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बिहार में अपराधः क्या नीतीश के हाथ से फिसलता जा रहा है बिहार?

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 July 2016, 7:46 IST

हाल ही में 18 जून को नीतीश कुमार झारखंड के पलामू जिले के दौरे पर थे. वे जिला मुख्यालय डाल्टनगंज में एक रैली को संबोधित करने आए थे. उनका भाषण आजकल उनके प्रिय विषय शराबबंदी के इर्द-गिर्द ही था. तेज गर्मी के बावजूद रैली में बड़ी संख्या में महिलाओं की मौजूदगी से उत्साहित नीतीश कुमार ने करीब एक घंटे से भी अधिक समय तक भाषण दिया.

अंत में उन्होंने कहा वे जल्द ही ऐसा ही एक कार्यक्रम रांची में भी आयोजित करवाएंगे. ऐसा उन्होंने इसलिए कहा क्योंकि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नीतीश के नए सहयोगी बाबूलाल मरांडी ने 27 जून को रांची में एक कार्यक्रम आयोजित किया था. इस कार्यक्रम का विषय बड़ी संख्या में होने वाला विस्थापन था. नीतीश उसी दिन शहर में पहुंच गए. उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में भाग लेने के बाद मरांडी के कार्यक्रम को संबोधित करना था.

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बिहार के मुख्यमंत्री के स्वागत में पूरा शहर पोस्टर और बैनरों से सज गया. हालांकि जिस वक्त वे पूर्वांचल परिषद की बैठक में भाग ले रहे थे. बिहार से एक ऐसी खबर आई जिसकी वजह से नीतीश का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा. सहरसा के उप महानिरीक्षक (डीआईजी) के पद पर तैनात एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी चंद्रिका प्रसाद ने कहा कि उन्हें माफिया से धमकी भरे काॅल आ रहे हैं. फोन करने वाला शख्स बीस लाख रुपये और सेवानिवृत्ति के बाद मिले पैसे में से आधा हिस्सा देने के लिए कह रहा है.

मामले की गंभीरता को भांपते हुए नीतीश कुमार को पटना के लिए रवाना होना पड़ा. सहमे हुए डीआईजी का स्थानांतरण मुजफ्फरपुर कर दिया गया. इस पर पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव ने अपने चिर परिचित अंदाज में डीआईजी की टांग खिंचाई करते हुए कहा, ‘ये कैसा डीआईजी है, जिसे अपराध माफिया से वसूली की धमकी मिल रही है. क्या इसने इतना पैसा कमा लिया है जो आपराधिक सरगना इन्हें अपना निशाना बना रहे हैं.'

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जाहिर है इस तरह के बयान से लालू मामले की गंभीरता कम करना चाहते थे. मामले में उस वक्त नया मोड़ आ गया जब मुजफ्फरपुर के बरूराज विधानसभा क्षेत्र में लालू के अपने विधायक नंद कुमार राय ने मोतीपुर पुलिस स्टेशन में एक मामला दर्ज करवाया. उन्होंने कहा कि 25 जून की रात को उन्हें धमकी भरा फोन आया था और अपराधी उनसे 10 लाख रुपए की मांग कर रहे थे.

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नीतीश डीआईजी के मामले में ही उलझे हुए थे कि पटना के एक राजनीतिक घटनाक्रम ने उनके लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी. जिला परिषद के चुनाव में जद (यू) समर्थित उम्मीदवार मंजू देवी ने राजद समर्थित प्रतिद्वंद्वी सुनीता को हरा दिया. इससे दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गई.

जदयू की पूर्व विधायक ऊषा सिन्हा और उनके पति लालकेश्वर प्रसाद सिंह का नाम टाॅपर घोटाले में आना राज्य सरकार के लिए बड़ा झटका है. इसके बाद जब संदिग्ध टाॅपर को गिरफ्तार किया गया तो पुलिस ने उसके साथ जो दुर्व्यवहार किया उससे सरकार की ही छवि खराब हुई है.

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पटना आर्ट काॅलेज विद्यार्थियों के आंदोलन ने राज्य के बुद्धिजीवी वर्ग को सरकार के खिलाफ कर दिया. इस कड़ी में एक और परेशानी का सबब बना मोतिहारी गैंग रेप मामले में पुलिस का उदासीन रवैया. इससे राज्य में बिगड़ती कानून व्यवस्था को लेकर बहस में एक और मुद्दा शामिल हो गया.

इसी प्रकार सिवान के पूर्व सांसद शाहाबुद्दीन द्वारा जेल से ही लगाया गया जनता दरबार, पत्रकार राजदेव रंजन की मौत, वैशाली के विशुन राय काॅलेज का कथित शिक्षा माफिया भी ऐसी ही कुछ घटनाएं हैं जिनसे सरकार की साख को बट्टा लगा है.

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बिहार के वरिष्ठ पत्रकार इन घटनाओं की तुलना एक व्यवस्थित तंत्र से करते हैं. वे इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि जब कभी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार प्रदेश के बाहर अपना राजनीतिक कद और दायरा बढ़ाने की कोशिश करते हैं तो उनकी छवि खराब करने के लिए राज्य के भीतर ही कोई न कोई घटना घटित हो जाती है. इस तरह की घटनाएं नीतीश कुमार के स्वयं को मोदी के विकल्प के रूप में पेश करने के उनके प्रयासों को झटका है.

पटना के एक पत्रकार पुष्यमित्र इन सब घटनाओं की का संबंध मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हालिया उत्तर प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र की यात्रा से बताते हैं. दरभंगा जिले में दो इंजीनियरों की हत्या से लेकर डीआईजी से वसूली की धमकी, समस्तीपुर में एक डाॅक्टर के घर में गोलीबारी से लेकर भोजपुर में भाजपा नेता विश्वेश्वर ओझा की हत्या, नवादा सांसद राज वल्लभ यादव पर एक नाबालिग से दुष्कर्म के आरोप से लेकर गया विधान परिषद के सदस्य मनोरमा देवी के बेटे का सड़क पर भड़के आक्रोश में शामिल होना, पुष्यमित्र के अनुसार ये सारी आपराधिक वारदातें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के स्वयं के लिए राष्ट्रीय जनाधार तैयार करने अभियान के रास्ते में रुकावट हैं.

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पुष्यमित्र के अनुसार यह एक संयोग भी हो सकता है, लेकिन मुख्यमंत्री के लिए दुर्भाग्य की बात है. राजनीतिक विश्लेषक प्रोफसर नवल किशोर चौधरी का मानना है कि नीतीश कुमार को इन घटनाओं को गंभीरता से लेने की जरूरत है. मुख्यमंत्री को अब यह समझना होगा कि उन्हें अपने गृह राज्य के मामले में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है.

चौधरी की राय में नीतीश कुमार, राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका तलाशने की कोशिश कर रहे हैं जबकि बिहार भी उनके हाथ से फिसला जा रहा है. एक और राजनीतिक टिप्पणीकार महेन्द्र सुमन भी चौधरी के मत से सहमत हैं. सुमन के अनुसार, नीतीश कुमार चाहे जो भी करें, लेकिन अपने राज्य के मसले सुलझाए बिना वे राष्ट्रीय राजनीति में कोई कमाल करने की उम्मीद नहीं कर सकते.

अपराध की घटनाएं राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश की छवि का नुकसान कर रही हैं

संभवतः नीतीश कुमार को केवल इतने पर ही संतोष कर लेना चाहिए कि भाजपा इन सभी मसलों को भुनाने में विफल रही है. विपक्ष के नेता प्रेम कुमार का आरोप है कि नीतीश राष्ट्रीय राजनीति में व्यस्त हैं और उसी समय लालू बिहार में जंगल राज की वापसी करने में लगे हैं.

प्रेम कुमार के मुताबिक नीतीश कुमार अपराधों की रोकथाम मेें इसलिए नाकाम रहे हैं, क्योंकि वे लालू के सामने असहाय हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि नीतीश शराब मुक्त भारत और संघ मुक्त भारत की बात करते हैं, उन्हें अपराध मुक्त बिहार के लिए काम करना चाहिए.

भाजपा के अन्य नेता भी इसी प्रकार के बयान देते नजर आए. उनका एक ही मुद्दे पर बयान और ध्यान भी एक प्रकार से सरकार के लिए ठीक ही है. बिहार की आपराधिक वारदातों पर करीब से नजर रखने वाले ज्ञानेश्वर वात्स्यायन के अनुसार बिहार में वर्तमान सरकार के अधीन आपराधिक ग्राफ में अचानक वृद्धि नहीं हुई. इन घटनाओं से नीतीश कुमार की छवि को नुकसान हुआ है, लेकिन आपराधिक घटनाएं पिछले पांच सालों में बढ़ी ही हैं.

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अपराधों में बढ़ोत्तरी इस बात की ओर इशारा करती है कि नीतीश कुमार प्रशासन पर नियंत्रण खोते जा रहे हैं. याद कीजिए नीतीश ने कैसे पिछले शासन काल में इसी नौकरशाही के बूते बिहार में हालात ठीक कर दिए थे. अब प्रदेश के डीजीपी ने बड़ा अजीबोगरीब तर्क दिया है कि भगवान राम के राज में भी अपराध तो होता ही था.

सरकारी प्रतिक्रिया

जदयू नेता मुख्यमंत्री के पक्ष में तर्क देते हैं कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. वरिष्ठ पार्टी नेता और राज्य मंत्री श्रवण कुमार ने कहा, नीतीश कुमार ने एक कुशल मुख्यमंत्री की भांति हर बड़े आपराधिक मामले में त्वरित कार्रवाई की है. श्रवण कुमार का दावा गलत भी नहीं है. नीतीश ने आपराधिक मामलों में कार्रवाई के दौरान अपने विधायकों तक को नहीं बख्शा और कई बाहुबलियों को जेल तक पहुंचा दिया है.

हालांकि विपक्ष का वार है कि नीतीश ने संघ मुक्त भारत और शराब मुक्त भारत के लिए जितने प्रयास किए, उसका आधा भी जोर बिहार को अपराध मुक्त करने में नहीं लगाया. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन का कहना है कि नीतीश कुमार को यह मुगालता हो गया है कि शराब मुक्ति की मुहिम उनके द्वारा चलाया गया अद्भुत अभियान है और वह देश भर में इसे फैलाएंगे.

नीतीश सोच रहे हैं कि वे इस एक सूत्री एजेंडे के बल पर अपना राजनीतिक कद बढ़ा लेंगे, जैसे उन्होंने यूपीए के शासन काल में बिहार को विशेष दर्जा दिलाने का बीड़ा उठाया था. बिहार को विशेष राज्य का दर्जा भी नहीं मिला और नीतीश अंततः कांग्रेस-राजद कैंप से जुड़ गए.

First published: 2 July 2016, 7:46 IST
 
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