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बंगाल: दिनोंदिन बढ़ता कांग्रेस का दुर्दिन

सुलग्ना सेनगुप्ता | Updated on: 6 September 2016, 7:53 IST
QUICK PILL
  • आंतरिक कलह के चलते अनबन और सत्तरूढ़ तृणमूल कांग्रेस द्वारा पार्टी सदस्यों को अपनी अोर खींचने की घटनाओं से बंगाल में कांग्रेस की स्थिति लगातार बुरी होती जा रही है.
  • पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का अपने गठबंधन दल वाम मोर्चे के साथ जो आंतरिक झगड़ा और मनमुटाव था, वह अब विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मानस भुइयां को विधानसभा की लोक-लेखा समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के कारण खुलकर सामने आ गया है.

आंतरिक कलह के चलते अनबन और सत्तरूढ़ तृणमूल कांग्रेस द्वारा पार्टी सदस्यों को अपनी अोर खींचने की घटनाओं से बंगाल में कांग्रेस की स्थिति लगातार बुरी होती जा रही है.

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का अपने गठबंधन दल वाम मोर्चे के साथ जो आंतरिक झगड़ा और मनमुटाव था, वह अब विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मानस भुइयां को विधानसभा की लोक-लेखा समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के कारण खुलकर सामने आ गया है. विधानसभा में विपक्ष के नेता अब्दुल मन्नान स्पष्ट रूप से चाहते थे कि सीपीएम के सृजन चक्रवर्ती इस पद को संभालें.

पार्टी के राज्य अध्यक्ष अधीर चौधरी ने केन्द्रीय नेतृत्व से मानस को निलम्बित किए जाने की सिफारिश भी कर दी थी. राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह समेत वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के हस्तेक्षप के बाद भी यह मामला शांत नहीं हो सका है. कहानी का वर्तमान में एक पक्ष यह भी है.

विधानसभा में विपक्ष के नेता अब्दुल मन्नान स्पष्ट रूप से चाहते थे कि सीपीएम के सृजन चक्रवर्ती इस पद को संभालें.

उनके भाई बिकास भुइयां हाल ही में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. बिकास सबंग पंचायत समिति के 22 अन्य कांग्रेस सदस्यों को अपने साथ ले जाने में सफल रहे. इस तरह से 39 सदस्यीय समिति में सत्तारूढ़ पार्टी के प्रतिनिधियों की संख्या बढ़कर 14 से 37 हो गई है. सबंग पश्चिम मिदनापुर विधानसभा क्षेत्र में आता है. यहीं से मानस विधायक हैं.

हालांकि मानस इन सभी घटनाक्रमों पर अडिग से लगते हैं. कुछ ही दिनों पहले उन्होंने मन्नान और धीर पर अनाप-शनाप टिप्पणी की थी. उन्होंने व्यंगात्मक लहजे में कहा था कि दोनों को पद्म भूषण से नवाजा जाना चाहिए. उनके इस कथन से पार्टी का झगड़ा खुलकर सामने आ गया और पार्टी विरोधियों को कांग्रेस पर अंगुली उठाने का मौका मिल गया. उन्होंने राज्य नेतृत्व पर भाजपा के साथ गोपनीय सांठगाठ होने का भी आरोप लगाया.

लोक-लेखा समिति के अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति निश्चित रूप से सत्तारूढ़ दल की ओर से एक भेंट है. उन्होंने दावा किया कि यह सहकारी संघवाद की भावना के अनुरूप है. 

उन्होंने कहा कि मैं केन्द्र सरकार द्वारा सहकारी संघवाद को नष्ट करने के खिलाफ ममता बनर्जी की आवाज को अपना समर्थन दूंगा. यह कांग्रेस का ही एजेण्डा है लेकिन राज्य में हमारे नेता केवल अपना हित साध रहे हैं और वे गुप्त गठजोड़ करने की दिशा में बढ़ते जा रहे हैं.

कमजोर होता कैडर

आंतरिक अनबन इतनी चिन्ताजनक नहीं है. कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को तृणमूल कांग्रेस द्वारा अपनी तरफ खींच लिए जाने से ज्यादा लड़खडा गई है. वास्तव में, कार्यकर्ताओं का पार्टी छोड़कर जाना ही महत्वपूर्ण वजह मानी जा सकती है जिसके चलते कांग्रेस को मुर्शिदाबाद और माल्दा में कई स्थानीय निकायों में सत्तारूढ़ दल से हार का सामना करना पड़ा है.

मुर्शिदाबाद को अधीर का गढ़ माना जाता है. कांग्रेस ने 2013 में मुर्शिदाबाद जिला परिषद की 70 सीटों में से 40 सीटें हासिल की थी. वाम मोर्चे को 27 और टीएमसी को केवल एक सीट पर ही संतुष्ट होना पड़ा था. लेकिन तृणमूल द्वारा अध्यक्ष को अपनी ओर खींच लिए जाने से कांग्रेस की सीटें गिरकर 19 तक आ गईं. वाम मोर्चे को 22 सीटें मिलीं जबकि तृणमूल का स्कोर 29 तक पहुंच गया.

पार्टी छोड़कर जाने वाले लोगों को रोकने के उद्देश्य से अधीर ने अपने गृह नगर बेरहामपुर में एक सम्मेलन किया. सम्मेलन को नाम दिया गया- 'सेव दि कांग्रेस'. लेकिन कांग्रेस अपने तीन विधायकों रबीउल आलम, मनीउल हक और अखरुज्जमान के न आने से खुद ही संकट में पड़ गई. इन लोगों ने सम्मेलन से दूरी बनाई जिससे इन अटकलों को हवा मिली कि ये लोग भी पार्टी छोड़कर जा सकते हैं.

अधीर ने आरोप लाया है कि तृणमूल उनकी पार्टी द्वारा शासित निकाय संस्थाओं के सदस्यों को अपनी तरफ करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है और नागरिक प्रशासन सत्तारूढ़ पार्टी से गलबहियां करते हुए इसे होते देख रहा है. अधीर ने घोषणा की है कि हम किनारे जरूर हो गए हैं लेकिन हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है. मैं अपनी अंतिम सांस तक पार्टी के लिए लड़ूंगा.

हिचकोले खाता दुर्ग

माल्दा, कांग्रेस के कद्दावर नेता एबीए गनी खान चौधरी के समय से ही कांग्रेस का गढ़ रहा है. विपक्षी पार्टी को उस समय गहरा आघात लगा जब सभापति समेत उसके आठ जिला परिषद सदस्य सत्तारूढ़ दल में चले गए. 38 सदस्यीय माल्दा जिला परिषद में तृणमूल को केवल 6 सीटें मिलीं थीं लेकिन कांग्रेस के 8, सीपीएम के 6 और समाजवादी पार्टी के 2 सदस्यों को अपने पाले में कर लेने से उसके पास 22 सदस्यों का बहुमत हो गया है.

कांग्रेस छोड़कर जाने वालों में से एक सौमित्र रॉय कहते हैं कि मैंने पार्टी सांसदों अबु हसीम खान चौधरी और मौसम नूर जो क्रमश: गनी खान के भाई और भतीजी हैं, की निरकुंश और वंशवादी राजनीति का कड़ा विरोध किया था. नूर इन आरोपों के बकवास बताते हुए कहतीं हैं कि जो लोग पार्टी छोड़कर चले गए हैं, वे विश्वासघाती हैं. माल्दा के लोग उन्हें सबके सिखाएंगे. माल्दा कांग्रेस की धरती है.

राजनीतिक विश्लेषक जैसे प्रो. अमोल मुखर्जी कहते हैं कि हालांकि माल्दा जिला परिषद में कब्जे से क्षेत्र में टीएमसी को जड़ें जमाने में मजबूती मिली है. पिछले विधानसभा चुनावों में उसे इस क्षेत्र से एक भी सीट नहीं मिली थी. पार्टी इसे आसानी से नहीं भूलने वाली है. इसके अलावा ममता बनर्जी लम्बा खेल रहीं हैं. वह केवल सत्ता को बनाए नहीं रखना चाहतीं, वह तो बंगाल को 'विपक्ष मुक्त' भी बनाना चाहती हैं.

सचमुच में, तृणमूल कांग्रेस के परिवहन मंत्री सावेन्दु अधिकारी पार्टी के इस उद्देश्य को  स्वीकारते भी हैं. वह कहते हैं कि हम विपक्ष से सभी सीटें हथिया लेंगे क्योंकि कांग्रेस और सीपीएम के लोग अपनी पार्टी की निरंकुशता से ऊब चुके हैं. उधर, सीपीएम के सांसद मो. सलीम का कहना है कि विपक्षी दलों ने टीएमसी की इस योजना को पहचान लिया है. बंगाल को विपक्ष मुक्त बनाकर टीएमसी हमारे लोकतंत्र और संवैधानिक ढांचे को नष्ट करने की कोशिश कर रही है.

कांग्रेस के अब्दुल मन्नान कहते हैं कि हम ममता के कुशासन और टीएमसी में शामिल होने के लिए कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को रिश्वत देने के खिलाफ अभियान छेड़ेंगे. वह कहते हैं कि ममता बनर्जी भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारत की योजना को अप्रत्यक्ष समर्थन देते हुए बंगाल को अस्थिर करने की कोशिश कर रहीं हैं.

First published: 6 September 2016, 7:53 IST
 
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