी कांग्रेस का गढ़ समझे जाने वाले उत्तर-पूर्व में भाजपा अपनी पहचान लगातार कायम करती जा रही है.

असम और अरुणाचल प्रदेश में शिकस्त के बाद देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अब नार्थ-ईस्ट कांग्रेस कमेटी को मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा के चेहरे के सहारे दोबारा ज़िंदा करने के काम में जुट रही है. सात राज्यों वाले इस क्षेत्र में कांग्रेस मेघालय, मणिपुर और मिजोरम में सत्ता में है. 

भाजपा जहां नार्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायन्स (नेडा) के जरिए अपनी जमीन तैयार कर रही है, वहीं कांग्रेस नार्थ-ईस्ट कांग्रेस (एनईसीसी) कमेटी के ज़रिए इसे काउंटर करने की योजना बना रही है. एनईसीसी न सिर्फ़ कांग्रेस शासित राज्यों में अपनी भूमिका निभाएगा बल्कि अन्य राज्यों में अपनी पहचान को मजबूती देगा.

भाजपा की बढ़ती ताक़त

असम के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद भाजपा ने राज्य में अपनी ताक़त दिखाई है. उत्तर-पूर्व में नेडा का पहला कॉन्क्लेव हुआ जिसमें उत्तर-पूर्व के 10 क्षेत्रीय दल शामिल हुए. नेडा के गठन की घोषणा उसी दिन की गई, जिस दिन सर्वानन्द सोनोवाल ने असम के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.

नेडा के लांचिंग की औपचारिक घोषणा करते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दावा किया था कि अब समय आ गया है कि उत्तर-पूर्व को कांग्रेस से मुक्त किया जाए. उन्होंने इसे हकीकत में बदलने के लिए अन्य क्षेत्रीय दलों से समर्थन मांगा था. अपने भाषण में उन्होंने उत्तर-पूर्व राज्यों के बीच समन्व्य बढ़ाने पर जोर दिया था और कहा था नए लांच फोरम का यह मूल उद्देश्य है.

असम में सरकार बनाने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सपने को साकार करने के लिए कड़ी मेहनत करने वाले शर्मा ने कहा था कि नेडा की लांचिंग से यह साबित होता है कि उत्तर-पूर्व का कांग्रेस से मुक्त होना सम्भव है. हमारा ताज़ा एजेंडा मणिपुर और मेघालय में सरकार बनाना है. वहीं भाजपा की इन दोनों राज्यों पर गड़ी निगाह को देखते हुए कांग्रेस ने इन राज्यों में और उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में भी अपनी ज़मीन को मजबूत करने का इरादा किया है. पार्टी इसके लिए अपनी रणनीति को चमकाने-संवारने में लगी है. 

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि क्षेत्र में कई जनजातियां हैं जिनका बाहुल्य है. इनके मुद्दे को आज तक उस तरह नहीं उठाया गया जिस तरह उठाना चाहिए था. हालांकि हमने एनईसीसी को दोबारा ज़िंदा करने का इरादा किया है और इसके लिए एक मंच तैयार कर रहे हैं जहां इन मुद्दों को उठाया जाएगा.

इससे पहले एनईसीसी का उद्देश्य पार्टी को ज़मीन से ऊपर उठाने के लिए प्रेरित करने और उत्तर-पूर्वी राज्यों में विभिन्न चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करने का रहा है. लेकिन पिछले कुछ सालों से एनईसीसी प्रभावहीन होकर रह गई है. ख़ासकर, उस समय से जब कांग्रेस नेता और पुड्डूचेरी के मुख्यमंत्री वी नारायणस्वामी उत्तर-पूर्व के प्रभारी हुआ करते थे.

बड़ी योजनाएं

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी 5 नवम्बर को घोषणा कर संगमा को एनईसीसी का संयोजक बना सकती है. कांग्रेसी दिग्गजों का मानना है कि संगमा में एनीसीसी को लीड करने की क्षमता है. वह विपक्षी दलों द्वारा लाए गए हालिया अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अन्य लोगों को अपने पाले में करने में सफल भी रहे हैं. कांग्रेस के एक कार्यकर्ता का कहना है कि वह युवा हैं. उनकी गिनती बुद्धिमान और चालाक प्रशासक के रूप में होती है.

हालांकि, संगमा और एनईसीसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती मणिपुर में 2017 में होने वाले चुनाव को लेकर होगी जहां कांग्रेस गुटबंदी की इन खबरों सेम रूबरू हो रही है कि चुनाव आते ही कई पदस्थ विधायक भाजपा के पाले में छलांग लगा सकते हैं. मार्च की शुरुआत में कांग्रेस को संकट से उबारने के लिए पर गाइखंगम गंगमेई को हटाकर टीएन हाओकिप को पार्टी का नया अध्यक्ष बनाया गया था, पर इससे भी विद्रोहियों से निपटने में कोई सफलता नहीं मिली.

रैंक में संकट

कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि भाजपा उसके जत्थे में असहमतियों को हवा दे रही है और उसका एनएससीआई (एम) के साथ गुपचुप समझौता है. ये कथित रूप से पार्टी के नागा नेताओं को राज्य में पार्टी छोड़ने के लिए उकसा रहे हैं.

कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि इसी समझ के चलते कुछ नगा नेता अपना पाला बदल सकते हैं. मणिपुर के लगभग 10 विधानसभा क्षेत्रों में नगा नेताओं का वर्चस्व है. उनके जाने से पार्टी को बड़ा धक्का लग सकता है. नगा बाहुल्य क्षेत्रों में हर चीज एनएससीआई (एम) के शिकंजे में है. हाल ही में मणिपुर कांग्रेस के निष्ठावान समर्थक एन बिरेन सिंह ने भाजपा का दामन थाम लिया है. यह सत्तारूढ़ पार्टी के लिए बड़ा धक्का माना जा रहा है.

हालांकि, एक कांग्रेसी नेता ने अंदरुनी बात बताई है कि बिरेन का लड़का हत्या के एक आरोप में फंसा हुआ है जिसकी सीबीआई जांच चल रही है. ऐसे में बिरेन का भाजपा में शामिल होना कोई हैरानी की बात नहीं है.

कांग्रेस को एक और तगड़ा झटका इम्फाल नगर निगम के चुनावों में लगा है. भाजपा ने 27 सीटों में से 10 पर विजय हासिल की है जबकि सबसे पुरानी पार्टी को 12 सीटें मिली हैं. इन नतीजों से कांग्रेस नेतृत्व भाजपा की इस विजय पर सोचने को मजबूर हुआ है. भाजपा को 2011 के चुनाव में केवल एक सीट से ही संतोष करना पड़ा था.

बढ़ती ताक़त

इन धक्कों के बावजूद कांग्रेस का राज्य में मनोबल बढ़ा है. तृणमूल कांग्रेस के सभी चारों विधायक थौनाओजाम श्याम कुमार सिंह, इरेंगबाम इबोहालबी सिंह, कौंथूओजाम सरत सिंह, और ओ. लखोई सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. इन लोगों के शामिल हो जाने से 60 सदस्यीय राज्य विधानसभा में कांग्रेस सदस्यों की संख्या बढ़कर 51 हो गई है.

कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में कड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. राज्य की 126 सीटों में से कांग्रेस केवल 26 पर ही जीत दर्ज करा पाने में सफल रही है.

एक कांग्रेस नेता का कहना है कि हम अपने पार्टी नेताओं से फीडबैक लेकर हार के कारणों का पता लगा रहे हैं. और एक बार जब फीडबैक मिल जाएगा, हम अपने आधार वाले क्षेत्रों को मजबूत बनाने की दिशा में काम करेंगे.

अरुणाचल प्रदेश में भी पार्टी उस समय परेशान हो गई जब मुख्यमंत्री पेमा खांडु के साथ 41 विधायक पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश में शामिल हो गए. पीपुल्स पार्टी का भाजपा के साथ गठबंधन है. पार्टी भविष्य में इन पर क्या कार्रवाई करेगी, कुछ नहीं मालुम. कांग्रेस को इस झटके से उबरना है क्योंकि सिर्फ एक विधायक को छोड़कर उसके सभी विधायक पार्टी छोड़कर चले गए हैं.

मिजोरम में भी कांग्रेस पार्टी के पास प्रचण्ड बहुमत है लेकिन यहां भी वह नेडा के बढ़ते असर से चिन्तित है. नेडा मिजो नेशनल फ्रंट के मुखिया जोरामथांगा से गलबहियां करने में लगी हुई है.

First published: 5 November 2016, 7:59 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी