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दलित आंदोलन के ऐतिहासिक आईने में उना रैली का अक्‍स

अभिषेक श्रीवास्तव | Updated on: 20 August 2016, 7:41 IST

गुजराती की एक लघु कथा है तमे पाबा ने जोयो? (क्‍या तुमने पाबा को देखा है?). आरक्षण विरोधी आंदोलन की पृष्‍ठभूमि में धीरज ब्रह्मभट्ट ने 1981 में यह कहानी लिखी थी, जिसका नायक पाबा नाम का एक जमादार है. कथानक एक घर के सामने मरे पड़े एक कुत्‍ते का है. घरवाले दंपत्ति पाबा की प्रतीक्षा में हैं. पाबा को देखते ही वे प्रफुल्लित हो जाते हैं, लेकिन उसके दिमाग में तो आरक्षण विरोधी आंदोलन चल रहा है. उसने अपना काम छोड़ने का फैसला कर लिया है. इसलिए जब उससे कुत्‍ते को फेंकने के लिए कहा जाता है, तो वह पलट कर जवाब देता है, ''हम लोग साझा काम में विश्‍वास करते हैं. क्‍यों नहीं आप ही इसे उठाकर फेंक देते? गली के लोग आपको दुआएं देंगे.'' मकान मालकिन जब उससे आग्रह करती है, तो वह व्‍यंग्‍य में जवाब देता है, ''हमने ऐसे काम सवर्णों के लिए आरक्षित कर दिए हैं.''

25 दिसंबर 1980 की रात अहमदाबाद से कोई 15 किलोमीटर दक्षिण में स्थित जेतलपुर गांव में पटेल युवकों ने एक दलित शकराभाई, एक चौकीदार और दलित पैंथर के एक कार्यकर्ता की निर्मम हत्‍या कर दी थी, जिसके हफ्ते भर बाद राज्‍य में आरक्षण विरोधी आंदोलन की आग भड़की थी. उपर्युक्‍त कहानी में इस आंदोलन से दलितों के भीतर पैदा हुई चेतना की झलक मिलती है.

आज पैंतीस साल बाद जब गुजरात का दलित यह कह रहा है कि वह मरी हुई गाय की खाल नहीं उतारेगा, तो अचानक यह बात पूरे देश में दलित सरोकारों से वास्‍ता रखने वालों को इतनी मौलिक क्‍यों जान पड़ रही है?

बीते 15 अगस्‍त को गुजरात के उना में दस दिन के बाद संपन्‍न हुई दलित अस्मिता यात्रा को लेकर जो भी भ्रम और उत्‍साह है, उसकी मूल वजह गुजरात और खासकर सौराष्‍ट्र में दलित आंदोलन व दलितों के ज़मीनी हालात को लेकर सार्वजनिक जानकारी का अभाव है. उत्‍तर भारत में लोकप्रिय चुनावी चश्‍मे से आंदोलनों को देखने वाले लोग महज तीन साल पहले की घटना को भूल चुके हैं जब जूनागढ़ में 80,000 दलितों ने एक साथ बौद्ध धर्म में दीक्षा लेकर तूफान खड़ा कर दिया था. 

उना में बीते चार दशक से दलितों को गांव-गांव जाकर जगा रहे चंद्रसिंह महीडा कहते हैं, ''गुजरात के दलित आंदोलन ने गांधीनगर के विठुलपुर गांव के जेठाभाई की शहादत देखी है. यहां बाबासाहेब की पार्टी आरपीआइ से लेकर भारतीय बौद्ध महासंघ का गांव-गांव में तगड़ा काम रहा है. गाय का काम छोड़ने की जो बात जिग्‍नेश आज कर रहे हैं, वो तो यहां बहुत पुरानी हो चुकी. केवल पांच फीसदी दलित यहां मजबूरी में आजीविका के लिए यह काम करते हैं, बाकी यह काम खुद छोड़ चुके हैं.''

सौराष्‍ट्र में दलित आंदोलन का इतिहास लिखने वाले अवकाश प्राप्‍त प्रोफेसर पीजी ज्‍योतिकर बताते हैं कि गुजरात के छह फीसदी दलितों में केवल 23 फीसदी चर्मकार हैं जिनमें बमुश्किल 10 फीसदी ही पशुओं की खाल उतारने के काम में लगे हैं. वे इस बात से सहमत हैं कि मरे हुए पशुओं की खाल उतारने का काम पूरी तरह बंद होना चाहिए, लेकिन पूछते हैं, ''जो लोग इस नारे को आज फिर से उठा रहे हैं, उनके पास क्‍या दलितों के लिए आजीविका का कोई और विकल्‍प है? नहीं... यह तो दलितों का राजनीतिक दोहन है.''

उना रैली को वैसे तो मुद्दे के आधार पर सभी दलित संगठनों ने अपना समर्थन दिया था, लेकिन बरसों से यहां ज़मीन पर काम कर रहे दलित आंदोलनकारी इसमें कुछ बदलावकारी नहीं देख पा रहे. दलित पैंथर्स के गुजरात राज्‍य अध्‍यक्ष चिराग राजवंश इस बारे में साफ़ मत रखते हैं, ''कौन रैली करे, कौन समर्थन करे, यह ज्‍यादा मायने नहीं रखता. हमने तो 19 जुलाई को ही रैली की थी और 20 जुलाई को गुजरात बंद का आह्वान किया था. 1997 के बाद पहली बार हमने गुजरात बंद का आवाहन किया. दलित और मुस्लिम ही क्‍यों, हम तो मानते हैं कि एससी, एसटी, ओबीसी, मुस्लिम को मिलाकर कुल 85 वंचित जनता को एक तरफ़ होना चाहिए. असल सवाल समानता का है.''

रैली के प्रभाव के बारे में वे कहते हैं, ''देखिए, पहले तो यह पता चले कि रैली किसने और क्‍यों की. मुद्दा सही था, इसलिए हमारा समर्थन था.''

गुजरात में दलितों के बीच काम करने वाले संगठनों की लंबी फेहरिस्‍त रही है. कांग्रेस का मजदूर महाजन संघ, आर्य समाज, आंबेडकर का बनाया शेड्यूल कास्‍ट फेडरेशन, कांग्रेस का हरिजन सेवक संघ, बौद्ध महासंघ आदि तमाम संगठनों के मिलेजुले काम ने यहां बीते अस्‍सी साल में दलितों की चेतना को जागरूक करने का काम किया है. 

बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने तो 1882-83 में ही यहां सभी के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान कर दिया था और बड़ौदा, नवसारी, पाटन व अमरेली में चार अंत्‍यज स्‍कूल व हॉस्‍टल खुलवाए थे. उनकी 1939 में हुई मौत और 1931 में बाबासाहब आंबेडकर के अहमदाबाद आगमन के बाद से यहां आंबेडकरवादी विचारधारा का जो काम चालू हुआ, वह आज तक ज़मीनी स्‍तर पर चालू है जिसका प्रतिफल दलितों के घर में लगी बाबासाहब की तस्‍वीरों के रूप में दिखता है.

संकट यह है कि संसदीय लोकतंत्र में चूंकि सिर गिने जाते हैं, इसलिए करीब सात फीसदी दलितों की राजनीतिक नुमाइंदगी गुजरात में कभी प्रभावशाली नहीं रही. गुजरात के चुनावों का जि़क्र हमेशा पाटीदारों और पटेलों के संदर्भ में किया जाता रहा है, कभी-कभार ऊंची जातियों का जि़क्र आता है और कुछ जगहों पर आदिवासियों की बात आ जाती है. दलितों को यहां राजनीतिक दल अपना वोटबैंक नहीं मानते. उनकी संख्‍या न केवल कम है, बल्कि राज्‍य भर में उनका प्रसार कुछ इस तरह है कि वे अधिकतर चुनाव क्षेत्रों में परिणामों को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखते. 

गुजरात में केवल 13 असेंबली सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं. इतना ही नहीं, अकेले दानिलिमड़ा असेंबली सीट ऐसी है जहां दलित कुल मतदाताओं के 20 फीसदी से ज्‍यादा हैं वरना अन्‍य 10 सीटों (असारवा, ठक्‍करबा, वडगाम, इदर, अमराइवाड़ी, घांडीढ़, कोडिनार, लामलपुर, ढोलका और थराड़) पर दलित कुल मतदाताओं के 15-19 फीसदी के बीच हैं. बाकी 30 असेंबली सीटों पर दलित मतदाता 10 से 15 फीसदी के बीच ही हैं.

चूंकि प्रत्‍येक असेंबली में मतदाताओं की संख्‍या दो लाख से थोड़ी ज्‍यादा है, लिहाजा मोटे तौर पर 40 असेंबली सीटों पर दलित मतदाता औसतन 20,000 के आसपास पड़ते हैं. यह संख्‍या 2012 के असेंबली चुनाव में जीत के औसत मार्जिन से भी कम है. यह ध्‍यान देने वाली बात है कि जीत का औसत मार्जिन जो 2002 में 17,500 था, वह 2007 में बढ़कर 18,896 और 2012 तक आते-आते 21,663 पर पहुंच गया. 

यह भी ध्‍यान देने वाली बात है कि कांग्रेस के लिए जीत का औसत मार्जिन जहां करीब 10,000 रहा है (2012 में अधिकतम 13,577), वहीं बीजेपी के लिए यह कहीं ज्‍यादा रहा है. इससे यह साबित होता है कि अगर सारे दलित मतदाता एकतरफ़ा तरीके से बीजेपी के खिलाफ़ वोट कर दें, तब भी वे चुनाव परिणाम पर असर नहीं डाल सकते. (सभी आंकड़े सीएसडीएस के अध्‍ययन से).

शायद यही वजह है कि यहां के दलित आंदोलनकारियों ने बदलाव के लिए कभी भी चुनाव का मुंह नहीं देखा और वे लगातार सामाजिक-सांस्‍कृतिक आंदोलन में यकीन करते रहे. चंद्रसिंह महीडा बताते हैं, ''साठ के दशक में सौराष्‍ट्र में अमीरभाई, मनोहरदास सोलंकी, नानजीभाई जैसे लोगों ने घर-घर जाकर आंबेडकर का संदेश फैलाया. यह उनकी विरासत है कि आज गुजरात के समाज में नब्‍बे फीसदी दलित अपने परंपरागत काम को छोड़कर मजदूरी और दूसरे काम कर रहा है. हम मानते हैं कि दलितों को ब्राह्मणवाद से मुक्‍त करने का काम सामाजिक-सांस्‍कृतिक है, न कि राजनीतिक. चुनावी राजनीति हमारा इस्‍तेमाल कर ले जाएगी, हम इस खतरे को अच्‍छे से समझते हैं.''

यहां दलित आंदोलन से जुड़े तमाम लोगों का मानना है कि उना में 11 जुलाई को चार दलित युवकों की सवर्णों द्वारा की गई पिटाई के बाद दो महीने के भीतर बुलाई गई पदयात्रा का मकसद चुनावी राजनीति है. दूसरी ओर 'आज़ादी कूच' का आवाहन करने वाले युवा जिग्‍नेश मेवाणी दावा करते हैं कि यह रैली 'अराजनीतिक' थी. दरअसल, इस घटनाक्रम को सोशल मीडिया और अन्‍य माध्यमों से समझ रहे लोगों के सामने संकट यह है कि वे या तो इस ताज़ा दलित उभार के अंधसमर्थन में हैं अथवा विरोध में, जबकि दलित राजनीति के जमीनी चेहरों से वे बिलकुल भी वाकिफ़ नहीं है. 

15 अगस्‍त की रैली का सच बहुत धुंधला है. उसे पकड़ने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा, लेकिन संकट यह है कि गुजरात में दलित राजनीति का इतिहास सार्वजनिक तौर पर आसानी से उपलब्‍ध नहीं है. वह यहां के दलित साहित्‍य में बेशक भरपूर संग्रहित है, पर वहां भाषायी अड़चन है.

बहरहाल, जमीनी स्थिति की जटिलता को समझने के लिए 14 अगस्‍त की एक घटना काम आ सकती है. भारतीय बौद्ध संघ के अध्‍यक्ष संघप्रिय राहुल ने उस दिन मोटा समढियाला गांव का दौरा किया.

उन्‍होंने बालूभाई के पीडि़त परिवार और अन्‍य लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ''विश्‍व हिंदू परिषद और संघ परिवार जैसे हिंदू धर्म के ठेकेदारों से मेरा पूछना है कि आप दलितों को आखिर कब गले लगाओगे. आप ये साफ़ कर दो वरना दलित समाज जब आपका साथ छोड़ेगा तो आप कहीं के नहीं होगे. एक मुसलमान सौ हिंदुओं पर भारी पडता है... दस हिंदुओं पर, अगर दलित आपका साथ न दे. ये आपको सोचना चाहिए कि गोधरा कांड में दलित ने आपका साथ दिया है. ये भी आपका भाई है.''

इस बयान पर जो तालियां बजीं, वे 15 अगस्‍त की रैली में लगाए गए दलित-मुस्लिम एकता के नारे को कठघरे में खड़ा करती हैं जहां हजारों की भीड़ में अहमदाबाद की एक संस्‍था से लाए गए उंगलियों पर गिने जाने लायक मुसलमान मौजूद थे.

उना में 11 जुलाई की घटना के बाद इलाके में कई संदिग्‍ध ताकतें सक्रिय हैं. जो खुद के अराजनीतिक होने का दावा कर रहे हैं, वे भी अपने तरीके से राजनीति ही कर रहे हैं. रैली का तात्‍कालिक प्रभाव दलितों पर तेज़ हुए हिंसक हमलों के रूप में सामने आ चुका है. उना के आसपास चौबीस गांव दलितों का बहिष्‍कार कर चुके हैं. रैली से दो दिन पहले शुरू हुए जघन्‍य हमले अब तक जारी हैं. इन स्थितियों के बीच आखिरी सवाल यह बचता है कि क्‍या ''आज़ादी कूच'' का गुजरात के दलितों के लिए कोई स्‍थायी महत्‍व होगा?

दस साल की उम्र में देश-विभाजन का दृश्‍य देख चुके सौराष्‍ट्र के बुजुर्ग इतिहासकार ज्‍योतिकर कहते हैं, ''दो बातें ध्‍यान रखिए- गुजरात की प्रजा का मानस मुस्लिम विरोधी है और यहां का दलित अनिवार्यत: कांग्रेसी है. दलित-मुस्लिम एकता का नारा भाजपा को हराने के लिए है, दलितों के कल्‍याण के लिए नहीं. 1946, 1969, 1981, 1985, 1992 और 2002 तक के दंगों में एक ही स्थिति रही है कि मुसलमान दलितों को हिंदू समझ कर निशाना बनाता रहा है यही काम दलित मुस्लिमों के साथ करते रहे हैंं. दस लाख दलितों की आबादी में से दस-बीस हज़ार दलित अगर रैली में आ ही गए, तो वे अपने कारण से आए हैं. इन लोगों (आयोजकों) के पास न तो कार्यक्रम है न राजनीतिक दृष्टि. गुजरात के दलित रैली के आयोजकों से कहीं ज्‍यादा राजनीतिक चेतनासंपन्‍न हैं.''

मुख्यधारा के अकादमिक इतिहास ने गुजराती समाज के दलित आख्‍यान को जिस तरह दरकिनार किया है, वह एक बड़ी वजह है कि सोशल मीडिया के दौर में महज एक घटना अचानक इतिहास से भी अहम हो उठी है. गुजरात के दलितों की जागृत चेतना का प्रमाण उना रैली में खोजने वालों को उषा मकवाना की यह कविता पढ़नी चाहिए जो दिसंबर 1979 में गुजरात से नीरव पटेल, दलपत चौहान, प्रवीण गढ़वी और मधुकर चौधरी के संपादन में निकली दलित पत्रिका 'कालो सूरज' में (अंक 8, 16) छपी थी. ''हरिजन तो बनि जो'' (हरिजन बन कर दिखाओ) नामक इस कविता में कवयित्री ईश्‍वर को दलित बनने की चुनौती देती है:

कई बार तुमने जन्‍म लिया है

किसी महारानी की संतान के रूप में

कभी किसी आम औरत के गर्भ से जन्‍म लेकर दिखाओ

कई चक्र, धनुष और तीर चलाए हैं तुमने

कभी हाथ में झाड़ू लिए सड़क पर चलकर दिखाओ

हरि, खुद को आसान है हरि कहना

बस एक बार हरिजन बनकर दिखाओ!

गुजरात के दलितों की बाग़ी चेतना का क्‍या इससे बड़ा कोई प्रमाण संभव है?

First published: 20 August 2016, 7:41 IST
 
अभिषेक श्रीवास्तव @abhishekgroo

स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. लंबे समय से देशभर में चल रही ज़मीन की लड़ाइयों पर करीबी निगाह रखे हुए हैं. दस साल तक कई मीडिया प्रतिष्‍ठानों में नौकरी करने के बाद बीते चार साल से संकटग्रस्‍तइलाकों से स्‍वतंत्र फील्‍डरिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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