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फसल बीमा योजना: नई बोतल में पुरानी शराब परोसने की योजना

चारू कार्तिकेय | Updated on: 19 January 2016, 15:00 IST
QUICK PILL
  • भूमि अधिग्रहण में प्रस्तावित संशोधन को लेकर अपना हाथ जला चुकी मोदी सरकार ने इस बार किसानों का दिल जीतने के लिए नई फसल बीमा योजना को मंजूरी दी है जिसमें प्रीमियम बोझ को कम कर दिया गया है.
  • विश्लेषकों के मुताबिक नई योजना मौजूदा योजना से बेहतर तो है लेकिन इसमें कई खामियां को जस का तस छोड़ दिया गया है. मसलन फसल के नुकसान का आकलन और पूरे देश में योजना को लागू नहीं किए जाने के फैसले पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं.

भूमि अधिग्रहण विधेयक में प्रस्तावित संशोधन की वजह से जबरदस्त नुकसान उठा चुकी एनडीए सरकार दूसरे तरीके से किसानों का दिल जीतने की कोशिश कर रही है. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 13 जनवरी को नई फसल बीमा योजना को मंजूरी दे दी है. 

सरकार के मुताबिक 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' किसानों के कल्याण की दिशा में की गई ऐतिहासिक पहल है. लेकिन क्या वह वाकई में ऐसा है जैसा सरकार दावा कर रही है?

अभी तक सरकार ने इस योजना की केवल अहम बातों को ही सामने रखा है. हालांकि फसलों को होने वाला नुकसान और बेकार की बीमा योजना अभी तक की बड़ी चिंता रही है. नई योजना की मदद से इन खामियों को दुरुस्त करने की कोशिश की गई है. यहां नई फसल बीमा योजना में शामिल कुछ अहम बिंदुओं पर एक नजर:

  1. नई योजना में खरीफ फसल के लिए 2 फीसदी जबकि रबी फसल के लिए 1.5 फीसदी प्रीमियम का जिक्र किया गया है जिसका भुगतान किसानों को करना होगा जबकि पुरानी योजना में यह रकम 3.5 फीसदी और 2.5 फीसदी क्रमश: थी. 
  2. व्यावसायिक फसलों और बागवानी फसलों के लिए 5 फीसदी प्रीमियम का भुगतान करना होगा जबकि मौजूदा योजना में यह जोखिम के आकलन के बाद तय किया जाता है.
  3. सरकार के सब्सिडी की कोई ऊपरी सीमा तय नहीं की गई है. अगर बैलेंस प्रीमियम 90 फीसदी होती तो भी इसका भुगतान सरकार को ही करना होगा. 
  4. जबकि मौजूदा योजना में छोटे और मझोले किसानों के लिए 50 फीसदी सब्सिडी की सीमा तय की गई थी और इसे केंद्र और राज्य सरकार बराबर साझा करती हैं.
  5. नई योजना में प्रीमियम दरों को लेकर कोई सीमा तय नहीं की गई है. किसानों को उनके दावे की पूरी रकम मिलेगी जबकि मौजूदा योजना में प्रीमियम दर की एक सीमा तय की गई थी. इस वजह से किसानों को उनके दावे की पूरी रकम से कम का भुगतान किया जाता था. 
  6. नई योजना के तहत स्मार्ट फोन की मदद से फसलों की कटाई की तस्वीर खींच कर अपलोड की जाएगी और इस कारण किसानों के दावे को तेजी से निपटाया जा सकेगा. इसके अलावा रिमोट सेंसिंग तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा. जबकि मौजूदा योजना में यह काम कर्मचारियों की निगरानी की मदद से किया जाता था जिसमें लंबा समय लगता था.

प्रस्तावित योजना बेहतर प्रतीत होती है?

राष्ट्रीय किसान आयोग (एनसीएफ) ने 2006 में पूरे देश में फसल बीमा को लागू किए जाने की सिफारिश की थी. इसके अलावा आयोग ने प्रीमियम दरों में भी कटौती करने की सिफारिश की थी. एनसीएफ को स्वामीनाथन आयोग के नाम से भी जाना जाता है. जाहिर है इस आयोग की सिफारिशों को अभी तक लागू नहीं किया जा सका है.

आयोग ने फसलों को हुए नुकसान का आकलन करने के दौरान प्रखंड की बजाय गांवों को ईकाई बनाए जाने की सलाह दी थी. हालांकि इस सिफारिश को लागू नहीं किया जा सका है.

कृषि के क्षेत्र में मौजूद समस्या की प्रकृति को देखते हुए इससे निपटने के लिए चौतरफा नीति की जरूरत होगी

विश्लेषकों ने हालांकि सरकार की नई योजना का स्वागत किया है लेकिन उन्होंने साथ ही कई चिंताओं की तरफ ध्यान खींचा है. भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ ने कहा कि योजना की सफलता इस बात से तय होगी कि कितने किसान इसे अपनी मर्जी से अपनाते हैं. उन्होंने कहा कि यह एक अच्छा फैसला है लेकिन हमें विस्तृत जानकारी का इंतजार है.

कुछ नए समाधान

राष्ट्रीय किसान आयोग की तरह अर्थशास्त्री अमिरुल्लाह खान को लगता है कि फसल बीमा योजना इसलिए विफल रहा क्योंकि इसके लिए ग्रुप पर निर्भरता अधिक थी. अब अगर फसल तबाह होती है तो किसान नुकसान का दावा कर सकेगा.

खान ने कहा कि योजना में किसानों के खाते में सीधे रकम भेजने की बात कही गई है लेकिन सच्चाई यह है कि देश के 20 फीसदी से भी कम किसानों के पास बैंक  खाता है. खान ने कहा, 'हम आखिर कब तक एक ही समस्या को उसी तरीके से समाधान करने की कोशिश करते रहेंगे?' उन्होंने कहा कि इस योजना में बस एक ही नई चीज है और वह प्रीमियम दरों में सब्सिडी देने की है. हालांकि इसके अलावा कई पुरानी समस्याएं हैं.

उन्होंने कहा कि सरकार यह दावा कर रही है कि वह किसानों को बड़ा तोेहफा दे रही है लेकिन जमीन पर किसानों को फसलों को हुए नुकसान से ज्यादा कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से नुकसान उठाना पड़ता है. नई योजना में इस समस्या से निपटने के लिए कुछ भी नहीं किया गया है.

क्या बीमा कंपनियों को ही होगा फायदा?

कृषि विश्लेषक देविंदर शर्मा ने कहा कि इस योजना के पीछे का मकसद ठीक है लेकिन इसके बावजूद अभी भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं. सबसे बड़ी समस्या रबी और खरीफ फसल की प्रीमियम दरों में अंतर है जिसे खत्म करते हुए सभी फसलों के लिए 1.5 फीसदी कर देना चाहिए. 

शर्मा के मुताबिक योजना में इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि फसलों को हुए नुकसान का आकलन कैसे किया जाएगा. उन्होंने कहा, 'प्रखंड स्तर पर आकलन की धारणा में कई तरह की खामियां हैं.' उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि आखिरकार सरकार बीमा कंपनियों पर व्यक्तिगत आधार पर होने वाले नुकसान के आकलन का दबाव क्यों नहीं बना रही है? शर्मा ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल अच्छा है लेकिन मोबाइल फोटो के आधार पर ही फसलों को हुए नुकसान का आकलन नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा, 'यहां तक कि ड्रोन से भी यह संभव नहीं है. इससे व्यक्तिगत निगरानी में ही बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है.'

मौजूदा सिस्टम में नुकसान का आकलन राजस्व अधिकारी करते हैं और यह तरीका अब अप्रांसगिक हो चुका है

शर्मा ने कहा कि अमेरिका में कृषि बीमा बेचने वाली बीमा कंपनियां हर डॉलर प्रीमियम पर 1.5 डॉलर का भुगतान करती हैं. क्या हम भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं जहां बीमा कंपनियां जबरदस्त मुनाफा कमाएंगी जबकि किसानों की समस्या में कोई सुधार नहीं होगा.

जोखिम कम करना अहम

सिकंदराबाद के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के कार्यकारी निदेशक जी वी रामाजानेयुलु भी प्रीमियम बोझ कम किए जाने और मुआजवा देने में होने वाली देरी को खत्म किए जाने के फैसले का स्वागत करते हैं. हालांकि उन्हें इसमें कई और समस्याएं नजर आती हैं.

आरएसएस की किसान शाखा भारतीय किसान संघ ने प्रीमियम दरों में कटौती किए जाने के फैसले का स्वागत किया है

उन्होंने कहा कि फसल बीमा को पूरे देश में लागू नहीं किया गया है. इसके अलावा सभी फसलों और इलाकों को इस योजना के दायरे में नहीं लाया गया है.

दूसरा उन किसानों का जिक्र भी नहीं किया गया है जो दूसरों की जमीन पर खेती करते हैं. काश्तकारी का योजना में कहीं जिक्र नहीं किया गया है. ऐसे में वह किसान कैसे दावा करेंगे जो दूसरे की जमीन पर खेती करते हैं.

नुकसान का आकलन चुनौतीपूर्ण

उन्होंने कहा कि प्रखंड की बजाए गांवों को फसलों के नुकसान का आकलन करने की ईकाई बनाना चाहिए. आरएसएस की किसान शाखा भारतीय किसान संघ ने प्रीमियम दरों में कटौती किए जाने के फैसले का स्वागत किया है. हालांकि उन्होंने अपनी आपत्तियों को कूटनीतिक तरीके से सामने रखा.

महासचिव प्रभाकर केलकर ने कैच को बताया कि तकनीक के इस्तेमाल के बावजूद फसलों के नुकसान की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण होगी क्योंकि यहां पर सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार होता है. उन्होंने कहा, 'मौजूदा व्यवस्था में पटवारी नुकसान का आकलन करता है और वह अब नई व्यवस्था में अप्रासंगिक हो जाएगा. हम सरकार से यह मांग कर रहे हैं कि नुकसान का आकलन पंचायत सदस्यों या गांव के बुजुर्गों की मौजूदगी में किया जाए.'

इसके अलावा हम एक हेल्पलाइन भी शुरू किए जाने की मांग कर रहे हैं. केलकर ने भी पूरे देश में फसल बीमा योजना को लागू किए जाने के फैसले का स्वागत किया. उन्होंने कहा, 'एक फसल, एक खेत और एक व्यक्ति के सिद्धांत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए. आखिरकार यह फसल बीमा योजना है न कि खेत बीमा योजना.'

बनी रहेगी समस्या

कृषि के क्षेत्र में मौजूद समस्या ऑक्टोपस की तरह है और ऐसे में इससे निपटने के लिए हमें चौतरफा नीति अपनानी होगी. इस दिशा में नई योजना का स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन जिस समय योजना को लागू किया जा रहा है वह यह बता रही है कि सरकार बस अपनी जिम्मेदारी पूरा करने की कोशिश कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह कहना कि हम फसल की लागत के मुकाबले 50 फीसदी अधिक मुनाफा नहीं मुहैया करा सकते जबकि बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में इसका वादा किया था. तो मोदी सरकार बस अपना मतलब साध रही है?

First published: 19 January 2016, 15:00 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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