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हंगामा क्यूं है बरपा ऑनलाइन दवा बिक्री पर पाबंदी के लिए

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 6 January 2016, 19:47 IST
QUICK PILL
  • औषधि महानियंत्रक, भारत ने कहा है कि वह ऑनलाइन दवा बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा रही है. हम सिर्फ ई-फार्मेसियों द्वारा निर्धारित कानूनओं का पालन करवाने के लिए राज्यों से कहा है.
  • ऑनलाइन दवा बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए अक्तूबर में आठ लाख से अधिक दवा विक्रेता एक दिवसीय हड़ताल पर चले गए थेे.

भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) अब इस सवाल से जूझ रहे हैं कि क्या दवाओं की ऑनलाइन बिक्री पर प्रतिबंध लगाना चाहिए या नहीं?

इस सप्ताह की शुरुआत में समाचार रिपोर्टों ने दावा किया था कि डीसीजीआई ने दवा की ऑनलाइन बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन सूत्रों ने कैच को बताया कि ऐसा कोई भी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है.

डीसीजीआई ने "सिर्फ राज्य सरकारों को निर्देश दिया" कि वे औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम-1940 और औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम-1945 का उल्लंघन करने वाली ई-फार्मेसियों के खिलाफ कार्रवाई करें.

सहायक औषधि नियंत्रक, संजीव कुमार कहते हैं, "हमने सिर्फ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दवाओं की ऑनलाइन बिक्री को विनियमित करने संबंधी नोटिस जारी किया था. उन्हें कानून द्वारा निर्धारित नियमों और विनियमों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए. विशेष रूप से ऑनलाइन फार्मेसियों द्वारा जो दवाएं उपभोक्ताओं को बेची जा रही हैं, उससे पहले उन्हें प्रिस्क्रिप्शन की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए"

झगड़े की जड़

यह मुद्दा जून से पक रहा है जब डीसीजीआई ने फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) से कहा कि, "ई-कॉमर्स माध्यमों के जरिये हो रही दवाओं की बिक्री के लिए दिशानिर्देश तय करें."

मौजूदा परिदृश्य में देश में दवाओं की ऑनलाइन बिक्री के लिए कोई भी विशिष्ट नियम या दिशानिर्देश नहीं हैं.

राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर के मुताबिक, फिक्की पैनल के अलावा रसायन और उर्वरक मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति भी इस मुद्दे को देख रही है.

शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में अहीर ने जानकारी दी, "समिति अभी भी इस मामले पर विचार-विमर्श कर रही है."

डीसीजीआई सूत्रों ने कैच को बताया कि नियामक "तब नियमों को अंतिम रूप देगा जब सरकार द्वारा नियुक्त समिति अपनी रिपोर्ट सौंप देगी." 

प्रतिबंध लगाने के लिए इतना हल्ला क्यों है?

दवाओं की ऑनलाइन उपलब्धता ने विभिन्न दवा की दुकानों और दवा संघों को टकराव के लिए प्रेरित किया. जहां कुछ ऑनलाइन बिक्री पर एक सिरे से प्रतिबंध चाहते हैं, अन्य इस तरह के कदम उठाए जाने के खिलाफ हैं. दोनों ने केंद्रीय समिति के पास इस संबंध में आवेदन दिया है.

बीते 14 अक्टूबर को देश भर के आठ लाख से ज्यादा दवा विक्रेता ऑनलाइन बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक दिवसीय हड़ताल पर चले गए.

उनको एकजुट करने वाले संगठन ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (एआईओसीडी) ने सरकार को चेतावनी दी थी अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे. 

एआईओसीडी ने दावा किया कि दवाओं की ऑनलाइन बिक्री की इजाजत देना दवा की दुकानों के लिए "हानिकारक होगा" और इससे जुड़े तमाम लोगों का धंधा चौपट हो जाएगा.

प्रतिबंध लगाने की मांग करने वालों का तर्क है कि "ऑनलाइन दवाओं की बिक्री करने वाले इन दवाओं को सुरक्षित रूप से लाते-ले जाते हैं या नहीं" और वे ई-फार्मेसियों के पास दवाओं को सुरक्षित रूप से रखने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा है पर भी शक करते हैं. 

एआईओसीडी के अध्यक्ष जेएस शिंदे का भी तर्क है कि ऑनलाइन दवाओं तक आसान पहुँच के परिणामस्वरूप विशेष रूप से युवाओं के बीच इनके गलत इस्तेमाल, अवैध बिक्री अथवा लत लगने की भी संभावना है." शिंदे का दावा है, "वर्तमान में दवाओं के पूरी ऑनलाइन बिक्री अवैध है."

प्रतिबंध के खिलाफ क्या तर्क हैं?

अधिकांश ई-फार्मेसियां बिना प्रेसक्रिप्शन (नुस्खे) के दवाओं की बिक्री नहीं करती हैं. साथ ही "वे नियमित रूप से फार्मेसियों के लिए बनाए गए नियमों का पालन करती हैं."

उदाहरण के लिए नेटमेड्स, केवल एक वैध नुस्खा देखने के बाद ही दवाओं की बिक्री करता है और वो जिन दवाओं में नुस्खे की जरूरत नहीं है इसका भी अंतर देखता है.

वे दवाओं की केवल एक सीमित संख्या ही बेचते हैं जिससे इनके दुरुपयोग की ज्यादा गुंजाइश नहीं रहती. ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के लोगों तक महत्वपूर्ण दवाओं की आसान पहुंच के साथ ही बेहतर मूल्य निर्धारण और सुविधा इसके समर्थन के अन्य तर्कों में शामिल है. 

एआईओसीडी के अध्यक्ष जेएस शिंदे का दावा है कि वर्तमान में दवाओं के पूरी ऑनलाइन बिक्री अवैध है

कई ई-फार्मेसियों ने दवाओं के वितरण के लिए भागीदार के रूप में इंडिया पोस्ट के साथ करार भी किया है. 

वहीं, नकली दवाओं की बिक्री ऑनलाइन फार्मेसियों के साथ आने से काफी पहले हुआ करती थी. पर्ची के बिना काउंटर पर दवाओं की बिक्री देश में बड़े पैमाने पर होती है जिसके लिए ई-फार्मेसियों को शायद ही दोषी ठहराया जा सकता है.

द एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया द्वारा की गई शोध में खुलासा हुआ कि देश के घरेलू दवा बाजार का तकरीबन 25 फीसदी हिस्सा नकली दवाओं का है.

ऑनलाइन दवाओं की खरीद सुरक्षित है या नहीं, इसका कोई आसान जवाब नहीं है. लेकिन कुछ नियमों की इसमें निश्चित रूप से जरूरत है.

हालांकि यह देखने वाली बात है कि डीसीजीआई किन नियमों को लेकर सामने आता है, लेकिन फिलहाल ई-फार्मेसियों के खिलाफ तर्क देने वालों में मुख्यता वो ही शामिल हैं जिनके मुनाफे का कुछ हिस्सा यह ऑनलाइन कंपनियां लिए जा ही हैं.

First published: 6 January 2016, 19:47 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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