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दादरी कांडः क्यों यह अखिलेश यादव की नाकामी है?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 November 2015, 12:39 IST
QUICK PILL
  • दादरी\r\nमें भीड़ द्वारा की गई अखलाक\r\nकी हत्या के लिए भाजपा को\r\nजिम्मेदार ठहराया जा रहा है.\r\nलेकिन\r\nइस नृशंस हत्या की जिम्मेदारी\r\nउत्तर प्रदेश की सपा सरकार\r\nपर भी आती है.\r\nतमाम\r\nदलों के नेता अखलाक के परिवार\r\nसे मिलने पहुंचे,\r\nलेकिन\r\nमुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने\r\nदादरी जाने की बजाय अखलाक के\r\nपरिजनों को लखनऊ तलब कर लिया.
  • प्रदेश\r\nमें खराब हो रही कानून व्यवस्था\r\nके लिए जितना जिम्मेदार\r\nदक्षिणपंथी संगठन हैं उससे\r\nज्यादा दोष राज्य के मुख्यमंत्री\r\nअखिलेश यादव का है.\r\nयह\r\nउनकी प्रशासनिक असफलता और\r\nअंधविश्वास का नतीजा है.\r\nअंधविश्वास\r\nयह कि नोएडा का दौरा करने वाला\r\nमुख्यमंत्री अगला चुनाव हार\r\nजाता है.

उत्तर प्रदेश के बिसहड़ा गांव में 28सितंबर को 50वर्षीय मोहम्मद अखलाक को गांव के ही लोगों ने पीट-पीट कर मार डाला. इस घटना के बाद गांव में नामी-गिरामी नेताओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया. पहले केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति राज्य मंत्री महेश शर्मा ने इस हत्या को एक हादसा बताते हुए हास्यापद बयान दिया.

इसके बाद पहुंचने वाले दूसरे हाई प्रोफाइल व्यक्ति एआईएमआईएम सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने इसे पूर्व नियोजित साजिश करार दिया. फिर तीन अक्तूबर को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी बिसहाड़ा पहुंचे. लखनऊ से सपा के कद्दावर नेता आजम खान ने ऐलान किया कि वे इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाएंगे.

बयानबाजी की इस बाढ़ में एक महत्वपूर्ण चेहरा नदारद रहा- उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव. यह घटना उनके सूबे में हुई थी लिहाजा उनसे सबसे पहले बयान की अपेक्षा थी, बिल्कुल उसी तरह जैसे लोगों की अपेक्षा ननरेद्र मोदी से थी.

तो इस अमानवीय घटना के वक्त अखिलेश यादव कहां थे?

जिस सुबह को इस हत्या की खबर पूरे देश की चेतना को झकझोर रही थी उस वक्त अखिलेश यादव भारत और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए एक संगठन के तमाम सीईओ के साथ बैठक कर रहे थे.

घटना के अगले दिन वे गोमती नदी पर एक परिवहन व्यवस्था बनाने के प्रस्ताव को लेकर आए एक विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि मंडल से मिले. इसके अगले दिन वे एक आदिवासी समुदाय की महिला उद्यमियों के एक समूह से मिले और उन्हें बेहतर भविष्य की शुभकामनाएं दीं.

इस तरह की व्यस्तताओं के बीच तीन दिन बीत गए. इसके बाद मुख्यमंत्री ने बयान दिया कि उन्हें इस घटना के बारे में पता था. ऐसा लगता है कि तीन दिन तक उनके प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें खूब बेवकूफ बनाया. घटना के बाद पुलिस ने शुरुआती कार्रवाई करते हुए अखलाक के घर से मिले मांस को जांच के लिए फोरेंसिक प्रयोगशाला भिजवा दिया.

शायद प्रशासन का मकसद यह था कि यदि जांच में गोमांस की पुष्टि होती तो उसके पास भीड़ द्वारा की गई हत्या को उचित ठहराने का एक तर्क मिल जाता. उत्तर प्रदेश के गोहत्या निरोधी कानून की आड़ में सरकार अपना बचाव कर लेती.

अखिलेश : विफलता दर विफलता

सांप्रदायिकता और कानून-व्यवस्था से निपटने में अखिलेश सरकार ने अब तक अपनी अक्षमता ही जाहिर की है. बिसहड़ा में भीड़ द्वारा की गई हत्या भी उनकी अक्षमताओं की लंबी होती सूची की अगली कड़ी भर है. केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, बीते चार वर्षों में उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुई हैं.

2012 में, जिस वर्ष यूपी में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, प्रदेश में साल भर के भीतर 118 सांप्रदायिक दंगे हुए. इसमें 39 लोगों की मौत हुई और 500 लोग घायल हुए. अगले वर्ष 2013 में यह धार्मिक फसादों की संख्या बढ़कर 247 हो गई. इस दौरान 77 लोगों की मौत और 360 लोग घायल हुए.

इस रिकॉर्ड में 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा भी शामिल है. जिसकी भयावहता का अंदाजा केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि इस दंगे में न केवल तमाम मौतें हुईं, बल्कि लोगों के दिलों में बसे डर और असुरक्षा की वजह से 50 हजार लोग अपना घर-बार छोड़कर अन्य जगहों पर विस्थापित हो गए.

अखिलेश के सत्ता संभालने के बाद से अब तक 566 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाों में 152 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. 90 के दशक में मंदिर आंदोलन के बाद धार्मिक फसादों में मरने वालों की यह सबसे बड़ी संख्या है.

2014 में हिंसा की घटनाओं में थोड़ी गिरावट देखने को मिली. आंकड़े 2012 के स्तर पर पहुंच गए. फिर भी इस दौरान 133 घटनाओं में 26 लोगों की मौत हुई और 374लोग घायल हुए. इस साल जून तक 68 घटनाओं में 10 लोगों की जान जा चुकी है जबकि 224लोग घायल हुए हैं.

किसी भी सरकार के लिए ये आंकड़े बेहद शर्मनाक हैं और उत्तर प्रदेश सरकार इसपर सार्वजनिक जांच से बच रही है.

अखिलेश सरकार से यह स्वाभाविक सवाल बनता है कि क्यों उनकी सरकार इन सांप्रदायिक घटनाओं को रोकने में असफल सिद्ध हुई. तमाम घटनाओं के लिए खुले आम मंदिरों, मस्जिदों से अपीले की गईं, लाउडस्पीकर से बिगुल बजाए गए और महापंचायतों में भड़काऊ भाषण दिए गए. यानि ये दंगे किसी गुप्त योजना के तहत अंजाम नहीं दिए गए. इसके बावजूद सरकार और प्रशासन इन्हें रोक पाने में अअसफल रही.

यदि हम मान भी लें कि उत्तर प्रदेश पुलिस के पास खुफिया जानकारी जुटाने के संसाधन नहीं है, फिर भी जो लोग इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं उनके खिलाफ यूट्यूब पर ढेरों सबूत मौजूद हैं. जिस तरह से सांप्रदायिक भावनाएं भड़कीं उनका भी पूरा ब्यौरा मौजूद है. ऐसे में दोषियों को पकड़ने, समय रहते कर्रवाई करके इन घटनाओं को रोका जा सकता था.

मुजफ्फरनगर का दंगा

बिसहड़ा में भीड़ द्वारा मारे गए अखलाक के बेटो पर चार दिन पहले ही गांव के लड़कों ने ताने मारे थे. उन्हें कथित रूप से पाकिस्तानी बताते हुए कहा गया कि वे अपने गांव में एक पाकिस्तानी को नहीं रहने देंगे. उन्होंने धमकी दी कि मुजफ्फरनगर की घटना को फिर से दोहराया जाएगा. घटना के दिन बाकायदा गांव के मंदिर के लाउडस्पीकर से हमले की अपील की गई.

बिगड़े राजनीतिक माहौल में और आम बोलचाल में उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर दंगा अब प्रतीक बन गया है. कुछ समय पहले तक यह तमगा गोधरा और गुजरता को हासिल था. यह एक बड़े खतरे का संकेत है. गांवों में इस कदर धार्मिक कटुता का फैलना दरअसल बुरी तरह से प्रदूषित हो चुके सामाजिक ताने-बाने का संकेत है.

भविष्य में बिसहड़ा भी इसी तरह का बेंचमार्क बन सकता है. यह ऐसा खतरा है जिससे राज्य सरकार ज्यादा दिन तक मुंह नहीं चुरा सकती. अखिलेश यादव न केवल अपने नागरिकों की जान बचाने में नाकाम रहे हैं बल्कि लोगों के मन में कानून-व्यवस्था का भरोसा कायम रख पाने में भी चूक गए हैं. जो जनादेश उन्हें मिला था वह तेजी से खिसक रहा है. 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हालात काबू में करने का उनके पास बहुत कम वक्त बचा है.

First published: 10 November 2015, 12:39 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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