Home » इंडिया » Catch Hindi: Delhi Gang Rape: juveniles and crime in numbers
 

नाबालिग और गंभीर अपराधों के आंकड़े आपस में मेल नहीं खाते

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 17 December 2015, 20:17 IST
QUICK PILL
  • दिल्ली सामूहिक बलात्कार का एक दोषी नाबालिग था. इस मामले के बाद किशोरों के लिए कड़ा कानून बनाने की मांग ने जोर पकड़ा.
  • आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक की तुलना में किशोर अपराध के मामले बढ़े हैं लेकिन उनमें गंभीर अपराधों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है. ज्यादातर अभियुक्त गरीब और अशिक्षित भी हैं.

दिल्ली में चलती बस में 16 दिसंबर, 2012 को हुए सामूहिक बलात्कार के दोषियों में एक किशोर भी था. सज़ा के तौर पर किशोर सुधारगृह में तीन साल गुजारने के बाद इसे 20 दिसंबर को रिहा किया जाएगा. मौजूद कानून के अनुसार किसी किशोर को अधिकतम इतनी ही सज़ा हो सकती थी.

कानूनन 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को किशोर माना जाता है. पिछले कुछ समय से बलात्कार के विभिन्न मामलों में किशोरों के शामिल होने के बाद उनको दिए जाने वाले दंड का प्रावधान बदलने की मांग उठने लगी है.

हमने किशोरों और अपराध के आपसी संबंध को आंकड़ों के नज़रिए से जानने की कोशिश की.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार स्थिति काफी चिंताजनक है. साल 2014 में किशोरों के खिलाफ कुल 33,526 मामले दर्ज हुए. साल 2013 में किशोरों पर 31,725 मामले दर्ज हुए थे. अगर एक दशक के आंकड़ों से तुलना करें तो इन मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है. साल 2001 में किशोरों के खिलाफ 17, 819 मामले दर्ज हुए थे.

पिछले साल किशोरों के खिलाफ दर्ज हुए 73.7 प्रतिशत मामलों में अभियुक्तों की उम्र 16 साल से 18 साल के बीच थी

साल 2014 में 8700 किशोरों को सुधार गृह में भेजा गया था. इन सुधारगृहों का उद्देश्य किशोरों में सुधार लाकर समाज की मुख्यधारा में वापस शामिल होने लायक बनाना होता है.

बटरफ्लाई नामक एक एनजीओ के अध्ययन के अनुसार कई किशोरों को ऐसे सुधारगृहों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है.

पिछले साल 7345 किशोरों को सलाह या डांट फटकार के बाद घर वापस भेज दिया गया था. 3509 को बरी कर दिया गया और 17,972 किशोरों का मामला विचाराधीन है.

किशोरों अपराधियों से जुड़े आंकड़े निम्म प्रकार हैं-

  • पिछले साल जिन किशोरों को हिरासत में लिया गया उनमें आधे से ज्यादा गरीब परिवारों से थे. उनकी पारिवारिक आमदनी 25 हजार रुपये सालाना के आस-पास थी.
  • लगभग 21.8 प्रतिशत अशिक्षित थे.
  • करीब 12.8 प्रतिशत अनाथ थे.
  • 3.4(1632) बेघर थे.
  • 7.8 प्रतिशत (2609) पहले भी अपराध कर चुके थे.

महिलाओं के संग अपराध

पिछले साल के आंकड़ों से तुलना करें तो किशोरों द्वारा बलात्कार या बलात्कार की कोशिश की घटनाओं में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी नहीं हुई है लेकिन इसमें कमी भी नहीं आयी है. साल 2014 में हिरासत में लिए गए 2144 किशोरों पर बलात्कार का आरोप था.

16 से 18 साल के आयु वर्ग के किशोरों के संख्या में साल 2013 की तुलना में कमी आयी है. साल 2014 के 4.7 प्रतिशत की तुलना में साल 2013 में हिरासत में लिए गए कुल किशोरों में 5.4 प्रतिशत पर बलात्कार का आरोप था.

जिनपर किशोरों पर 'महिलाओं के संग दुर्व्यवहार' का आरोप था उनमें भी कमी आयी. साल 2013 के 1.2 प्रतिशत की तुलना में साल 2014 में ये दर 0.2 प्रतिशत रहा.

किशोरों से जुड़ा नया कानून लोकसभा में पारित हो चुका है. इसे अभी राज्य सभा में पारित होना बाकी है

साल 2013 में दर्ज हुए बलात्कार के कुल मामलों में 3.3 प्रतिशत में 16-18 साल आयु वर्ग के किशोर अभियुक्त थे. साल 2014 में इस आयु वर्ग के किशोरों प्रतिशत 3.1 रहा.

साल 2014 में 1163 किशोरों पर हत्या के मामलों में शामिल होने का आरोप था.

सामाजिक कार्यकर्ता कहते रहे हैं कि किशोरों के लिए कड़ी सज़ा के प्रावधान की बहस किशोरों द्वारा महिलाओं के संग किए अपराध की बजाय अपराध की विभत्सता या नृशसंता से प्रेरित है.

जनदबाव में सुप्रीम कोर्ट को संसद से अनुरोध करना पड़ा की गंभीर अपराधों के मामले में किशोरों के शामिल होने से जुड़े कानून पर फिर से विचार करें.

बटरफ्लाई द्वारा दिल्ली, तमिलनाडु और केरल में किए गए एक अध्ययन से मिले कुछ नतीजे इस प्रकार हैं-

  • करीब 12.8 प्रतिशत किशोर अनाथ थे.
  • साल 2013 के आंकड़ों के अनुसार 50.4 किशोर निम्न आय वर्ग वाले परिवारों से थे.
  • 22.2 प्रतिशत किशोर मध्य वर्गीय और उच्च वर्गीय परिवारों से थे.
  • 76.7 किशोरों को उनके द्वारा किए गए अपराधों के परिणाम के प्रति सजग नहीं थे.


किशोर न्याय बोर्ड की मौजूदा हालत भी चिंताजनक है. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स (एसीएचआर) की एक रिपोर्ट के अनुसार, "भारत के किशोर सुधारगृह नर्क के कोनों की तरह हैं, जहां उनका यौन शोषण और उत्पीड़न होता है. उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में जीना होता है."

येल लॉ स्कूल की मार्था ग्रेस डंकन के एक अध्ययन के मुताबिक "भारतीय किशोर न्यायालय बहुत ही भोले तरीके से किशोरों से पश्चाताप की उम्मीद करती हैं. ऐसा लगता है कि उन्हें मनोवैज्ञानिक डिफेंस मैकेनिज्म के बारे में कोई जानकारी नहीं है." उनका ये रवैया किशोरों के खिलाफ जाता है.

संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुसार 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है

छह मई को लोकसभा में जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन) बिल, 2014 पारित हुआ. इसके अनुसार गंभीर अपराधों से जुड़े  मामलों 16 से 18 आयु वर्ग के किशोरों को व्यस्क मानकर उनपर मुक़दमा चलेगा. इस विधेयक को अभी राज्यसभा में पारित होना बाकी है.

अगर यह कानून राज्यसभा से भी पारित हो जाता है तो भारतीय दंड संहिता में ये एक बड़ा बदलाव होगा. मौजूदा कानून युनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन चाइल्ड राइट्स 1989 के अनुरूप था. जिसके अनुसार 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को किशोर माना जाएगा.

First published: 17 December 2015, 20:17 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

पिछली कहानी
अगली कहानी