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लॉकडाउन में इंजीनियर की छिनी नौकरी तो बन गया मछुआरा, तीन महीने में ही चल पड़ा बिजनेस

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 September 2020, 13:29 IST

Coronavirus: कोरोना वायरस की वजह से दुनियाभर में हुए लॉकडाउन ने काफी लोगों की जिंदगी पूरी तरह से बदल दी है. लॉकडाउन की वजह से बहुत से लोगों की नौकरी चली गई. इसके अलावा कई लोगों ने अपना जॉब और प्रोफेशन पूरी तरह से बदल दिया. इसमें कई लोग काफी हद तक सफल भी हो गई. ऐसी ही कहानी है एक इंजीनियर की.

उत्तराखंड के उधम सिंह नगर के रहने वाले एक इंजीनियर की कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन की वजह से नौकरी चली गई तो वह अपना पेट पालने के लिए मछुआरा बन गया. इस बीच मात्र तीन महीने में ही चमत्कार हो गया और उनका बिजनेस चल निकला. तीन महीने बाद आज वह अपने इलाके में काफी मशहूर हो गए हैं.

सिडकुल के कारखाने में थे इंजीनियर

विपुल कुमार नामक यह शख्स सिडकुल के एक कारखाने में इंजीनियर के पद पर काम करते थे. वह महीने का लाखों रुपये तनख्वाह उठाते थे, लेकिन कोरोना काल में उनकी नौकरी चली गई. इस  मुश्किल वक्त में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. इसके बाद वह कृषि विज्ञान केंद्र काशीपुर पहुंचे और वहां के वैज्ञानिकों की मदद से अपने छोटे से खेत में उन्होंने मछली पालन का काम शुरू किया.

मछली पालने के तीन महीने में ही उनकी अच्छी खासी आमदानी होने लगी. इसके बाद अपने पूरे जनपद में यह इंजीनियर चर्चा में आ गए हैं. विपुल कुमार अपने इस काम की वजह से बेरोजगारों के लिए प्रेरणास्रोत भी बन गए हैं. 

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विपुल ने बताया कि उनके तालाब में इस वक्त 9000 से ज्यादा मछलियां हैं. ये मछलियां अच्छी तरीके से ग्रो कर रही हैं. अब वह अपना पूरा ध्यान मछलियों में लगाते हैं. उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग की नौकरी से ज्यादा वह अपने इस काम में खुश हैं. यहां किसी बॉस की कोई सुननी नहीं पड़ती है. उन्होंने अपने साथियों को भी स्वरोजगार अपनाने की अपील की है.

तीन महीने में हुई काफी तरक्की 

विपुल ने बताया कि यदि समझदारी से कोई काम किया जाए उसमें तरक्की होनी निश्चित है. विपुल ने रुड़की के एक इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की है. वह रुद्रपुर में सिडकुल की ऑटोमोबाइल कंपनी में इंजीनियर थे. जब लॉकडाउन में इनकी नौकरी गई तो किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले इंजीनियर ने वापस अपने गांव लौटकर अपने पिता का हाथ बंटाना शुरू किया था. इसके बाद वह अब अपना खुद का कारोबार कर रहे हैं. 

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First published: 7 September 2020, 13:29 IST
 
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