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एनएसजी में भारत की दावेदारी के कुछ बड़े खतरे भी हैं

कुमार सुंदरम | Updated on: 22 June 2016, 7:19 IST
QUICK PILL
  • नरेंद्र मोदी सरकार परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश को लेकर आशावादी है. इस महीने के आखिर में सोल में एनएसजी की बैठक होने जा रही है.
  • 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के खिलाफ ही 1975 में एनएसजी का गठन हुआ था. भारत ने तब अंतरराष्ट्रीय कानूनी समझौते का उल्लंघन कर परमाणु परीक्षण किया था.
  • कोई भी देश अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम का इस्तेमाल परमाणु बम बनाने के लिए नहीं कर सकता. लेकिन अवैध रूप से भारत ने अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम का इस्तेमाल कर बम बनाया, लेकिन आज वह खुद को जिम्मेदार परमाणु राष्ट्र होने का दावा करता है.

नरेंद्र मोदी सरकार परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश को लेकर आशावादी हैं. इस महीने के आखिर में सोल में एनएसजी की बैठक होने जा रही है. लेकिन इस बैठक के नतीजे को लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता.

1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के खिलाफ ही 1975 में एनएसजी का गठन हुआ था. भारत नेे तब अंतरराष्ट्रीय कानूनी समझौते का उल्लंघन कर परमाणु परीक्षण किया था. 

कोई भी देश अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम का इस्तेमाल परमाणु बम बनाने के लिए नहीं कर सकता. लेकिन अवैध रूप से भारत ने अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम का इस्तेमाल कर बम बनाया लेकिन वह खुद को जिम्मेदार परमाणु राष्ट्र होने का दावा करता है.

एनएसजी के सभी सदस्य देश और साथ ही इससे बाहर के परमाणु शक्ति संपन्न देश परमाणु अप्रसार (एनपीटी) की जवाबदेही को पूरा करने और इसे आगे बढ़ाने में विफल रहे हैं. 

इसका सबसे अधिक लाभ अमेरिका को मिला. अमेरिका ने शीत युद्ध के दौरान हथियारों की दौड़ को बढ़ावा दिया और अब वह एक ट्रिलियन डॉलर के बजट के सााथ आधुनिकीकरण के नाम पर हथियारों की रेस को फिर से बढ़ावा दे रहा है. इस बार यह काम बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस और थिएटर मिसाइल डिफेंस सिस्टम्स के जरिये किया जा रहा है.

रूस और चीन को इसी वजह से आधुनिकीकरण के लिए मजबूर होना पड़ा जिसका असर भारत और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर पड़ा.

अमेेरिका परमणु हथियारों के मौजूदा और संभावित इस्तेमाल को लेकर हमेशा से ही दोहरा रवैया अपनाता रहा है. इस वजह से वैश्विक स्तर पर परमाणु निरस्त्रीकरण की कोशिशों को झटका लगा है.

'जवाबदेह' भारत जाहिर तौर पर वाशिंगटन के गैर जिम्मेदार परमाणु बरताव की आलोचना नहीं कर सकता क्योंकि यह एनएसजी में सदस्यता के लिए पूरी तरह सेे उस पर निर्भर है. इसके अलावा नई दिल्ली को अमेरिका की वजह से ही एनएसजी नियमों में छूट मिली.

5 जून 2016 को न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित संपादकीय में एनएसजी में भारत के प्रवेश का विरोध किया गया है. 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चीन ने पाकिस्तान की परमाणु महत्वाकांक्षा में हर संभव मदद की है. लेेकिन परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों के लिए यह सामान्य नियम है. रूस-चीन, अमेरिका-फ्रांस-इस्राइल, अमेरिका-ब्रिटेन, इस्राइल-दक्षिण अफ्रीका और फिर अमेरिका का पाकिस्तान की तरफ से आंख मूंद लेना. 

अगर हम डिलीवरी सिस्टम के विकास में सहयोग की बात करें तो यह कहानी सिर्फ पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और एक्यू खान के नेटवर्क का नहीं है बल्कि इसमें अन्य सदस्य देशों की भूमिका को भी शाामिल किए जाने की जरूरत है. मसलन अमेरिका और ब्रिटेन या फिर भारत और इस्राइल के बीच का नेटवर्क.

1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के खिलाफ ही 1975 में एनएसजी का गठन हुआ था

परमाणु अप्रसार को आगे बढ़ाने में भारत की भूमिका सही नहीं रही है. हालांकि इसने 1998 के परीक्षण के बाद बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम का विरोध किया. लेकिन अमेरिका के 2002 में एंटी बैलिस्टिम मिसाइल समझौते को खत्म करने के बाद भारत ने इस मामले में एक बार फिर से यू टर्न लिया. इसके अलावा भारत इस्राइल की मदद से अपना मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी बना रहा है. 

यह स्थिति तब और खतरनाक हो जाती है जब भारत के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस से पाकिस्तान भी अपने हथियारों को जखीरे को बढ़ाना शुरू कर देगा.

अब पाकिस्तान  निश्चित तौर पर बुरा बरताव करेगा. दक्षिण एशिया में भारत हमेशा से ही परमाणु हथियारों की होड़ को बढ़ावा देने वाला देश रहा है. मिनिमम क्रेडिबल डेटरेंस के बावजूद भारत अपना क्रूज मिसाइल बना रहा है. भारत अब पनडुब्बी आधारित बैलिस्टिक मिसाइल डिवेलपमेंट बना रहा है. जहां परमाणु हथियारों के जखीरे का इस्तेमाल किया जाएगा.

तो फिर पाकिस्तान के तेजी से बढ़ते परमाणु हथियारों का क्या होगा? हम भारत के बड़े परमाणु जखीरे को नजरअंदाज कर चल रहे हैं. अगर हम डेटरेंस के तर्क को मान भी लें तो भी भारत के पास पाकिस्तान के मुकाबले कम परमाणु हथियार होना चाहिए. पाकिस्तान के परमाणु बेड़े की तैनाती इस क्षेत्र में हथियार के दौड़ को बढ़ावा दे सकती है. निश्चित तौर पर दोनों देश इस स्थिति के पीड़ित हैं.

दक्षिण एशिया में भारत हमेशा से ही परमाणु हथियारों की होड़ को बढ़ावा देने वाला देश रहा है

प्रतिष्ठा के अलावा एनएसजी की सदस्यता भारत को परमाणु सामग्री और टेक्नोलॉजी तक पहुंच देगी. इसके बाद घरेलू यूरेनियम का इस्तेमाल सैन्य इस्तेमाल में काम आएगा. पाकिस्तान इस बात को बताने वाला एकमात्र देश नहीं है.

अपनी बात को रखने के लिए भारत के विचारक अक्सर पाकिस्तान की दोहरी नीतियों वाले फिसाइल मैटीरियल कट ऑफ ट्रीटी का हवाला देते हैं. एफएमसीटी पर पाकिस्तान की स्थिति को यूएन सम्मेलन में अन्य देश भी साझा कर चुके हैं. पी 5 देशों के पास पर्याप्त परमाणु जखीरा है. जब एफएमसीटी अस्तिव में आएगा तब भारत के पास भी पर्याप्त मात्रा में हथियार होंगे.

इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को 1999 में बताया था, 'हम कभी भी इस ट्रीटी पर दस्तखत नहीं करेंगे. कोई दबाव इसमें काम नहीं आएगा. हम इस समझौते पर दस्तखत नहीं करेंगे क्योंकि हम आत्महत्या करना नहीं चाहते.' 

इस्राइल सरकार की इस बात को न तो भारत सरकार और न ही किसी रणनीतिक मामलों के विशेेषज्ञ ने सामने रखा. बीच का रास्ता परमाणु हथियारों की अंतररारष्ट्र्रीय निगरानी के तौर पर निकाला गया. हालांकि यह परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों को कबूल नहीं होगा.

भारत का पहले उपयोग नहीं करने के सिद्धांत चीन के मुकाबले कमजोर है. चीन का सिद्धांत उन देशों के खिलाफ भी परमाणु हमले की आजादी नहीं देता है जिनके पास जैविक हथियार हैं. नई दिल्ली ने कभी भी इस बात का जिक्र नहीं किया.

आखिरकार भारत और अमेरिका के बीच हुआ परमाणु करार और एनएसजी में भारत का प्रवेश अमेरिका, फ्रांस और जापान समेेत अन्य देशों के लिए फायदे का सौदा है. परमाणु ऊर्जा का भविष्य उज्जवल नहीं है.

यहां यह जानना जरूरी है कि एनएसजी एक वैसा कार्टेल है जो फुकुशिमा और चेर्नोबिल जैसे हादसे के बाद भी परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करता है. परमाणु ऊर्जा के मामले में उत्पादन और वास्तविक डिलीवरी के बीच का अंतर बेहद ज्यादा है. यह अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक विफलता है. सुरक्षा को बाहर भी कर दें तो असैन्य परमाणु ऊर्जा की लागत बेहद अधिक है. भारत और बाकी के देशों को परमाणु ऊर्जा से दूर रहना चाहिए. वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए यह बेहद जरूरी है.

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी है. संस्थान का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं)

First published: 22 June 2016, 7:19 IST
 
कुमार सुंदरम @pksundaram

The author is a researcher with the Coalition for Nuclear Disarmament and Peace.

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