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गुजरात में दलित की पीट-पीटकर की गई हत्या तो सिर्फ नमूना भर है

सुधाकर सिंह | Updated on: 11 July 2016, 7:50 IST
(कैच न्यूज)
QUICK PILL
  • सामाजिक तौर पर होने वाला अपमान और अन्य कई स्तरों पर होने वाला भेदभाव गुजरात की निचली जातियों के लिये एक रोजमर्रा की घटना है.
  • ये मामले तब तक सुर्खियों में नहीं आते हैं जब तक कि पीड़ित अपनी जान से हाथ नहीं धो बैठता है जैसा कि महात्मा गांधी के जन्मस्थान पोरबंदर जिले के सोधनपुर गांव के रहने वाले राम सिंग्राहिया के साथ हुआ.

पोरबंदर में एक दलित किसान की पीट-पीटकर की गई हत्या इस बात का सिर्फ एक संकेत भर है कि कैसे विकास के आदर्श माॅडल का दम भरने वाले गुजरात राज्य में निचली जातियों के लोगों को अभी भी सवर्णों द्वारा किये जा उत्पीड़न से गुजरना पड़ रहा है.

सामाजिक तौर पर होने वाला अपमान और अन्य कई स्तरों पर होने वाला भेदभाव गुजरात की निचली जातियों के लिये एक रोजमर्रा की घटना है लेकिन ये मामले तब तक सुर्खियों में नहीं आते हैं जब तक कि पीड़ित अपनी जान से हाथ नहीं धो बैठता है जैसा कि महात्मा गांधी के जन्मस्थान पोरबंदर जिले के सोधनपुर गांव के रहने वाले राम सिंग्राहिया के साथ हुआ.

42 वर्षीय इस दलित को उच्च जातियों के अत्याचार के चलते सिर्फ इसलिये अपनी जान से हाथ धोना पड़ा क्योंकि उसने अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के फेर में ‘गोचर’ (चराई की भूमि) के रूप में चिन्हांकित की गई सरकार जमीन पर खेती करने का प्रयास किया था. मूल रूप से राज्य में यह काम उच्च जाति के लोग अक्सर जमीन के बड़े-बड़े टुकड़ों पर करते आये हैं.

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इस दलित किसान की जान प्रभावशाली माने जाने वाले मेर समुदाय के लोगों ने ली. यह पोरबंदर की एक प्रभावशाली उच्च जाति है. गौरतलब है कि दो दशकों तक इस क्षेत्र में आतंक का पर्याय मानी जाने वाली विवादास्पद ‘गाॅडमदर’ संतोष बेन इसी समुदाय से संबंध रखती थीं.

गोचर जमीन का मामला

राम सिंग्राहिया का कसूर यह था कि उसने एक नकदी फसल, कैस्टर सीड (अरंडी के बीज) उगाने की हिमाकत की थी, जिसे मूलतः अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए इस इलाके के सवर्ण और बड़े किसान अक्सर करते हैं. क्षेत्र के ज्यादातर दलित अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिये छोटी-मोटी खेती ही करते हैं.

जाने-माने सामाजिक वैज्ञानिक और लेखक अच्युत याग्निक कहते हैं, 'गुजरात में बड़े पैमाने पर फैली सरकारी स्वामित्व वाली ‘‘गोचर’’ जमीन पर गैरकानूनी रूप से खेती करने का काम बड़े पैमाने पर होता है और सभी जातियों के लोग इस काम में सम्मिलित हैं.' 

वे बताते हैं कि किसी भी क्षेत्र विशेष में जो भी जाति प्रभावशाली है उस क्षेत्र की ‘गोचर’ भूमि का बड़ा हिस्सा उसी जाति के अवैध कब्जे में है.

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पोरबंदर में बुधवार को मार डाले गए दलित किसान पर उच्च जातियों द्वारा किये गए अत्याचार के संभावित कारणों के बारे में बात करते हुए याग्निक कहते हैं कि यह गैरकानूनी खेती हर जाति के लोगों द्वारा अपने हिस्से की ‘गोचर’ भूमि में की जाती है, जब कभी भी निम्न जातियों के लोग नकदी फसले उगाना प्रारंभ करते हैं तभी उच्च जातियों के लोगों को दिक्कत होने लगती है.

पूर्व के अपराध

जुलाई 2001 में भी करीब-करीब ऐसा ही एक मामला जूनागढ़ जिले के वंथली तालुका में घटित हुआ था जब उच्च जाति के लोगों ने गांव के करीब 100 दलित परिवारों को गांव से निष्कासित कर दिया था. उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने निचली जातियों के अवैध स्वामित्व वाली ‘गोचर’ भूमि में  नकदी फसल मानी जाने वाली मूंगफली की फसल उगाने का दुस्साहस किया था.

करीब एक महीने तक जूनागढ़ के जिलाधिकारी के दफ्तर के बाहर डेरा डाले रखने के बाद करीब 100 दलित परिवारों को न्याय का आसरा तब मिला जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने जबर्दस्ती के इस निष्कासन का संज्ञान लिया.

अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास करना ही सिर्फ अकेली ऐसी गतिविधि नहीं है जो गुजरात में उच्च जातियों को पसंद न आती हो. व्यापार के लिये मशहूर इस राज्य में उच्च जातियों द्वारा संचालित किये जाने वाले किसी भी अवैध आर्थिक गतिविधि के खिलाफ कानून का सहारा लेना भी दलितों को काफी भारी पड़ सकता है.

उच्च जातियों के लोगों ने परिजनों को इतना आतंकित कर दिया था कि पिता को मुख्यमंत्री के सामने गुहार लगानी पड़ी

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अबसे आठ वर्ष पूर्व गीर सोमनाथ जिले के उना तालुका में अपने गांव के निकट हो रहे अवैध खनन के बारे में जिलाधिकारी को शिकायत करने वाले एक दलित को उच्च जातियों के लोगों ने जलाकर मार डाला था. 

हालांकि इस घटना के दोषी अब जेल में हैं और उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा चल रहा है लेकिन उच्च जातियों के लोगों ने उसके परिजनों को इतना आतंकित कर दिया था कि उसके पिता को मुख्यमंत्री के सामने गुहार लगानी पड़ी थी जिन्होंने बदले में उन्हें एक दूसरे गांव में जमीन का टुकड़ा देने का आश्वासन दिया था. 

भावनात्मक रूप से टूट चुके कालूभाई और उनके बेटे का कहना है कि अगर तय समय सीमा के भीतर उन्हें वायदा की गई जमीन नहीं दी जाती है तो वे आत्महत्या कर लेंगे. मानवाधिकार कार्यकर्ता अशोक श्रीमाली बताते हैं कि करीब 10 दिन पूर्व इन पिता-पुत्र को आत्महत्या की धमकी देने का आरोप लगाते हुए गिरफ्तार कर लिया गया.

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अपमान, उत्पीड़न और दलितों पर होने वाला जानलेवा अत्याचार अक्सर सुर्खियों में नहीं आता है क्योंकि यहां के लोग अब इस प्रकार की घटनाओं को सामान्य मानते हुए ऐसा मानने लगे हैं कि ऐसी घटनाएं तो समय के साथ होती ही रहती हैं.

खून से सने हाथ

इसी वर्ष अप्रैल के महीने में 24 वर्षीय दलित चेतन वाघेला ने अपनी शादी की बारात में घोड़े पर बैठने की हिमाकत की थी. उच्च जाति के राजपूतों ने उसके विवाह समारोह में हमला कर दिया और दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया क्योंकि उन्हें अपनी मौजूदगी में एक दलित लड़के का घोड़े पर बैठना नागवार गुजरा.

इसके अलावा उत्तरी गुजरात में नाई की एक दुकान में नीची जाति के एक युवक के बाल सिर्फ इसलिये नहीं काटे गए क्योंकि ऐसा करने पर उच्च जाति के लोगों ने उस नाई को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी.

ओबीसी, एससी, एसटी एकता मंच के अध्यक्ष अल्पेश ठाकोर का कहना है कि पूरे गुजरात के करीब 2000 गांवों में दलितों को दोपहर के दो बजे से पहले कुंओं से पानी निकालने तक की आजादी नहीं है और ऐसा सिर्फ निम्न जाति वालों के लिये निर्धारित कुंओं की स्थिति है.

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यहां तक कि आपस में होने वाले टकरावों के दौरान पुलिस की गोलीबारी में भी आमतौर पर दलित ही उच्च जातियों के मुकाबले गोलियों का अधिक शिकार होते हैं. सितंबर 2012 में सुरेंद्रनगर जिले के थांगध में दलितों और सवर्णों की पंचायत में हुए टकराव के दौरान ऐसा ही हुआ था, जब पुलिस ने आपस में टकरा गए दोनों समूहों पर गोली चलाई, इसमें कम से कम तीन दलितों की जान गई और कई गंभीर रूप से घायल हो गए.

First published: 11 July 2016, 7:50 IST
 
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