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गुजरात: दलित असंतोष के बाद आरएसएस की समरसता की कोशिश

राजीव खन्ना | Updated on: 6 August 2016, 7:54 IST
QUICK PILL
  • दलित आंदोलन से बुरी तरह घबराए आरएसएस ने अब जाति के मुद्दे को संभालने के लिए धर्म का सहारा लेना शुरू कर दिया है.
  • सामाजिक न्याय की मांग को लेकर आंदोलनकारी दलितों ने अहमदाबाद से उना तक करीब 350 किलोमीटर यात्रा निकाली है. दस दिनों तक चलने वाली यात्रा 15 अगस्त को खत्म होगी. 
  • संघ के संगठन सामाजिक समरसता मंच ने उना में एक सामाजिक सदभाव सम्मेलन का आयोजन किया और इसमें करीब 70 धार्म गुरू शामिल हुए. उन्होंने उना घटना की आलोचना की. सूत्रों की माने तो आरएसएस की इस कोशिश को उम्मीद के मुताबिक प्रतिक्रिया नहीं मिली.

दलित आंदोलन से बुरी तरह घबराए आरएसएस ने अब जाति के मुद्दे को संभालने के लिए धर्म का सहारा लेना शुरू कर दिया है.

सामाजिक  न्याय की मांग को लेकर आंदोलनकारी दलितों ने अहमदाबाद से उना तक करीब 350 किलोमीटर यात्रा निकाली है. दस दिनों तक चलने वाली यात्रा 15 अगस्त को खत्म होगी. 

गोरक्षा के नाम पर शिवसेना के गुंडों द्वारा दलितों को पीटे जाने का वीडियो सार्वजनिक होने के बाद उना चर्चा में आया था. उना प्रकरण के बाद पूरे राज्य में दलितों का आंदोलन जोर पकड़ चुका है. 

घटना के तीन हफ्ते बाद दलितों ने राज्य में जबरदस्त आंदोलन की शुरुआत करते हुए मरे हुए जानवरों का चमड़ा नहीं उतारने के संकल्प के साथ अपनी सुरक्षा के लिए हथियार का लाइेंस दिए जाने की मांग की है. अब आरएसएस ने दलितों को शांत करने के लिए सामाजिक समरसता मंच को आगे बढ़ाया है. यह आरएसएस का ही संगठन है.

सामाजिक समरसता मंच ने उना में एक सामाजिक सदभाव सम्मेलन का आयोजन किया और इसमें करीब 70 धार्मिक नेताओं को शामिल किया गया जिन्होंने उना घटना की आलोचना की. सूत्रों की माने तो आरएसएस की इस कोशिश को उम्मीद के मुताबिक प्रतिक्रिया नहीं मिली.

विश्लेषकों की माने तो आरएसएस और अन्य हिंदू संगठन दलितों के अन्य धर्म अपनाए जाने को लेकर चिंतित हैं

आरएसएस के शीर्ष नेता और आध्यात्मिक गुरु स्वामी परमात्मानंद ने गांव में जाकर उन युवाओं के परिवार से मुलाकात की जिन्हें पीटा गया था. 

कार्यक्रम में पारित किए गए प्रस्ताव में कहा गया है, 'उना के निकट गांव मोटा समाधियाला और अन्य इलाकों में हुए ऐसी घटनाएं निंदनीय और अमानवीय है.' इसमें कहा गया है कि आध्यात्मिक गुरु गोरक्षा के नाम पर होने वाली गुंडागिरी का विरोध करेंगे. गोरक्षा के नाम पर चल रही समाज विरोधी गतिविधियों को रोका जाना जरूरी है. यह एक सामाजिक अपराध है जिससेे गोरक्षा के नाम पर निर्दोष दलित भाइयों के साथ क्रूरता की जाती है.

प्रस्ताव में कहा गया है, 'छुआ छूत हिंदू समाज की कमजोरी है और इसे बड़ी संख्या में लोग मानते हैं. संत समाज पर इस बीमारी और मानसिक बीमारी को ठीक करने की जरूरत है.'

सम्मेलन के आयोजन का फैसला कई दौर की बैठक के बाद लिया गया और यह तय कि या गया कि दलितों को दूर जाने से रोकने के लिए आध्यात्मिक गुरुओं की मदद ली जाएगी.

इसके बाद सौराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों से संतों को बुलाया गया. यहां यह जानना जरूरी है कि सौराष्ट्र के क्षेत्र में संतों का जबरदस्त प्रभाव है. आरएसएस ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने की पूरी कोशिश की. एक स्थानीय पत्रकार ने बताया, 'हमें उस वक्त आश्चर्य हुआ जब हमें इस कार्यक्रम को कवर करने के लिए कई बार कहा गया. जबकि आरएसएस अपने आप को मीडिया से हमेशा दूर रखता है.'

आरएसएस में गुजरात के हिंदुत्व की प्रयोगशाला की छवि टूटने से चिंता बढ़ी हुई है

विश्लेषकों की माने तो आरएसएस और अन्य हिंदू संगठन दलितों के अन्य धर्म अपनाए जाने को लेकर चिंतित हैं. राजकोट के एक स्थानीय पत्रकार ने बताया, 'अभी तक दलित किसी पार्टी के खिलाफ गुस्सा जाहि कर देते थे लेकिन अब चीजें बहुत बिगड़ गई हैं.'

दलित कार्यकर्ता किरीट राठौड़ ने कैच न्यूज को बताया, 'आरएसएस धर्म के नाम पर दलितों को लुभाना चाहता है. दलितों को लगता है उन्हें अब लॉलीपॉप दिया जा रहा है. आरएसएस गुजरात के हिंदुत्व के प्रयोगशाला की छवि टूटने से चिंतित है. हाल के दिनों में हुए घटनाक्रम ने नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की पोल खोल कर रख दी है.'

राठौड़ ने कहा, 'आरएसएस दलितों के धर्मांतरण को लेकर चिंतित है. भावनगर जिले के करीब 200 दलित युवाओं ने धर्म बदलने की चेतावनी दी है. यह रुकने नहीं जा रहा है.'

दलित अस्मिता यात्रा ने आजादी कूच का नारा दिया है. अत्याचार लड़त समिति इस आंदोलन की अगुवाई कर रही है. यह हिंदुत्व की ताकतों को चिंतित कर रही है. रैली के आयोजक जिग्नेश मेवानी ने कहा, 'हम बीजेपी और आरएसएस का हिंदू स्तंभ नहीं होना चाहते. हम आंबेडकर के सामाजिक न्याय को चाहते हैं.'

उन्होंने कहा  कि इस यात्रा का मकसद सौराष्ट्र के गांवों के दलितों को जोड़ना है. उन्होंने कहा, 'हम उनकी समस्या पर हर दिन चर्चा करते हैं. हम चाहते हैं कि दलितों को जमीन दी जाए ताकि दलितों कोे अमानवीय काम नहीं करना पड़े. जातिगत भेदभाव भूमि सुधार से जाएगा. जिनके पास जमीन है, उनके पास ताकत है. आखिर दलितों को ही जानवरों की चमड़ी क्यों उतारनी चाहिए और नालों की सफाई क्यों करनी चाहिए.

कई लोगों का मानना है कि गुजरात में सामजिक क्रांति हो रही है. एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने बताया, 'हिंदुत्व की राजनीति करने वाले मानते हैं कि सभी हिंदू बराबर हैं लेकिन ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं और दलित निम्न हैं.'

First published: 6 August 2016, 7:54 IST
 
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