Home » इंडिया » Contemporary student movement became a battle ground of identity and power politics
 

राजनीतिक पार्टियां कैंपसों में छद्मयुद्ध लड़ रही है

बद्री नारायण | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • बीएचयू कैंपस कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अखाड़ा हुआ करता था जो अब संकीर्ण राजनीति और हिंदुत्व की राजनीति का अड्डा बन गया है. कैंपस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की गतिविधियां बढ़ गईं हैं. इनका संघ परिवार और भगवा राजनीति से गहरा रिश्ता है.
  • 1960 में समाजवादी और साम्यवादी आंदोलन से छात्रसंघों को मजबूती मिली और इसमें वैचारिक तौर पर बड़े बदलाव आए. मई 1968 में पेरिस यूनिवर्सिटी में छात्रों का हिंसक प्रदर्शन हुआ और यह विरोध पूरी दुनिया में छात्र आंदोलनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना.

मौजूदा समय में देश की छात्र राजनीति कई सवालों के घेरे में है. शिक्षा, रोजगार और छात्रों से जुड़े अन्य मामले फिलहाल दूसरी कतार में जा चुके हैं. 

छात्रसंघ राजनीतिक दलों के अंग की तरह काम करने लगे हैं जो जाति, धर्म और क्षेत्रवाद जैसे मुद्दों पर भटक चुकी है. मसलन हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी, बीएचयू, एएमयू और पटना के छात्रसंघ जाति और धर्म से जुडे़े संवेदनशील मसलों को उठा रहे हैं.

हालांकि बीएचयू स्टूडेंट यूनियन को 1997 में एक दशक के लिए निलंबित कर दिया गया था. लेकिन 2007-08 में इसे छात्रों के अप्रत्यक्ष सहयोग से फिर से बहाल कर दिया गया. यहां पर फिलहाल इसे पूर्ण रूप में बहाल किए जाने की मांग हो रही है. बीएचयू कैंपस कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अखाड़ा हुआ करता था जो अब संकीर्ण राजनीति और हिंदुत्व की राजनीति का अड्डा बन गया है. 

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बड़े नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति और मुस्लिम समुदाय में दखल रही है

देश भर के कैंपसों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की गतिविधियां बढ़ गई है और इनका संघ परिवार और भगवा राजनीति से गहरा रिश्ता है. हैदराबाद यूनिवर्सिटी में 26 वर्षीय पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या चौंकाने वाली रही और इसके पीछे जाति और हिंदुत्व की राजनीति के बीच का संघर्ष जिम्मेदार रहा. 

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का छात्रसंघ भी इससे बचा हुआ नहीं है. एएमयू के बड़े नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति और मुस्लिम समुदाय में दखल रही है. पटना यूनिवर्सिटी की छात्रसंघ की राजनीति से बिहार के कुछ बड़े नेता निकले जिन्होंने 1970 के दशक में छात्र राजनीति को नेतृत्व प्रदान किया.

राजनीति भारी

छात्र राजनीति और उनके मुद्दों में बड़ा बदलाव आया है. यहां यह बताना जरूरी है कि छात्र एक समान समूह का निर्माण करते हैं. ऐसे में छात्रसंघ की राजनीति के पीछे का एकमात्र विचार छात्रों से जुड़े मुद्दों को आगे उठाकर उन्हें यूनिवर्सिटी प्रशासन के सामने रखना था. लेकिन अब यह संगठन सांप्रदायिकता, जातिवाद, गुंडागर्दी और क्षेत्रवाद का केंद्र बन चुका है. 

उस्मानिया यूनिवर्सिटीज के फोरम फॉर प्रोटेक्शन ऑफ यूनिवर्सिटीज का साफ कहना है कि राजनेताओं को देश के कैंपस से दूर रहना चाहिए. एफपीयू ने यूनिवर्सिटी कैंपस के राजनीतिकरण की भी निंदा की. 

संगठन का कहना है कि कैंपस को तार्किक बहस के केंद्र के तौर पर विकसित करना चाहिए और छात्रसंघ को इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद देनी चाहिए. लेकिन छात्रसंघ न तो शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठा रहे हैं और नहीं इस तरह की तार्किक बहस को आगे बढ़ाने में लगे हैं.

यहां यह जानना जरूरी है कि छात्रसंघ की राजनीति ने राष्ट्रीय आंदोलन में जबरदस्त और सकारात्मक भूमिका निभाई. उनका राजनीतिक  मसला और झुकावा जाति, धर्म और संप्रदाय के आधार पर विभाजित नहीं रहा. देशभक्ति और जनगोलबंदी मुख्य मामला हुआ करती थी.

1960 में समाजवादी और साम्यवादी आंदोलन से छात्रसंघों को मजबूती मिली और इसमें वैचारिक तौर पर बड़े बदलाव आए. मई 1968 में पेरिस यूनिवर्सिटी में छात्रों का हिंसक प्रदर्शन हुआ और यह विरोध पूरी दुनिया में छात्र आंदोलनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना. 

पेरिस आंदोलन का भारतीय छात्र आंदोलन पर भी गहरा असर पड़ा. छात्रसंघों ने अपनी आजादी और कैंपस की स्वायत्ता के साथ छात्रों कीे बेहतरी के मुद्दे को उठाते  हुए आंदोलन की शुरुआत की.

1970 और 1980 के दशक में भगवा राजनीति और वामपंथी विचारों की वजह से छात्र आंदोलन में बड़े बदलाव देखने को मिले. इसका असर समाजवाद, कांग्रेस, बीजेपी और वामपंथी संगठनों पर पड़ा. विश्वविद्यालयों मे जाति राजनीति के जोर पकड़ने के साथ ही हिंदुत्व की राजनीति में मजबूती आई. बीएचयू इसका मजबूत गढ़ बना. 

वहीं मुस्लिम विश्वविद्यालयों में इस्लामकि मुद्दों को लेकर मुस्मिल संगठनों ने पैठ बनाई. हिंदुत्व और मुस्लिम छात्र संगठन विश्वविद्यालयों में बेहद सक्रिय रहे हैं. परिणामस्वरुप कैंपस की राजनीति जाति और सांपद्रायिक धु्रवीकरण में बंट गई.

1990 में वी पी सिंह ने मंडल आयोग ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया और इसका जबरदस्त विरोध हुआ. राजीव गोस्वामी ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने के खिलाफ आत्मदाह कर लिया. अब छात्र राजनीति नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ आवाज उठा रही है और इससे छात्र राजनीति के वास्तविक मुद्दे को ठेस लगी है. छात्र राजनीति अब बंटती नजर आ रही है.

इस पूरी प्रक्रिया में छात्र संघ का वास्तविक मुद्दा गायब और हाशिए पर जा चुका है. कभी छात्रसंघ जबरदस्त बहस का मंच हुआ करता था जो अब बेहद संकीर्ण हो चुका है. यहां छात्रों से जुड़े मुद्दों की कोई पहचान नहीं है और नहीं उस पर बातचीत के लिए कोई जगह है.

यूनिवर्सिटीज अब राजनीतिक दलों और राजनीतिक विचारधाराओं के बीच की लड़ाई का अखाड़ा बन गया है. परिणामस्वरुप छात्र शक्ति विभाजित हो गई है. समकालीन छात्र आंदोलन पहचान और शक्ति की राजनीति का संघर्ष क्षेत्र बन चुका है.

First published: 21 February 2016, 7:58 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी