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खान-पान पर निगरानी हिंदू जीवन शैली का हिस्सा नहीं है

विवेक काटजू | Updated on: 6 April 2017, 9:53 IST

जब मैंने अखबारों में पढ़ा कि रक्षकों के एक दल ने ग्रेटर नोएडा के एक रेस्टॉरेंट घुसकर यह मांग की है कि नवरात्र के दिनों में यहां कोई मीट मीनू में नहीं होना चाहिए तो मेरे दिमाग में एक पुरानी याद उभर उठी. यह नवरात्रि के दिन वार्षिक पूजा थी, जिसे हम ‘देवी के दिन’ भी कहते हैं. इस दिन शरीका मॉं यानी दुर्गा के जिस रूप को हम पूजते हैं उसको मटन यानी बकरी का मांस चढ़ाया गया था.

शरीका मॉं के इस भोग के बाद घर के बच्चों को एक-दो प्लेटों में कच्चे मीट के टुकड़ों से भरकर उन्हें चिड़ियों को खिलाने के लिए दिए गए. तो हम उन्हें लेकर छत पर गए और जल्दी ही चीलों ने हमारी छत के आकाश पर मंडराना शुरू कर दिया. हम इन मीट के टुकड़ों को हवा में उछालते और चील तेजी से झपट्टा मारकर इन टुकड़ों को छीन कर ले जाते.

एक ऐसे कश्मीरी ब्राह्मण के रूप में जिसके पूर्वज दो दशक पहले कश्मीर की घाटी से प्रवासी के रूप में राजस्थान और उसके बाद मध्यप्रदेश और बाद में लगभग एक दशक पहले हमने अपने दादा के जमाने में इलाहाबाद में अपना घर बसा लिया. इस समय तक शहर के परिवेश में पूरी तरह से रच—बस गए थे.

केवल कुछ ही ऐसे धार्मिक रीति—रिवाज ऐसे बचे हुए थे जो कि कश्मीर घाटी में हमारे पूर्वज करते थे, उन्हीं में से एक था ‘देवी के दिन’ को शरीका देवी की पूजा जिसके अंतर्गत मीट का खाया जाना इसका भाग होता था. शरीका देवी के भक्त की तरह देवी के दिन हमारे परिवार में मटन को खाया जाना तो अब भी परंपरा का हिस्सा बना हुआ है पर चीलों को मीट खिलाए जाने की परंपरा हमारे दादाजी के 1968 में गुजर जाने के बाद खत्म हो गई.

 

कश्मीर में शरीका मॉ की पूजा आज भी की जाती है और उनके भक्त इस दिन उनको परंपरागत मीट भी चढ़ाते आ रहे हैं. यहां यह भी बताने की जरूरत है कि कई कश्मीरी ब्राह्मण त्रिपुरसुंदरी या महाराग्न्या रूप में महालक्ष्मी की पूजा भी करते हैं, जिसके लिए वे उनको अन्य चीजों के साथ दूध में पका चावल भी चढ़ाते हैं. स्वभाविक रूप से माता के ये भक्त देवी के दिन पूर्ण रूप से शाकाहारी होते हैं. इस तरह महाराग्न्या को पूजने वाले हमारी मम्मी के घर वाले इस दौरान पूरी तरह से शाकाहारी थे.

 

एकता, विविधता

 

कश्मीरी ब्राह्मणों में इन विभिन्न प्रकार की परंपराओं का प्रचलन हमारी महान आस्था के एक सार तत्व को रूपायित करता है: यह ग्रहणशील है, इसमें किसी प्रकार की कट्टरवादिता नहीं है, इसमें किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को अपने मर्जी से चुने हुए रास्ते पर चलने का अधिकार है.

सच तो यह है कि बौद्धिक स्वतंत्रता पर बंदिश लगाना और किसी तरह की आध्यात्मिक या सांस्कृतिक मान्यता को थोपना हिंदू जीवन शैली के विरोध में जाता है. ये मूल्य और सिद्धांत हम हिंदुओं के अवचेतन में बसे हुए हैं. इस तरह से जब कभी भी हिंदुओं का कोई एक समूह आक्रामक रूप से अपना द्ष्टिकोण थोपता है, जैसा कि ग्रेटर नोएडा के रेस्टॉरेंट में घुसने वाले उस समूह में ने किया, तो या जाने या अनजाने में हिदू विश्वासों और सिद्धांतों को कमजोर कर रहा होता है.

चलिए मैं चर्चा को दूसरी ओर ले जाता हूं. एक राजनयिक की तरह मैं दूसरे देशों के प्रतिनिधियों से संपर्क में रहता आया हूं और जब भी उनको मुख्य अतिथि की तरह आमंत्रित किया जाता उनका यह आग्रह रहता कि कार्यक्रम में उनके रीति—रिवाजों का पालन किया जाए. इस तरह से उनका आग्रह रहता कि कार्यक्रम में कोई शराब आदि सर्व न की जाए, चाहे वह मेजबान के रीतिरिवाज का हिस्सा की क्यों न हो या अन्य मेहमान इसकी मॉंग कर रहे हों.

मेजबान इस बात का ध्यान रखे कि उसके मुख्य अतिथि की संवेदनाएं आहत न हों यह एक बात है और यह पूरी तरह से दूसरी बात है कि मेहमान इस बात पर जोर दे कि धार्मिक कारणों से उसकी बात को माना जाना चाहिए, उसका तरीका अपनाया जाना चाहिए. यह सब हिंदुओं में कभी नहीं रहा, हॉं यह जरूर है कि हिंदू यह उम्मीद अवश्य करते हैं कि उनके मेजबान उनकी संवेदनाओं का ध्यान रखेंगे.

 

उत्तर प्रदेश का जनादेश

 

मैं एक बार फिर से रास्ता बदल रहा हूं. बात करते हैं उत्तर प्रदेश सरकार के अवैध बूचड़खाने बंद करने और अनियमित तथा अवैध दुकानों द्वारा मीट बेचे जाने पर कार्रवाई की. इस निर्णय के समर्थन में स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संबंधी कारण दिए गए हैं. यह सब वैध चिंताएं हैं. साथ ही गैर—कानूनी गतिविधियों का समर्थन नहीं किया जा सकता.


उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुछ दिन पहले मीट विक्रेताओं और निर्यातकों की एसोसिएशन के प्रतिनिधियों से मुलाकात की. इस मीटिंग के बाद उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा कि, “अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई में तो कोई ढील नहीं दी जाएगी पर अधिकारियों से जिम्मेदार तरीके से कार्रवाई करने की बात अवश्य कही जाएगी. यह सरकार किसी व्यक्ति के खिलाफ धर्म, जाति या फिर रंग के आधार पर कार्रवाई नहीं करेगी.”

 

यह सराहनीय है और आश्वासन देने वाली बात है कि योगी आदित्यनाथ ने यह स्पष्ट किया कि मीट के कारोबार के खिलाफ उठाए गए कदम किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाने के लिए नहीं हैं. बल्कि ये सिर्फ अवैध बूचड़खानों के खिलाफ हैं. लेकिन सरकार ने जो किया है उससे बड़ी संख्या में हमारे समाज के कमजोर आर्थिक वर्ग के लोगों के सामने मुश्किल खड़ी हो गई है.

यह सच है कि लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण से कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए, पर लोगों की जीविका के साधनों की अनदेखी से समाज में गहरे असंतोष और समाज में अलगाववाद पनपने के जोखिम को नकारा नहीं जा सकता. इसलिए कानून का पालन तो होना ही चाहिए पर इसको दूसरे रास्ते पर जाने की अनुमति नहीं दी सकती. ऐसा कोई रास्ता निकाला जाना चाहिए था जिससे मीट ट्रेडर्स कानूनी रूप से अपना कारोबार कर सकें.

 

गांधी को याद किया जाना


यह भी महत्वपूर्ण है कि हम आहार संबंधी प्राथमिकताओं को न थोपें. यह ध्यान देना होगा गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी की उस टिप्पणी पर जिसमें उन्होंने कहा था कि गुजरात को एक शाकाहारी राज्य बनाना अब राज्य का लक्ष्य हो चुका है. इस संबंध में मुख्यमंत्री ने अन्य कई लोगों के साथ गांधीजी को भी याद किया. यह सही है कि गांधी जी एक सख्त शाकाहारी थे और उन्होंने शाकाहारी आहार के फायदों के बारे में भी बहुत लिखा है. पर गांधी जी ने इस बात पर भी जोर दिया है कि आहार के संबंध में ज्यादा ही नैतिक व्यक्ति अहिंसा से पूरी तरह से अजनबी है...और वह कमबख्त दयनीय रूप से अपने स्वार्थ और आवेगों का गुलाम है और दिल का सख्त.

गांधी जी के लिए शाकाहार का लक्ष्य मानव का स्वास्थ्य तो था ही पर वह इसलिए भी जरूरी था कि उससे आत्म संयम और आत्म निग्रह की भी शिक्षा मिलती है. क्या मुख्यमंत्री इन मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करेंगे और इनकी शिक्षा देंगे? हो सकता है कि गुजरात में बड़ी संख्या में शाकाहारी लोग हों पर क्या उन्हीं की परंपराओं और आहार संबंधी प्राथमिकताओं को ही सबके लिए ठीक माना जाना चाहिए?


अलग—अलग प्रकार के भोजन के गुण और अवगुणों की चर्चा वैज्ञानिक आधार पर करने और कौन क्या खाए यह लोगों पर छोड़ देने में कोई बुराई नहीं है.

इसका मतलब यह भी नहीं है कि ऐसे मौजूदा कानूनों जिनमें गाय की हत्या पर पाबंदी लगाई गई है, में ढिलाई दी जानी चाहिए. सदियों से देश के लगभग हर हिस्से में बड़ी भारी संख्या में हिंदुओं के दिल में गाय के प्रति अगाध आदर है. इसके साथ ही संविधान में भी इन चौपाया जानवरों के लिए विशेष स्थान देते हुए यह कहा गया है कि दूध आदि देने वाले गाय और उसके बछड़े की हत्या को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

लेकिन इसके लिए किसी को भी यह लाइसेंस नहीं दिया जा सकता कि वह गायों के बारे में किसी भी तरह के अवैध काम करने वालों पर हमला करे. इस तरह की निगरानी से सख्ती से निपटना होगा, जैसा कि सरकार ने करने का आश्वासन दिया भी है. किसी कानून की पालना का दायित्व उसी अधिकारी का है जिसको इसकी जिम्मेदारी दी गई है.

First published: 6 April 2017, 9:53 IST
 
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