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भारत माता से गऊ माता तक उमड़ता कांग्रेस का हिंदुत्व

चारू कार्तिकेय | Updated on: 21 March 2016, 12:54 IST
QUICK PILL
  • कांग्रेस पार्टी एक-एक\r\nकरके ऐसे मुद्दों को उठा रही\r\nहै और ऐसी शैली में सत्ताधारी दल को जवाब दे\r\nरही है जो स्पष्ट इशारा करते\r\nहैं कि वह बीजेपी को उसी की\r\nभाषा में जवाब देने के प्रयास\r\nकर रही है.
  • महाराष्ट्र की विधानसभा में एमआईएम विधायक वारिस पठान को पूरे सत्र से निलंबित करने का समर्थन दक्षिणपंथ की दिशा में\r\nउठाया गया कांग्रेस का छोटा सा एक कदम था\r\nलेकिन बीते कुछ दिनों में हुई घटनाओं ने इस बदलाव के और\r\nकांग्रेस के दबाव में होने\r\nके स्पष्ट संकेत दे दिये हैं.

इस बात पर शायद ही किसी को शक हो कि देश पर बीते दो बरस से शासन कर रही बीजेपी और उसके सांस्कृतिक सांप्रदायिक साथी देश में फैलते जा रहे उन्माद के लिये पूरी तरह से जिम्मेदार हैं. लेकिन अब समय है जब हमें थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा और कांग्रेस द्वारा निभाई जा रही भूमिका को भी गौर से देखना पड़ेगा.

देश की सबसे पुरानी पार्टी एक-एक करके ऐसे मुद्दों को उठा रही है और ऐसी शैली में जवाब दे रही है जो स्पष्ट इशारा करते हैं कि वह बीजेपी को उसी की भाषा में जवाब देने के प्रयास कर रही है.

इसका प्रारंभ जेएनयू से हुआ जब कांग्रेस पहले-पहल तो छात्रों के नारे लगाने के अधिकार की रक्षा के बहाने मैदान में कूदी लेकिन फिर अपने कदम पीछे हटाकर सिर्फ नारे न लगाने वाले छात्रों के समर्थन में खड़ी रह गई.

अफजल गुरू और कश्मीर को देश से अलग राज्य बनाने की मांग करने वाले कन्हैया कुमार और उमर खालिद के विरोध में एक बड़े तबके के आने के बाद हुए उपहास से बचने के लिये पार्टी को अपने रुख में यह बदलाव करना पड़ा.

अपनी पूर्व स्थिति में बदलाव लाने के दौरान कांग्रेस को न चाहते हुए भी खुद को अंधराष्ट्रभक्तों की कतार में शामिल करना पड़ा और उदार आदर्शों के प्रति अपनी पूर्व की प्रतिबद्धताओं को पीछे छोड़ना पड़ा. हालांकि यह दक्षिणपंथ की दिशा में उठाया गया छोटा सा एक कदम था लेकिन बीते तीन दिनों की तीन घटनाओं ने इस बदलाव के और कांग्रेस के दबाव में होने के स्पष्ट संकेत दे दिये हैं.

महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना के साथ हाथ मिलाना

कांग्रेस ‘‘भारत माता की जय’’ का नारा न लगाने पर अड़े एआईएमआईएम विधायक वारिस पठान को निलंबित करने के मामले में महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी और शिवसेना के साथ खड़ी थी. कांग्रेस देश को अपना राष्ट्रवादी रवैया दिखाने के लिये इतनी उतावली थी कि उसके विधायकों ने बीजेपी के मंत्री एकनाथ खड़गे की एआईएमआईएम विधायक द्वारा माफी मांगने के सुझाव को भी सिरे से ठुकरा दिया.

उनकी इस टिप्पणी और बदले हुए रुख के चलते विपक्ष के नेता और कांगेस विधायक राधाकृष्ण विखे पाटिल को कोई भी गलती से बीजेपी या शिवसेना का विधायक समझ सकता है. कथित तौर पर उनका कहना था, ‘‘कोई हमारी राष्ट्रवादी भावनाओं को ठेस पहुंचाए यह हम बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर सकते. मैं देश का अपमान करने वाले इस सदस्य के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग करता हूं.’’

इस विवाद की शुरुआत संघ प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान से हुई जब उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब ‘‘आज की युवा पीढ़ी को भारत माता की जय कहना सिखाना होगा.’’ एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसके बाद भागवत को चुनौती देते हुए कहा था कि कोई भी उन्हें यह नारा लगाने के लिये बाध्य नहीं कर सकता और यहां तक कि अगर कोई उनके गले पर चाकू भी रख दे तो भी वे यह नारा नहीं लगाएंगे."

क्या भागवत के इस रुख का समर्थन करके और इसके लिये पूरी ताकत से लड़ते हुए कांग्रेस खुद को भागवत के समर्थन में खड़ा नहीं कर रही है?

भोपाल से 'राग राष्ट्रवादी'

पठान के निलंबन के दो दिन बाद कांग्रेस विधायकों ने मध्य प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के साथ हाथ मिलाते हुए ओवैसी के बयानों के विरोध में एक सर्वसम्मत निंदा प्रस्ताव पारित करवाने में अहम भूमिका निभाई. हालांकि यह प्रस्ताव कई मोर्चों पर विरोधाभासों से घिरा हुआ था.

सबसे पहली बात तो यह है कि संसद का एक सदस्य क्या बयान देता है या क्या करता है इससे किसी भी राज्य की विधानसभा का क्या लेना देना हो सकता है? इसके अलावा न तो ओवैसी मध्य प्रदेश से किसी भी प्रकार संबंधित हैं और न ही इस बयान को देने के समय वे मध्य प्रदेश की सीमा में थे.

कांग्रेस विधायकों ने मध्य प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के साथ हाथ मिलाते हुए ओवैसी के बयान के विरोध में सर्वसम्मत निंदा प्रस्ताव पारित करवाया


बीजेपी के बहुमत वाली विधानसभा में कांग्रेस के एक विधायक जीतू पटवारी ने प्रस्ताव को पटल पर रखा था. सबसे हास्यास्पद बात यह रही कि इस प्रस्ताव को रखते समय पटवारी ने देश के पहले प्रधामंत्री जवाहर लाल नेहरू को उद्धृत किया. पटवारी का कथित तौर पर कहना था कि अपनी कृति ‘‘भारत एक खोज’’ में नेहरू ने देश को ‘‘भारत माता’’ कहकर संबोधित किया है.

उन्होंने कहा, ‘‘भारत माता की जय का नारा नहीं लगाना स्पष्ट रूप से भारत माता का अपमान है और पार्टियों से ऊपर उठकर पूरे सदन को इस बयान की निंदा करनी चाहिये.’’ ट्रेजरी और विपक्षी दलों की बेंचों से भी ‘‘भारत माता की जय’’ के नारों के शोर के साथ यह प्रस्ताव पारित हो गया.

गुजरात में गाऊ माता से राष्ट्रमाता

एक तरफ कांग्रेस मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र विधानसभाओं में राष्ट्र को ‘‘भारत माता’’ बनाने में पूरा जोर लगा रही थी वहीं दूसरी तरफ वह गुजरात विधानसभा में गाय को राष्ट्र माता बनाने के लिये पूरा जोर लगा रही थी. गाय को ‘‘राष्ट्रमाता’’ का दर्जा दिलवाने के क्रम में एक गाय संरक्षण संगठन के कार्यकर्ता की आत्महत्या के बाद विपक्षी दल कांग्रेस ने विधानसभा में इस मांग का समर्थन किया.

यहां तक कि इस मामले में बीजेपी के पीछे रहने के बावजूद विपक्ष के नेता शंकर सिंह वाघेला ने इस बात की घोषणा की कि अगर राज्य सरकार गाय को ‘‘राष्ट्रमाता’’ घोषित करने का फैसला करती है तो कांग्रेस इस मामले में पूरी तरह से उसका समर्थन करेगी.

कुछ कांग्रेसी नेताओं ने तो कथित तौर पर गोहत्या के विरोध में नारेबाजी भी की और कुछ समय के लिये विधानसभा से वाॅकआउट भी किया. बाद में संवाददाताओं के साथ बातचीत के क्रम में कांग्रेस विधायकों ने मध्य प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के साथ हाथ मिलाते हुए ओवैसी के बयानों के विरोध में एक सर्वसम्मत निंदा प्रस्ताव पारित करवाने में अहम भूमिका निभाई’’

कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला ने कहा कि अगर गुजरात सरकार गाय को ‘‘राष्ट्रमाता’’ घोषित करेगी तो कांग्रेस उसका समर्थन करेगी


इन सभी घटनाओं का सार यह है कि कांग्रेस अब हिंदू ध्रुवीकरण की उसी राजनीति की राह पर चलने का प्रयास कर रही है जिसपर अबतक बीजेपी और शिवसेना चलती रही हैं. हालांकि पूर्व में भी कांग्रेस ने इन रास्तों पर चलने की कुछ सीमित कोशिशें की हैं लेकिनऐसा प्रतीत होता है कि इस बार वह अपनी सारी ऊर्जा और प्रतिष्ठा इसे अपनाने में लगा रही है.

लोकसभा में पार्टी का घटता हुआ संख्याबल और विभिन्न राज्य विधानसभाओं में उसका घटता हुआ रुतबा उसे हिंदू वोटों की तरफ जाने के लिये मजबूर कर रहा है. लेकिन इस दौड़ में शामिल होने से पहले पार्टी को यह याद रखना चाहिये कि यह रणनीति ऐसा घोड़ा नहीं है जिसपर आप अपनी मर्जी से जब चाहे चढ़ सकें या उतर सकें. अगर जाॅन एफ कैनेडी के 1961 के शब्दों के आधार पर इस रणनीति को परिभाषित करें तो ‘‘जो लोग मूखर्तावश शेर की सवारी करते हैं अंत में खुद उसके सिकार हो जाते हैं."

First published: 21 March 2016, 12:54 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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