Home » इंडिया » Court puts its foot down. 'Saffron terrorist' Sadhvi Pragya to stay in jail
 

एनआईए को नसीहत, खारिज हुई साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की जमानत याचिका

अश्विन अघोर | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने मंगलवार को मुंबई में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जमानत याचिका खारिज कर दी. वह 2008 के मालेगांव बम धमाकों की मुख्य अभियुक्त हैं. इस बम धमाके में सात लोगों की मौत हुई और 101 लोग घायल हो गए थे.

हालांकि एनआईए ने इस केस में प्रज्ञा को मुख्य अभियुक्त माना था, और मकोका के तहत प्रज्ञा के साथ अन्य तेरह लोगों को भी अभियुक्त बनाया था.

13 मई को इस केस की तीसरी चार्जशीट दायर की गई जिसमें एनआईए ने कहा की महाराष्ट्र एटीएस के पास अभियुक्तों पर मकोका लगाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं है. 30 मई को प्रज्ञा के वकील ने साध्वी के ऊपर से मकोका हटाने और जमानत के लिए याचिका दायर की थी. कोर्ट ने एनआईए की याचिका पर प्रतिक्रिया करते हए 28 जून को सुनवाई की.

इस धमाके में अपने बेटे को खो चुके मालेगांव के एक व्यापारी निसार अहमद ने साध्वी प्रज्ञा की जमानत याचिका के विरोध में 17 जून को एक अन्य याचिका दायर की. सुनवाई के दौरान निसार के वकील वाहब खान ने प्रज्ञा की जमानत याचिका के विरोध में मजबूती से अपने तर्क प्रस्तुत किए. वहीं एनआईए ने कहा कि, उन्हें जमानत से कोई आपत्ति नहीं है.

तथ्यों और तर्कों पर विचार करने के बाद, अदालत ने जमानत याचिका खारिज कर दी. अदालत ने इस मामले में एनआईए की खिंचाई करते हुए कहा कि उसने जांच में लापरवाही की और सबूत इकट्ठा करने में हीलाहवाली की.

बाद में मीडिया से बात करते हुए वहाब खान ने दावा किया कि अदालत द्वारा जमानत याचिका खारिज करने के बाद से एनआईए पर भारी दबाव है. उन्होंने कहा कि, “यह एनआईए की बड़ी हार है. प्रज्ञा को जमानत देने का मतलब होता कि केस के जुड़े अन्य अभियुक्तों को भी आधार पर जमानत देनी पड़ती और यह मामला फिर लंबे समय तक घिसटता रहता. पहले से ही इस केस को आठ साल हो चुके है, मामला अभी भी लंबित चल रहा है. अभियुक्तों को जमानत मिलने से केस की सुनवाई पूरा होने में काफी समय लगता. कोर्ट ने जांच में लापरवाही के लिए एनआईए की काफी खिंचाई भी की.”

कोर्ट की सुनावाई में मौजूद एक अन्य वकील ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि न्यायाधीश एसडी टेकाले ने एनआईए की निंदा न करते हुए साधारण तौर पर एनआईए को बताया कि 'जमानत के लिए दिए गए आधार पर्याप्त नहीं हैं. हालांकि एनआईए ने प्रज्ञा की जमानत याचिका का विरोध नहीं किया था. कोर्ट ने कहा कि प्रज्ञा को जमानत मिलने पर जांच प्रभावित हो सकती है.”

वहाब खान ने जोर देते हुए कहा कि, “कोर्ट द्वारा की गई निंदा से कहीं अधिक अच्छा यह है कि प्रज्ञा की जमानत याचिका खारिज हो गई. इससे यह स्पष्ट होता है कि केस से जुड़े अन्य अभियुक्त भविष्य में जमानत याचिका के लिए प्रयास नहीं करेंगे.”

यह केस 29 सितंबर 2008 के मालेगांव भीकू चौराहे पर बम धमाके का है. इस केस की प्रारंभिक जांच महाराष्ट्र एटीएस द्वारा की गई, जिसका नेतृत्व स्व. हेमंत करकरे ने किया था. जांच में पता चला कि धमाके में प्रयोग की गई मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा की थी.

इससे मिले सबूतों के आधार पर एटीएस को हिंदू उग्रपंथी दल अभिनव भारत के बारे में पता चला. इसके लोग कथित तौर पर आतंकवादी साजिश में शामिल थे. इस मामले में एटीएस ने एक सेवारत सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, एक सेवानिवृत्त मेजर रमेश उपाध्याय और एक स्वघोषित हिंदू शंकराचार्य सुधाकर द्विवेदी के अलावा प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार किया था.

एटीएस ने इस केस की पहली चार्जशीट 20 जनवरी 2009 को और दूसरी चार्जशीट 21 अप्रैल 2011 में दायर की जिसमें 14 लोगों को अभियुक्त बनाया गया. जिनमें साध्वी प्रज्ञा, रमेश उपाध्याय, प्रसाद परोहित, समीर कुलकर्णी, राकेश धावड़े, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी, परवीन ताकालकी जेल में हैं. शिवनारायण कालसांगरा, श्याम साहू, राजा राहीरकर, और जगदीश म्हात्रे जमानत में बाहर हैं, वहीं रामचंद्र कालसांगरा और संदीप बांगे फरार हैं. साल 2011 में इस केस की जांच एनआईए को सौंपी गई था.

First published: 30 June 2016, 7:55 IST
 
अश्विन अघोर @catchnews

मुंबई स्थित स्वतंत्र पत्रकार

पिछली कहानी
अगली कहानी