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बदलाव जरूरी है, कांग्रेस के पास अब वक्त नहीं है

आकाश बिष्ट | Updated on: 8 June 2016, 23:10 IST
(फाइल फोटो)

कांग्रेस को जल्दी संगठन में फेरबदल करने की जरूरत है जिसका पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद से ही इंतज़ार है. 2014 के लोकसभा चुनाव में शर्मनाक हार के बाद से आत्ममंथन के दौर से गुजर रही कांग्रेस के लिए वरिष्ठ नेता अजीत जोगी और गुरुदास कामत के पार्टी छोड़ने से ये मसला और पेंचीदा हो गया है.

गुजरात और राजस्थान के प्रभारी कामत के इस्तीफे के काफी गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इन दोनों राज्यों में पार्टी बाकी राज्यों से थोड़ा अच्छा कर रही है और कामत का जाना फिर उठ खड़े होने कोशिश में जुटी पार्टी का उत्साह कम करेगा.

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प्रदेश प्रभारी के ना होने से सिर्फ गुजरात और राजस्थान में ही प्रदेश इकाई के प्रभावित होने का खतरा नहीं है बल्कि पत्नी के इलाज़ के लिए विदेश गए पंजाब और हरियाणा के प्रभारी शकील अहमद भी जल्दी वापस नहीं लौटने वाले हैं. पार्टी महासचिव और प्रभारी शकील अहमद की गैरमौजूदगी हरियाणा में बगावत और पंजाब में चुनाव को देखते हुए काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है.

राज्यसभा चुनाव खत्म होते ही कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक की तारीख घोषित हो जाएगी

हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा ने राज्यसभा चुनाव में इनेलो के आरके आनंद को समर्थन के फैसले के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है. ऐसे में प्रदेश प्रभारी के न होने से हालात और बिगड़ सकते हैं. एक वरिष्ठ कांग्रेसी के मुताबिक "शकील अहमद की अनुपस्थिति में पार्टी विधायकों और शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद का कोई जरिया नहीं है. इस कठिन चुनाव के वक्त बगावत की खबरें पार्टी के लिए संकट खड़ा कर सकती है. इसीलिए पार्टी एक पर्यवेक्षक भेजने का विचार कर रही है जिस पर जल्द ही फैसला हो जाएगा."

पुडुचेरी में वी नारायणस्वामी की मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल होने के समय से ही नॉर्थ ईस्ट में भी कोई प्रभारी नहीं है. नारायणस्वामी 6 जून को मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले चुके हैं. इसके बावजूद उत्तर पूर्व के कांग्रेस शासित राज्यों में होती हुई बगावत को पार्टी दर्शक की तरह देख रही है.

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अरुणाचल में कांग्रेस सरकार बागियों की भेंट चढ़ चुकी है और मेघालय एवं त्रिपुरा में भी विद्रोह शुरु हो चुका है. एक पार्टी नेता के अनुसार "बीजेपी नॉर्थ ईस्ट में कांग्रेस मुक्त भारत का अपना एजेंडा तेजी से पूरा करने में जुटी है, ऐसे में पार्टी को जल्द किसी नेता को जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए जिससे कि अरुणाचल वाले हालात फिर से ना बनें. लेकिन हमको उत्तर पूर्व क्षेत्र को समझने वाले नेता की जरूरत है, नारायणस्वामी जैसे नेता की नहीं."

नारायणस्वामी की मुख्यमंत्री पद की रेस में शामिल होने के समय से ही नॉर्थ ईस्ट में भी कोई प्रभारी नहीं है

नेता बताते हैं, "पार्टी में फेरबदल पर जो संशय बना हुआ है उसकी वजह से उन राज्यों में सभी रणनीतियां और कार्यक्रम ठप पड़े हैं जहां अगले साल चुनाव होने हैं. सबसे बड़ा उदाहरण उत्तर प्रदेश के प्रभारी मधुसूदन मिस्त्री का है जो अभी तक नहीं जानते कि वो फेरबदल के बाद प्रभारी रहेंगे या नहीं.

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यूपी में पार्टी का आधार मजबूत करने के लिए ये निर्णय अब तक हो जाना चाहिए था. यदि मिस्त्री या प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री को हटाना है तो प्रभार किसी को दिया जाएगा ताकि ज़मीन पर काम शुरु हो सके. ये बदलाव चुनाव से ठीक पहले नहीं किए जा सकते, इस देरी से सिर्फ पार्टी का नुकसान होगा."

हालांकि पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि संगठन में बदलाव पर अगली कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में फैसला हो जाएगा. जल्दी ही होने वाली इस बैठक में अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी की ताजपोशी भी संभव है. एक कांग्रेस नेता के मुताबिक राज्यसभा चुनाव खत्म होते ही वर्किंग कमेटी की बैठक की तारीख घोषित हो जाएगी. संभवत: बेंगलुरु में होने वाली इस बैठक के साथ चिंतन शिविर भी होगा.

First published: 8 June 2016, 23:10 IST
 
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