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क्या सचमुच साइरस मिस्त्री रतन टाटा के सपनों को पूरा करने में नाकाम रहे थे?

नीरज ठाकुर | Updated on: 25 October 2016, 9:14 IST
(सजाद मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • 100 बिलियन डॉलर के टाटा ग्रुप के चेयरमैन के पद से साइरस मिस्त्री को अचानक हटा दिए जाने की क्या वजह हो सकती है?
  • यक़ीनन इसकी सबसे बड़ी वजह देश के सबसे बड़े कारोबारी समूह में गिरती परफॉरमेंस ही होगी. 

टाटा ग्रुप वैश्विक कारोबारी समूह है. मिस्त्री को 2013 में इस ग्रुप का चेयरमैन बनाया गया था. टाटा संस 100 से ज्यादा टाटा कम्पनियों की अम्ब्रेला कम्पनी है. उनका चयन आधे से ज्यादा दिग्गज हस्तियों के बीच में से किया गया था. इनमें रतन टाटा के सौतेले भाई नोएल टाटा, वोडाफोन के पूर्व सीईओ अरुण सरीन, पेप्सिको की सीईओ इंदिरा नूई, सिटिग्रुप के सीईओ विक्रम पंडित समेत अन्य लोग शामिल थे.

उन्हें काम संभाले चार साल ही हुआ था मगर इस बीच ऐसा क्या हो गया जिसकी वजह से उन्हें अचानक बाहर करने के रूप में सामने आया.

टाटा ग्रुप प्रबंधन के कोई भी साफ़ संकेत नहीं मिलने पर सिर्फ़ यही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मिस्त्री की अगुवाई में समूह अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही होगी. आंकड़े भी कुछ-कुछ इसी तरफ़ इशारा करते हैं. 

रिकॉर्ड के निशान

मिस्त्री को जब भारत के इस सबसे बड़े समूह की ज़िम्मेदारी दी गई तो कम्पनी अपने पूर्व चेयरमैन रतन टाटा के नेतृत्व में लिए गए कुछ खराब फैसलों की वजह से अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही थी

उनमें से एक था यूरोपीय स्टील निर्माता कोरस का 12.1  बिलियन डॉलर में अधिग्रहण. यह सौदा उस समय तक किसी भी भारतीय कंपनी की तरफ़ से सबसे बड़ा सौदा था. इस कोरस कम्पनी के नाते ही टाटा स्टील के कारोबार में 2007-08 और 2014-15  के बीच 30 फीसदी की गिरावट देखी गई.

मिस्त्री अपना कामकाज संभालने के बाद से तीन साल तक यूरोप की कम्पनियों को चलाते रहे. लेकिन आख़िरकार उन्हें 2016 में यूरोप में घाटे में चल रहे इस्पात कारोबार की बिक्री की घोषणा करनी पड़ी. इसके अलावा मिस्त्री के नेतृत्व में टाटा डोकोमो  (कम्पनी के दूरंसचार क्षेत्र के संयुक्त उद्यम) जिसमें टाटा की 25.6 फीसदी हिस्सेदारी है, कम्पनी से अलग हो गई. टाटा समूह का डोकोमो के साथ एक कानूनी विवाद भी चल रहा है. डोकोमो ने 7,250  करोड़ रुपए की मांग की है.

टाटा कम्पनी यह भुगतान करने को भी तैय़ार थी, पर वित्त मंत्रालय ने यह डील होने की इजाज़त नहीं दी और यह मामला अब न्यायालय में विचाराधीन है. क्या मिस्त्री इन हालात में कुछ कर सकते थे? ज्यादा नहीं तो थोड़ा बहुत ठीक कर सकते थे. 

डोकोमो के साथ कानूनी विवाद में फंसने में मिस्त्री की कोई गलती नहीं थी. चार साल तक टेलीकॉम सेक्टर में अन्य कम्पनियों के साथ मुकाबले में उनकी योग्यता पर कोई सवाल भी नहीं उठा.

गिरते आंकड़े

टाटा डोकोमो का राजस्व 2015-16 में गिरकर 10,708 करोड़ रुपए हो गया जो एक साल पहले 10,965 करोड़ रुपए था. बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक कम्पनी पर मार्च 2016 के आख़िर में लगभग 30,300 करोड़ रुपए का कर्ज था. उसकी फाइनेंसियल कॉस्ट 2015-16 के लिए 2,824 करोड़ रुपए थी. टाटा टेलीसर्विसेज को वर्ष 2015-16  में रिकॉर्ड 31,500 करोड़ का नुकसान हुआ जो इससे पहले कभी नहीं हुआ था. 

कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह संयोगवश ही हुआ. टाटा ग्रुप ने अपने सभी टेलीकॉम बड़े खिलाडिय़ों को बेच दिए थे, ख़ासकर रिलायन्स जियो से मिलने वाली चुनौतियों के मद्देनजर. मिस्त्री के सामने सबसे बडी़ चुनौती टाटा ग्रुप के ऑटोमोबाइल बिजनेस को दोबरा ज़िंदा करने की थी. 

टाटा नैनो में मिली विफलता के बाद यह बिजनेस काफी नीचे की ओर चला गया था. टाटा मोटर्स के प्रबंध निदेशक कार्ल स्लिम के 2014 में बैंकॉक में अचानक निधन के बाद मिस्त्री ने उनका कार्यभार संभाला था. दो साल तक वह इस पद पर रहे जब तक कि गुंटेर बुट्सचेक की जनवरी, 2016 में नियुक्ति नहीं हो गई. 

मिस्त्री के ही नेतृत्व में टाटा मोटर्स ने हर साल दो नई कारें बाजार में लांच करने का निश्चय किया. टाटा जेस्ट एंड बोल्ट बाजार में अपना स्थान नहीं बना सकी लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने कुछ किया ही नहीं. ज्यादा अधिक कि चीन की आर्थिक मंदी का असर टाटा मोटर्स पर भी पड़ा. कम्पनी को दाम कम करने पड़े और अपने ही खुदरा बाजार की बिक्री में काफी गिरावट आई.

असंतुलित होता मुकुट

टाटा संस की कम्पनियों में टाटा कन्सलटेंसी सर्विसेज सिरमौर है. पर वह पिछले एक साल से काफी दबावों में है. कम्पनी अमरीकी बैंकिंग, फाइनेंसियल सर्विसेज एंड इंश्योरेन्स में आई आर्थिक मंदी के चलते अपने राजस्व लक्ष्य को संशोधित करना पड़ा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि इन्फोसिस और विप्रो की तरह से टीसीएस भी शिखर पर था पर लम्बे समय से विदेशी कम्पनियों की वजह से उन्हें कीमतों में दबाव झेलना पड़ रहा था. इस परिदृश्य के चलते पूरी सूचना प्रौद्योगिकी दबाव में आ गई. क्या राजस्व में इस गिरावट को मिस्त्री का विफलता मानी जानी चाहिए.

टाटा संस जैसे बड़े समूह का प्रबंधन कभी भी आसान काम नहीं रहा है. मिस्त्री को ऐसे समय हटाया गया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था ढ़ांचागत बदलाव के दौर से गुजर रही है और व्यापारिक माहौल में अनिश्चितता का दौर है. इकोनामिक टाइम्स के अनुसार इस अवधि में भारत के सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने का टर्नओवर वर्ष 2015-16 में 103 बिलियन डॉलर तक आ गया जो पिछले साल 108 बिलियन डॉलर था. 

टाटा ग्रुप की 27 लिस्टेड कम्पनियों में से 9 कम्पनियां नुकसान में आ गईं थी जबकि सात अन्य की आय में कमी आई है. इन हालात में कोई भी यह सवाल पूछ सकता है कि ऐसे कठिन दौर में मिस्त्री से ज्यादा और कौन बेहतर परफॉरमेन्स कर सकता है?

अनिश्चितता में भी इतनी जल्दी

मिस्त्री ने हाल के दौर में काफी कठिन फैसले लिए थे. उन्होंने मार्च 2016 में टाटा के यूके स्थित स्टील प्लांट को बंद करने की घोषणा की थी. यह सफेद हाथी साबित हो रहा था. इसके पांच महीने बाद ही उन्होंने टाटा मोटर्स के शेयर होल्डर्स को लाभांश नहीं दिए जाने का निश्चय किया. कम्पनी के लिस्टेड होने के बाद यह दूसरा मौका था जब लाभांश न दिए जाने का निश्चय किया गया था.

जब कुछ शेयर होल्डर्स ने लाभांश न दिए जाने की शिकायत की तो मिस्त्री का जवाब था, हम सभी कुछ समय के लिए कठिन दौर में हैं. हमारे पास रिजर्व में फंड नहीं है कि हम लाभांश दे सकें. ऐसे में कोई क्या कह सकता है कि मिस्त्री के नेतृत्व में टाटा ग्रुप की रिकवरी इतनी धीमी हो गई थी कि वह मिस्त्री को हटाने का कारण बनी. 

यदि कोई इसका जवाब हां में देता है तो रतन टाटा की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय टीम जब नए चेयरमैन का चयन करेगी तो नए चेयरमैन का क्राइटेरिया और टारगेट क्या होगा?

अब सब चीजें रतन टाटा के  हाथों में हैं. जिनके नेतृत्व में पिछले 21 सालों में ग्रुप का राजस्व 33 गुना तक बढ़ गया है. यहां तक पहुंचना किसी भी नए चैयरमैन के लिए काफी कठिन काम होगा.

First published: 25 October 2016, 9:14 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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