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ज़मीन की लड़ाई लड़ते और जीतते पंजाब के दलित

राजीव खन्ना | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST
QUICK PILL
  • पंजाब विलेज कॉमन लैंड एक्ट-1961 के अनुसार ग्राम पंचायत की 33 प्रतिशत \r\nजमीन दलितों को खेती के लिए दी जा सकती है लेकिन इस कानून पर बहुत कम अमल होता है.
  • पंजाब के मालवा इलाके के दलित अपने कानूनी अधिकार के लिए आंदोलन कर रहे हैं. करीब एक दर्जन गांवों में वो सफल भी रहे हैं. कई जगह सामुदायिक खेती भी कर रहे हैं.

विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही पंजाब के मालवा इलाके में दलितों का भूमि आंदोलन जोर पकड़ रहा है. दलित ग्राम पंचायत की साझा जमीन अनुसूचित जातियों (एससी) को दिए जाने की मांग कर रहे हैं. उनका दावा है कि कानूनन ग्राम पंचायत की एक-तिहाई जमीन अनुसूचित जातियों को खेती के लिए दे दिया जाना चाहिए.

पंजाब विलेज कॉमन लैंड एक्ट-1961 के अनुसार ग्राम पंचायत की 33 प्रतिशत जमीन दलितों को खेती के लिए दी जा सकती है. लेकिन इस कानून पर बहुत कम अमल होता है.

पिछले कुछेक सालों में मालवा के संगरूर-पटियाला-भटिंडा इलाके में दलितों को अपने हिस्से की जमीन मिलने लगी है. संगरूर के करीब एक दर्जन गांवों में दलित सामुदायिक खेती भी कर रहे हैं.

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राज्य के दोआबा और माझा इलाके में ज्यादा साझी जमीन नहीं है. इसलिए ये मांग फिलहाल मालवा इलाके में ज्यादा उठ रही है.

हाल ही में संगरूर के करकांव गांव में 102 गांवों के करीब चार हजार दलितों ने एक सम्मेलन किया. इस सम्मेलन का आयोजन जमीन प्राप्ति संघर्ष समिति (ज़ेडपीएसएस) ने किया था.

जेड़पीएसएस के मुकेश मलौध कहते हैं, "पंजाब के दलितों को खेती का साझा जमीन का एक तिहाई देना चाहिए. ये उनका कानूनी अधिकार है."

मलौध बताते हैं कि संगरूर के कुछ गांवों में दलितों को ये अधिकार मिला है लेकिन इसके लिए काफी लड़ाई लड़नी पड़ी. वो कहते हैं, "दलितों को इसके लिए सामाजिक बहिष्कार और हिंसा तक का सामना करना पड़ा."

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मलौध कहते हैं कि एक तरफ दलितों को साझी जमीन पर कानूनी अधिकार नहीं मिल रहा है, दूसरी तरफ चकबंदी से जुड़े कानून का खुला उल्लंघन हो रहा है.

पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में मलौध और उनके साथियों को यकीन है कि उनकी मांग को राजनीतिक तवज्जो मिलेगी.

कानूनन पंजाब में ग्राम पंचायत की साझा जमीन का एक तिहाई हिस्सा दलितों को खेती के लिए दिया जाना चाहिए

पंजाब विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर पीएस वर्मा ने पंजाब और हरियाणा की साझा जमीन का विस्तृत अध्ययन किया है.

वर्मा ने कैच को बताया, "अच्छी बात ये है कि अब इस दिशा में कुछ होने लगा है. ये कानून 1961 से लागू है लेकिन साझा जमीन के पट्टे की नीलामी में भूस्वामी वर्ग ही उसे पाता रहा है. कई बार इसके लिए दलितों को मुखौटे के तौर पर प्रयोग किया जाता था. खेती का अधिकार मिल जाने के बाद दलित मजदूर के रूप में काम करते थे और भूस्वामी उससे पैसा कमाते थे."

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राज्य के भूस्वामी वर्ग को हमेशा से लगता रहा है कि ग्राम पंचायत की जमीन उनकी जमीन है जो चकबंदी में सरकार ने ले ली थी.

वर्मा बताते हैं कि डेढ़ दशक पहले तक इलाके के दलित संसाधनों के अभाव में साझा जमीन पर खेती में ज्यादा रुचि नहीं लेते थे.

ग्राम पंचायतों के पास भी 73वें पंचायती राज अधिनियम संशोधन से पहले तक पर्याप्त आर्थिक साधन नहीं होते थे. वर्मा कहते हैं, "आरक्षण से दलितों की हालत बदली है. अब वो शिक्षित और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुए हैं. अब वो नौकरियों में आ रहे हैं और सरपंच भी बन रहे हैं."

वर्मा कहते हैं कि उदारवादी लोकतंत्र में जिसके पास संसाधन है वो लाभ की स्थिति में रहता है. हरित क्रांति से वो वर्ग अमीर हो गया जिसके पास जमीन थी. बाद में दलितों में धीरे-धीरे राजनीतिक चेतना का विकास हुआ और वो अपने अधिकार के प्रति सजग होने लगे.

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दलितों को साझा जमीनी पर खेती का अधिकार मिलने के बाद भी उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हो जातीं.

वर्मा कहते हैं, "दलितों को जमीन मिलने पर भी सिंचाई वगैरह के लिए उन्हें पड़ोस की खेत मालिक पर निर्भर होना पड़ता है. इसलिए वो अब सामुदायिक खेती कर रहा हैं. हालांकि ये नहीं पता कि वो उपज का बंटवारा कैसे करेंगे?"

दलितों की इस पहल का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव पड़ना तय है. पंजाब विश्वविद्यालय के स्कालर रोनकी राम दलितों विषयों को लंबे समय से अध्ययन करते रहे हैं.

वो कहते हैं कि पंजाब में 32 प्रतिशत दलित हैं लेकिन उनके पास राज्य  की पांच प्रतिशत से भी कम जमीन है. पंजाब के दलित पांच धर्मों और 39 उपजातियों में बंटे हैं.

वो कहते हैं, "पंजाब में सबसे ज्यादा दलित हैं लेकिन राज्य की राजनीति में वो कभी प्रभावी नहीं रहे. पंजाब में उनकी इतनी लंबी मौजूदगी भी हैरानी की बात है. ये चाहे इस्लाम का असर रहा हो या फिर समतावादी सिख धर्म का पंजाब मं छुआछूत का स्तर बाकी देश जैसा नहीं रहा है."

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मौजूदा आंदोलन के बारे में राम कहते हैं, "ये मुद्दा ऊंची जाति और अनुसूचित जाति के बीच का नहीं है. ये मुद्दा भूस्वामी और भूमिहीन दलित वर्ग के बीच का है."

राम कहते हैं कि पंजाब में जमीन का सामाजिक रसूख और पहचान से सीधा संबंध रहा है. ये आंदोलन भी इसीलिए जोर पकड़ रहा है. मालवा इलाके में दलित आंदोलन ज्यादा जोर पकड़ रहा है. इस इलाके में आंबेडकरवादी, सच्चा सौदा और रविदासियों इत्यादि की अच्छी पकड़ है.

सामुदायिक खेती पर राम कहते हैं, "नव-उपनिवेशिक भारत में ये अपने तरह का नया प्रयोग है लेकिन ये कितना टिकाऊ साबित होगा ये देखना अभी बाकी है."

पंजाब की हरित क्रांति का मुख्य लाभ भूस्वामी वर्ग को मिला क्योंकि उसके पास संसाधनों की कमी नहीं थी

मलौध बताते हैं कि ग्राम पंचायत की जमीन का पट्टा हासिल करने के साथ ही दलित इस बात पर भी जोर दे रहे हैं कि उन्हें ये जमीन नाममात्र के शुल्क पर दी जाए. दलित नहीं चाहते कि सरकार इसे कमायी का जरिया बना ले.

मलौध बताते हैं कि बौपर गांव के दलितों को पिछले साल 26 एकड़ जमीन कम दर पर मिली थी. मलौध कहते हैं कि वो भूमि से जुड़े दूसरे मुद्दे भी उठाएंगे. वो कहते हैं, "हम चाहते हैं कि राज्य में एक बार फिर चकबंदी हो और भूमि सीमा को घटाकर 10 एकड़ कर दिया जाए. इससे भूमिहीन मजदूरों को खेती के जमीन मिलेगी."

इसके अलावा दलित महिलाओं के यौन शोषण का भी मुद्दा भी प्रमुख है. मलौध कहते हैं, "दलित महिलाओं को ऊंची जातियों के पुरुषों के यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है. जिन गांवों के दलित अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं उन्हें पास के भूस्वामी पशुओं का चारा नहीं लेने देते. उन्हें इसके लिए कई किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है."

First published: 29 March 2016, 10:42 IST
 
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