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क्रिकेट के जरिये नफरत बढ़ाने की सियासत

सौरव दत्ता | Updated on: 27 March 2016, 9:08 IST
QUICK PILL
  • भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच के दौरान अक्सर मुसलमानों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है.
  • पिछले कई मैचों के दौरान ऐसे कई वाकये हुए हैं जब पाकिस्तान के समर्थन में नारा लगाए जाने के मामले में मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार तक किया गया है.
  • ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट को शांति बहाली के उपकरण के तौर पर देखते हैं. लेकिन सिर्फ यही सच नहीं है. ऐसे भी लोग हैं जो इसका इस्तेमाल नफरत भड़काने के लिए करते हैं.

गिडन हेग लिखते हैं, 'क्रिकेट हर तरह से राष्ट्रवाद है.' हेग खेल इतिहासकार हैं. जब भारत के लोग राष्ट्रवाद  की बहस में उलझे हुए हैं तब हेग के शब्दों की अहमियत को समझा जा सकता है.

पिछले हफ्ते भारत और पाकिस्तान के बीच मैच हुआ. इस दौरान बेंगलुरू यूनिवर्सिटी में बी कॉम की पढ़ाई कर रहे दो छात्रों साफवान और अब्दुल रशीद को पुलिस ने बुलाया और उनसे आईपीसी की धारा 107 के तहत बेहतर बर्ताव करने का बॉन्ड भरवाया. उनका कथित अपराध यह था कि उन्होंने मैच के दौरान व्हाट्सएप पर दो संदेश 'जय पाकिस्तान' और 'पाकिस्तान जिंदाबाद' को प्रसारित किया.

मामले की शिकायत पुत्तुर तालुका के कृष्णा प्रसाद ने की जो विश्व हिंदू परिषद की पुत्तुर ईकाई के प्रमुख हैं. सवाल उठता है कि अगर दोनों लड़के हिंदू होते तो क्या पुलिस उतनी ही तत्परता से कार्रवाई करती?

वफादारी पर सवाल

यह अपने आप में एकमात्र मामला नहीं है. क्रिकेट के जरिये अक्सर भारतीय मुसलमानों की वफादारी को जांचा और परखा जाता है.

पिछले साल मार्च में भारत और पाकिस्तान का एडीलेड में मैच था और इस दौरान मेरठ में 67 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तार किए गए सभी छात्र मुस्लिम थे और उन्होंने मैच के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाए थे.

2003 में कोलकाता पुलिस के बड़े अधिकारियों ने शहर के मुसलमानों को पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने से रोकने के लिए इंतजाम किए. गुजरात के अहमदाबाद में पाकिस्तान के खिलाफ भारत के मैच जीतने के बाद मुसलमानों पर हमला हुआ. अहमदाबाद शहर दंगों में बुरी तरह प्रभावित रहा था.

उत्पीड़न का तरीका

ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट को शांति बहाली के उपकरण के तौर पर देखते हैं. लेकिन सिर्फ यही सच नहीं है. ऐसे भी लोग हैं जो इसका इस्तेमाल नफरत भड़काने के लिए करते हैं.

1968 में इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी के प्रेसिडेंट एवरी ब्रुंडेग ने कह दिया था कि 'खेल राजनीति से बड़ा है.' क्रिकेट भले ही ओलंपिक जितना बड़ा नहीं हो लेकिन ब्रुंडेंग की तुलना जब शपूरजी सोराबजी से की जाती है तो वह खोखला नजर आता है. सोराबजी भारत के पहले क्रिकेट इतिहासकार हैं.

1897 में सोराबजी ने लिखा, 'क्रिकेट के जरिये सभी राजनीति मतभेदों को भुला देना या उसे पैदा करने के बारे में सोचना भी बेवकूफी है.'

औपनिवेशिक उत्तराधिकार

अंध राष्ट्रवाद और कट्टर हिंदूवाद यह मानता है कि मुस्लिम पाकिस्तान को समर्थन देता है या फिर उसे गद्दार की नजर से देखा जाता है.

लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो दरअसल हम अंग्रेजों की विरासत को आगे बढ़ा रहे होते हैं. 2007 में इतिहासकार एमिली क्रिक ने क्रिकेट एंड इंडियन नेशनल कंशियसनेस में इतिहासकार आशीष नंदी के हवाले से लिखा था कि बंबई ट्रैंगुलर / क्वाड्रैंगुलर / पेंटागुलर क्रिकेट टूर्नामेंट को 1945 में इसलिए रोक दिया गया क्योंकि कई भारतीय राष्ट्रवादियों ने ब्रिटिश मूल्यों को प्रोत्साहित किए जाने का विरोध किया था.

भारत और पाकिस्तान के बीच के मैच के दौरान मुस्लिम बहुल शहरों में पुलिस की तैनाती की जाती है

अंग्रेज बांटों और राज करो की नीति के समर्थक थे और उन्होंने एक समय में जान बूझकर एक समुदाय को आगे बढ़ाया और ऐसे करने का आदार उन्होंने धार्मिक तय किया. पेंटागुलर क्रिकेट टीम का नाम हिंदू, मुस्लिम, पारसी, यूरोपियन और द रेस्ट रखा गया.

1990 में ब्रिटेन की कंजरवेटिव पार्टी के चेयरपर्सन लॉर्ड नॉर्मन टेबिट ने एशियाई आव्रजकों की वफादारी जांचे जाने का प्रस्ताव रखा. अगर आव्रजक अंग्रेजों की टीम को समर्थन नहीं देते तो उन्हें देश से बाहर भेज दिया जाता.

हिंदू राष्ट्रवादी भी भारत और पाकिस्तान के बीच के मैच के दौरान ऐसा माहौल खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. भारत में भारत और पाकिस्तान के बीच के मैच के दौरान मुस्लिम बहुल शहरों में पुलिस की तैनाती की जाती है. यह औपनिवेशिक सरकार की नीतियों को आगे बढ़ाने जैसा है.

आज के हिंदू राष्ट्रवादी और उसके समर्थक इस्लामोफोबिया से ग्रसित हैं और उनका रुख ब्रिटेन की कंजरवेटिव पार्टी जैसा ही है. यहां सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह अपने आप को भारत का समर्थक समझते हैं और यह साबित करने के लिए वे मुस्लिम को शर्मसार करते हैं.

First published: 27 March 2016, 9:08 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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