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गुजरात में बजी मोदी के लिए खतरे की घंटी: निकाय चुनावों में कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन

दर्शन देसाई | Updated on: 3 December 2015, 18:40 IST
QUICK PILL
  • पंचायत चुनाव में कांग्रेस ने जीती 24 और भाजपा ने छह सीटें. पिछली बार कांग्रेस के पास सिर्फ एक और भाजपा की झोली में 30 सीटें आईं थीं. 
  • नरेंद्र मोदी, आनंदी बेन पटेल, राज्य के राजस्व मंत्री, वित्त मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और परिवहन मंत्री की घरेलू मेहसाणा जिला पंचायत की 31 में से 23 सीटें कांग्रेस ने जीतीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को "पंजा" दिखाते हुए निकाय चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन किया है. पार्टी ने जिला और तालुका पंचायत चुनाव में निर्णायक जीत हासिल कर भाजपा के प्रति बढ़ते असंतोष को उजागर किया है. 

पिछले साल ही गुजरात के मतदाताओं ने सभी 26 लोकसभा सीटों पर "कमल" खिलाकर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए निर्णायक मतदान किया था. 

लेकिन केवल डेढ़ वर्ष के भीतर ही गुजरात के गांवों में भाजपा की जमीन सरकने लगी है. हालांकि भाजपा ने छह शहरी नगर निगमों में तो जीत दर्ज की. लेकिन पहले के परिणामों की तुलना में जीत का अंतर बहुत नीचे चला गया है. 

बीते 12 वर्षों के दौरान जब गुजरात में मोदी का बोलबाला था, तब कहा जाता था कि राज्य में उनके नाम पर कहीं से भी चुनाव जीता जा सकता है. 

लेकिन अब यह जुमला पुराना हो गया है. आंकड़े खुद ही एक नई कहानी बयां कर रहे हैं.

तालुका पंचायत (कुलः 230)

2015 2010

भाजपा: 67 150

कांग्रेस: 134 26

जिला पंचायत (कुल: 31)

2015 2010

भाजपा: 6 30

कांग्रेस: 24 1

बेशक गुजरात के शहरी क्षेत्रों में भाजपा अपनी प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब रही लेकिन गांवों में इसके बिल्कुल उल्टे परिणाम सामने आए. छह नगर निगमों में जीत के अलावा पार्टी ने 56 नगर पालिकाओं में से 34 और कांग्रेस ने 11 में जीत दर्ज की.

भाजपा की जीत वाली अहमदाबाद, वड़ोदरा, सूरत, राजकोट, भावनगर और जामनगर की छह नगर निगमों में इसका पहले से ही दबदबा था और यहां जीत की ही उम्मीद की जा रही थी. हालांकि यहां पर भी पार्टी को कुछ नुकसान उठाना पड़ा है. 

उदाहरण के लिए, राजकोट निगम में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी. भाजपा को यहां के 72 में से 38 वार्डों में जीत मिली. जबकि 2010 में भाजपा ने 49 और कांग्रेस ने 10 सीटें जीती थीं. तब कुल सीटों की संख्या 59 थी. 

अहमदाबाद में 2010 में मिली भाजपा की 154 सीटें इस बार 142 पर सिमट गईं. 

पाटीदार आंदोलन का प्रभाव

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गुजरात की बागडोर संभालने वाली आनंदीबेन पटेल की निकाय चुनाव में पहली परीक्षा होनी थी. ऐसा लगता है कि पटेल बुरी तरह इस परीक्षा में असफल हुई हैं. इन नतीजों को भाजपा के खिलाफ पाटीदार आंदोलन के जनमत संग्रह के रूप में देखा गया. 

पाटीदार आंदोलन ने भाजपा को कुएं और खाई की दुविधा में फंसा दिया. एक तरफ, पाटीदार समुदाय के बीच पार्टी का समर्थन घटा तो दूसरी तरफ, पटेलों को खुश करने के लिए की गई राज्य सरकार की कोशिशों से ओबीसी, एससी-एसटी भी नाराज हो गए. 

तमाम लोग कहते हैं कि 1980 के दशक में जब कांग्रेस गुजरात में सत्ता में थी तब वो क्षत्रिय-हरिजन-आदिवासी-मुसलमान मतदाता के फार्मूले पर काम करती थी. गुजरात में जाति आधारित राजनीति की वापसी से कांग्रेस के लिए वह आदर्श स्थिति पुनर्जीवित हो सकती है. हालांकि कांग्रेस इस जीत को एकतरफा बनाने से चूक गई.

इससे पहले भाजपा बैकफुट पर दिखी थी जब उसने चुनाव को टालने की कोशिश की थी. भाजपा ने कहा था कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान के लिए यहां पर कानून एवं व्यवस्था की स्थिति सही नहीं है.

इसके बाद गुजरात उच्च न्यायालय ने कलहग्रस्त जम्मू और कश्मीर का हवाला देते हुए कहा था कि यदि जम्मू-कश्मीर में चुनाव हो सकता है तो गुजरात मेें क्यों नहीं. 

2002 के दंगों के मद्देनजर यह भी एक अजीब संयोग था. उस दौरान जेएम लिंगदोह के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग ने कहा था कि राज्य में चुनाव के लिए अनुकूल माहौल नहीं है, तब मोदी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने इसका विरोध किया था.

मेहसाणा पराजय

भाजपा की हार की सबसे बड़ी मिसाल मेहसाणा जिले से मिलती है. वास्तव में राज्य का यह सबसे वीआईपी जिला है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल, राज्य के राजस्व मंत्री, वित्त मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और परिवहन मंत्री इसी जिले से हैं. तब भी मेहसाणा जिला पंचायत की 31 में से 23 सीटें कांग्रेस ने जीतीं. 

यहां तक की मोदी के गांव वडनगर और पटेल के विसनगर में भी कांग्रेस ने तालुका पंचायत में जीत हासिल की. यह शायद पाटीदार आंदोलन का सीधा असर हो सकता है, जिसका केंद्र मेहसाणा था. 

अब गुजरात में एक स्पष्ट ग्रामीण-शहरी विभाजन दिखने लगा है. कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष दोषी के मुताबिक, ग्रामीण गुजरात के लोगों ने भाजपा पर भरोसा नहीं किया. उन्हें विश्वास है कि चुनाव के नतीजे राज्य और केंद्र सरकार की घोर उपेक्षा के खिलाफ यहां के लोगों का गुस्सा जाहिर करते हैं. 

भाजपा प्रवक्ता आईके जडेजा कहते हैं कि कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाया और वो गांवों में अंसतोष फैलाने में सफल रही. 

यह नुकसान भाजपा को बुरी तरह परेशान कर रहे होंगे, विशेेषकर तब जब पार्टी को हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव और रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट के उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा है.

लगता है 2015  भाजपा के लिए चुनावी पराजय का वर्ष बन गया है.

First published: 3 December 2015, 18:40 IST
 
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