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'जनहित' है इस दलित मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी की वजह

राजकुमार सोनी | Updated on: 8 April 2016, 9:52 IST
QUICK PILL
  • प्रभाकर ग्वाल की बर्खास्तगी का एक प्रमुख कारण \'जनहित\' बताया गया है. इस \'जनहित\' को किसी तरह से परिभाषित नहीं किया गया है. न तो उनके ऊपर कोई गंभीर अनियमितता के आरोप थे न ही उनकी छवि किसी भ्रष्ट अधिकारी की थी
  • इसके उलट प्रभाकर ग्वाल को एक दबंग, ईमानदार और अपने फैसलों से मिसाल कायम करने वाला मजिस्ट्रेट माना जाता था

चंद रोज पहले तक प्रभाकर ग्वाल माओवाद प्रभावित बस्तर के सुकमा जिले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट थे, लेकिन बीती एक अप्रैल को उच्च न्यायालय की फुल बेंच की अनुशंसा के बाद छत्तीसगढ़ के विधि विभाग ने उन्हें बर्खास्त कर दिया है.

उनकी बर्खास्तगी का एक प्रमुख कारण 'जनहित' बताया गया है. इस 'जनहित' को किसी तरह से परिभाषित नहीं किया गया है. न तो उनके ऊपर कोई गंभीर अनियमितता के आरोप थे न ही उनकी छवि किसी भ्रष्ट अधिकारी की थी. इसके उलट उन्हें एक दबंग, ईमानदार और अपने फैसलों से मिसाल कायम करने वाला मजिस्ट्रेट माना जाता था.

नेताओं और अफसरों के खिलाफ दिए गए सख्त फैसलों के चलते सुर्खियों में रहे इस दलित मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी के बाद एक बहस चल पड़ी है कि जनहित ही उनकी बर्खास्तगी की वजह है या फिर कुछ और. इतने कमजोर आधार पर एक मजिस्ट्रेट की बर्खास्तगी से विरोध के स्वर फूटने लगे हैं.

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ग्वाल 2006 को न्यायिक सेवा में चुने गए थे. सबसे पहले उनकी तैनाती दुर्ग जिले में हुई थी. बीती 12 फरवरी को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और रजिस्ट्रार जनरल को जो शिकायत भेजी है उसमें साफ तौर पर यह लिखा है कि वर्ष 2008-09 में जब वे दुर्ग जिले में पदस्थ थे तब एक मामले में न्यायाधीश सिराज कुरैशी और सीबीआई मामलों को देखने वाले तात्कालीन अधिवक्ता शहाबुद्दीन ने कुछ निर्णय बदलने के लिए उन्हें प्रलोभन दिया था.

इसके अलावा भी ग्वाल ने बीते कुछ सालों में अपने फैसलों से रसूखदार लोगों को परेशान किया है. ग्वाल कहते हैं, 'मैं प्रलोभन स्वीकार नहीं कर पाया. न्याय देने के दौरान यह नहीं देखा कि कौन बाहुबली और ताकतवर है. बस इतनी ही गलती थी मेरी. मेरे फैसले सरकार को खटक रहे थे जिसके चलते मुझे बर्खास्त कर दिया गया.'

चौतरफा विरोध

इससे पहले वर्ष 2013 में छत्तीसगढ़ में 17 जजों को अनिवार्य तौर पर सेवानिवृत कर दिया था. इसमें अधिकांश आदिवासी और दलित थे, लेकिन तब इस मामले की उतनी चर्चा नहीं हो पाई थी जितनी ग्वाल की बर्खास्तगी को लेकर हो रही है.

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दलित मामलों के जानकार कामता रात्रे उनकी बर्खास्तगी के पीछे एक साजिश देखते हैं. वे कहते हैं, 'छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जातियों को कुचलने का खेल लंबे समय से चल रहा है. ग्वाल को भी सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे ऊंची जाति के नहीं थे.'

रात्रे की बातों की तस्दीक ग्वाल के शिकायती पत्र से भी होती है. ग्वाल ने अपने साथ हुए भेदभाव की सिलसिलेवार जानकारी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र के माध्यम से दी है, 'छत्तीसगढ़ में सिविल जजों और अपर सत्र न्यायाधीशों के साथ हमेशा भेदभाव होता रहा है. अपनी सेवा और रोजी-रोटी के डर से कोई आवाज नहीं उठा पा रहा है. मुख्य रूप से यह भेदभाव छत्तीसगढ़ के जज और बाहरी जज के आधार पर होता है, जज परिवार और गैर जज परिवार के आधार पर, अंग्रेजी जानने और नहीं जानने वाले जज के आधार पर होता है.'

छत्तीसगढ़ में सिविल जजों और अपर सत्र न्यायाधीशों के साथ हमेशा भेदभाव होता रहा है

सामाजिक कार्यकर्ता संकेत ठाकुर को भी उनकी बर्खास्तगी के पीछे साजिश नजर आती है. वे कहते हैं, 'छत्तीसगढ़ सरकार में ऊंची जाति के लोगों का बोलबाला है. एक दलित अधिकारी के कड़े फैसले को सरकार हजम नहीं कर पा रही है. इस वजह से उन्हें ठिकाने लगा दिया गया.'

फैसले जिनकी चर्चा रही

21अक्टूबर 2014को बिलासपुर जिले के भदौरा इलाके में एक जमीन घोटाले में ग्वाल ने पटवारी, उपसरपंच समेत तीन आरोपियों को सात अलग-अलग मामलों में तीन-तीन साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी. इस मामले में भाजपा के एक कद्दावर मंत्री अमर अग्रवाल की भी भूमिका थी.

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पिछले साल 17 जुलाई को ग्वाल ने पीएमटी पर्चालीक कांड में फैसला दिया तो प्रदेश में उनके इस फैसले की खासी हलचल मची. मामले से जुड़े सभी आरोपियों को सजा सुनाने के साथ ही रायपुर के तात्कालीक पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा की भूमिका को लेकर न केवल तल्ख टिप्पणी की, बल्कि फैसले की एक कॉपी पुलिस महानिदेशक को भेजते हुए प्रकरण में लापरवाही बरतने के कारण पुलिस अधीक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने को भी कहा था.

रायपुर में सीबीआई का विशेष मजिस्ट्रेट रहते हुए बिलासपुर के पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा की मौत के मामले में मृतक के रिश्तेदारों, विवेचक और घटनास्थल पर मौजूद गवाहों को नोटिस जारी करने के निर्देश की भी खूब चर्चा हुई.

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सुकमा में धोखाधड़ी और गबन के मामले में ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के दो इंजीनियरों को 12-12 साल के कारावास और 50-50 लाख के जुर्माने का फैसला भी चर्चा में रहा.

इस वजह से भी चर्चा में रहे ग्वाल

भाजपा के एक विधायक रामलाल चौहान ने कथित तौर पर उन्हें पीएमटी पर्चालीक कांड के दौरान पहले प्रलोभन दिया और बाद में यह कहकर धमकाया था कि उन्हें किसी झूठे मामले में फंसा दिया जाएगा. ग्वाल ने इसकी लिखित शिकायत थाने में की और तात्कालीन पुलिस अधीक्षक दीपांशु काबरा से अपनी जान का खतरा बताया था.

भाजपा विधायक रामलाल चौहान ने कथित तौर पर ग्वाल को धमकाया था

महासमुंद जिले के पास स्थित आरंग के टोल नाके में कुछ लोगों ने ग्वाल के साथ मारपीट की तब उन्होंने इसकी शिकायत थाने में की. पुलिस की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं किए जाने पर उन्होंने साफ कहा कि विधायक के गुंडे उन्हें मारना चाहते हैं.

पिछले साल दिसम्बर में सुकमा के कलक्टर नीरज बंसोड ने उन पर किसी भी तरह का फैसला लेने के पहले जरूरी सलाह लेने के लिए दबाव बनाया था. ग्वाल ने कलक्टर की इस हरकत को न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप मानते हुए उच्च स्तरीय शिकायत की. तब कलक्टर की आवाज का टेप भी वायरल हुआ था.

First published: 8 April 2016, 9:52 IST
 
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