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बस्तरिया बटालियन यानी दोधारी तलवार

राजकुमार सोनी | Updated on: 29 July 2016, 7:45 IST
(गेटी)

वर्ष 2005 के अगस्त महीने की बात है. छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के कुछ पत्रकार जिसमें इस खबर का रिपोर्टर भी शामिल है, माओवादियों के एक बड़े लीडर भूपति का इंटरव्यू करने के लिए बस्तर के पोलमपल्ली इलाके के जंगलों में गए थे.

भूपति ने सवालों का जवाब देने के पहले पत्रकारों को एक टेप सुनाया जिसे सुनकर पत्रकारों के होश उड़ गए. टेप में वायरलेस मैसेज के जरिए पुलिसकर्मी आपस में बातचीत कर रहे थे. एक संदेश यह था कि कुछ पत्रकार माओवादियों को कवरेज करने के लिए जंगल के अंदर जाने वाले हैं, वे जहां मिले... जैसे मिले उनका एनकाउंटर कर देना है.

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पत्रकार इस बात को लेकर भौचक थे कि भला पुलिस की वायरलेस बातचीत का मैसेज माओवादियों के पास कैसे पहुंचा? पत्रकार अपने-अपने ढंग से कयास लगाने लगे. जब थक गए तब भूपति ने बताया कि उनके मुखबिर पुलिस थानों में भी मौजूद है.

इस प्रसंग का उल्लेख यहां इसलिए मौजूं है क्योंकि बस्तर में केंद्रीय सुरक्षा बल की ओर से बस्तरिया बटालियन के गठन की प्रक्रिया चल रही है, और इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि कहीं बटालियन में बतौर मुखबिर माओवादियों की इंट्री तो नहीं हो जाएगी?

इस सवाल के उठने की एक बड़ी वजह यह भी है कि जब बस्तर में सलवा-जुडूम का अभियान संचालित हो रहा था तब पुलिस ने अपनी सहूलियत के लिए उन लोगों को एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) बना दिया था. ये लोग गांव में डेरा डालने वाले सिपाहियों के लिए भोजन बनाया करते थे या फिर जंगलों में उनके साथ घूमते थे. पुलिस को लगता था कि एसपीओ बस्तर की भौगोलिक परिस्थितियों से वाकिफ है, लेकिन थोड़े ही दिनों में एसपीओ लूटपाट में लिप्त हो गए और सलवा-जुडूम बदनाम हो गया.

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हालांकि इसके बदनाम होने का एक कारण राजनीतिक भी था, लेकिन जो लोग बस्तर के मसलों को समझते हैं उनका कहना है कि पुलिस ने आदिवासियों को आदिवासियों के खिलाफ खड़ा किया इसलिए स्थिति शांत होने के बजाय हिंसक हो गई.

60 हजार सुरक्षाकर्मी तो फिर बस्तरिया बटालियन की जरूरत क्यों?

यदि आप कभी बस्तर का दौरा करें तो लगेगा कि आप किसी ऐसी जगह आ गए हैं जहां युद्घ चल रहा है. हर दस-बीस किलोमीटर के दायरे में एक छावनी दिखाई देगी. रेत के बोरों से बना हुआ मचान नजर आएगा और बंदूक थामे कोई जवान दिखाई देगा. यदि गलती से भी आपकी गाड़ी छावनी के सामने ठहर गई तो बंदूक की नली आपकी ओर घूम जाएगी और अगर आपसे लापरवाही में ऐसी कोई हरकत हो गई जो कि सुरक्षाबलों को खतरा लगे तो गोली भी चल सकती है.

बस्तर में इस समय केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 25, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की पांच, सीमा सुरक्षा बल की चार, छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल की 18 और कुछ अन्य बटालियन सहित लगभग 60 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात हैं.

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बस्तर में कुल कितने माओवादी हैं इसका ठीक-ठाक आंकड़ा किसी के पास नहीं है. गृह विभाग मानता है कि अमूमन छोटे-बड़े सभी स्तरों पर 50,000 माओवादी हो सकते हैं जबकि माओवादी मोर्चें पर तैनात पुलिस अफसरों का कहना है कि हार्डकोर माओवादी कम हैं, मगर उनकी गतिविधियों में सहयोग करने वाले लोग ज्यादा है. इतनी बड़ी तादात में सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी के बाद भी बस्तर में एक नए बटालियन की जरूरत क्यों पड़ रही है?

आसान होगा माओवादियों से लोहा लेना

केंद्रीय सुरक्षा बल के प्रवक्ता प्रसन्न कुमार कहते हैं, 'फिलहाल बस्तर के नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जिले में कुल 720 युवकों की भर्ती की जानी है. पंजाब में आतंकवादी और आंध्र में माओवादियों से निपटने के लिए केंद्रीय सुरक्षा बल ने बटालियन का गठन किया था और इसके आशाजनक परिणाम देखने को मिले थे. बस्तर में भी स्थानीय युवकों को बटालियन में इसलिए मौका दिया जा रहा है ताकि माओवादियों से लोहा लेना आसान हो.'

सरकार की सोच है कि स्थानीय युवक बोली, भाषा, जंगल, पहाड़, नदी, नालों से वाकिफ होते हैं. उन्हें यह पता होता है कि कौन कहां छिपा है और कौन आम आदमी के भेष में माओवादी हो सकता है. फोर्स युवकों की स्थानीयता का भरपूर फायदा उठाना चाहती है.

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यह दोधारी तलवार पर चलने जैसा है. जो बत सुरक्षा बलों के पक्ष में जाती दिख रही है वह उनके खिलाफ भी जा सकती है. बटालियन में सिपाही की जगह माओवादियों की इंट्री के सवाल पर कुमार कहते हैं, 'एक सरकारी नौकरी में भर्ती की प्रक्रिया बेहद कठिन होती है. नौकरी पाने वाले लोगों के प्रत्येक प्रमाण पत्रों की जांच होती है. चूंकि बस्तर एक अति संवेदनशील इलाका है इसलिए यहां विशेष एहतियात बरतने की जरूरत भी होगी. इस बात की बारीकी से पड़ताल होगी कि जिसकी भर्ती हो रही है उसका इरादा देश सेवा का है या नहीं?'

कुमार आगे कहते हैं, 'जिन युवकों को 25 से 30 हजार रुपए की पगार मिलेगी वे माओवादियों के आत्मघाती रास्तों पर क्यों चलेंगे.'

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लोक स्वातंत्र्य संगठन की छत्तीसगढ़ ईकाई के अध्यक्ष लाखन सिंह कहते हैं, 'पीयूसीएल की याचिका के बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने सलवा-जुडूम पर प्रतिबंध लगाते हुए एसपीओ की भर्ती पर सवाल खड़े किए थे. सलवा-जुडूम के जरिए जो युवक युद्घ में शामिल थे उन्हें लूटपाट करने की छूट दे दी गई थी. सरकार एक बार फिर रोजगार देने के नाम पर नया खेल खेलने जा रही है. स्थानीय युवक मौत का सामना करने के लिए फोर्स के आगे-आगे चलेंगे और फोर्स उनका इस्तेमाल करेगी.'

लाखन सिंह कहते हैं, हम पूरी प्रक्रिया पर नजर रखे हुए हैं और जरूरत होगी तो आवरण बदलकर की जाने वाली एसपीओ की भर्ती को अदालत में चुनौती भी देंगे.

First published: 29 July 2016, 7:45 IST
 
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