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कमल नाथ विवादः कांग्रेस इतिहास का सबक कैसे भूल गई?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
(कैच)

कांग्रेस पार्टी इतिहास से सबक सीखने को तैयार नहीं है. अप्रैल 2009 में लोक सभा चुनाव से पहले पार्टी को दिल्ली के अपने सात उम्मीदवारों जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के नाम वापस लेने पड़े थे क्योंकि दोनों के नाम सिख दंगों से जुड़े हुए थे. सात साल बाद पार्टी ने फिर वही गलती दुहराई. 

कांग्रेस ने पार्टी के वरिष्ठ नेता कमल नाथ को अगले साल होने वाले विधान सभा चुनावों के मद्देनजर पंजाब का प्रभारी बनाया था. उनकी नियुक्ति का विरोध होने पर कमल नाथ ने अपने नए पद से इस्तीफा दे दिया. विपक्षी दलों द्वारा कमल नाथ पर सिख दंगों में शामिल होने का आरोप लगाया जाता रहा है.

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कमल नाथ के इस्तीफे के बाद कांग्रेस ने बयान जारी करके कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से ये फैसला लिया है, पार्टी ने उन्हें ऐसा करने के लिए नहीं कहा. लेकिन राजनीतिक जानकारों को इसपर यकीन नहीं हो रहा. 

आधिकारिक तौर पर कमल नाथ किसी भी दंगे के अभियुक्त नहीं हैं लेकिन जिस तरह कांग्रेस ने ये फैसला वापस लिया है उससे लगता है कि पार्टी ये मानती है कि कमल नाथ की छवि अभियुक्त की बन चुकी है. इस फैसले से ये भी लगता है कि पार्टी को उनके प्रभारी बनने से आगामी चुनाव में नुकसान की आशंका थी.

हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि पार्टी को ये नुकसान हो चुका है?

पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मारी?

अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव के मद्देनजर प्रदेश प्रभारी महासचिवों की अभी नियुक्ति करना अपेक्षित था. इससे पार्टी को चुनाव की तैयारी करने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा. लेकिन ये समझना मुश्किल है कि पार्टी ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का फैसला क्यों किया?

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सज्जन और टाइटलर की उम्मीदवारी के विरोध से पार्टी को समझ लेना चाहिए कि कमल नाथ की नियुक्ति पर कैसी प्रतिक्रिया हो सकती है. नियुक्ति से पहले नाथ की पंजाब की राजनीति में कोई जगह नहीं थी. न तो वो राज्य में किसी चुनाव प्रचार प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं, न ही चुनाव से जुड़े किसी बड़े फैसले शामिल रहे हैं. सिख दंगे की विभिषिका को जनस्मृति में जगाकर कांग्रेस ने अपने संभावनाओं पर कुठाराघात कर लिया है.

बीजेपी ने दावा किया है कि नाथ के इस्तीफे से सिख दंगों में उनकी भूमिका साबित हो गई है. वहीं आम आदमी पार्टी ने सिख दंगों से जुड़े मामलों को दोबारा खोलने की मांग की है.

कांग्रेस ने बिहार का सबक भूलते हुए असम में स्थानीय दलों से गठबंधन करने में चूक गई

इस पूरे मामले से साफ है कि कांग्रेस ये नहीं समझ पा रही है कि जिन राज्यों में अगले साल चुनाव होने हैं वहां अभी से चुनावी जंग शुरू हो चुकी है.

पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के उभार और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का सामना करने में अक्षम नजर आती रही है.

पंजाब में कांग्रेस की मजबूत उपस्थिति रही है. वो स्थानीय मुद्दों पर बीजेपी को घेर कर चित कर सकती थी. बिहार चुनाव में बीजेपी को मिली हार इसका बड़ा सुबूत है. लेकिन कांग्रेस असम में बिहार का सबक भूल गई.

कांग्रेस ने राज्य में स्थानीय पार्टियों से गठबंधन का मौका खो दिया. पार्टी ने अपने लोकप्रिय हेमंत बिस्वा सर्मा को भी अपने हाथों से फिसल जाने दिया. इन दोनों फैक्टर ने बीजेपी की जीत में बड़ी भूमिका निभाई.

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पंजाब में अकाली दल-बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें राज्य की सत्ताधारी अकाली दल-बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा मिलेगा. वहीं अकाली दल और बीजेपी को उम्मीद है कि वो अपने राष्ट्रीय आभामंडल की मदद से सत्ता विरोधी लहर पर  काबू कर लेगी.

मीडिया खबरों के अनुसार कमल नाथ का चयन कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सलाह से लिया गया था. अगर ये सच है तो पार्टी के लिए ये एक गंभीर चिंता होनी चाहिए क्योंकि उनपर कांग्रेसी की समूची चुनावी रणनीति बनाने का दारोमदार  है. ये फैसला जिस तरह उलटा पड़ा है उससे उनके गेम-प्लान पर सवाल उठेंगे?

प्रशांत किशोर यूपी में भी कांग्रेस के आधिकारिक चुनावी रणनीतिकार  हैं जहां पंजाब की तुलना में बड़ा दांव लगा हुआ है. खबरों के अनुसार यूपी कांग्रेस में किशोर की सलाह पर संगठनात्मक बदलाव किए जाने लगे हैं. अगर यूपी में उनकी सलाह उलटी पड़ गई तो?

First published: 16 June 2016, 10:48 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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