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बढ़ती जा रही है बेरोजगारी, आंकड़ों से गायब 4 करोड़ बेरोजगार

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 March 2018, 15:07 IST

मार्च 2016 में जारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 3 करोड़ 80 लाख लोग बेरोजगार थे जबकि 4 करोड़ लोग ऐसे थे जिनके पास नौकरी तो नहीं थी लेकिन वो किसी न किसी तरह का काम कर रहे थे. एक ओर बेरोजगारी का आलम इसी बात से साबित हो जाता है कि रेलवे की 90 हजार भर्तियों के लिए 2 करोड़ से ज्यादा आवेदन हुए है. पर आंकड़े कुछ और ही बता रहे हैं. साल के अंत पर जारी हुई दो रिपोर्ट्स में बेरोजगारी की हालत सुधरती हुई दिखती है.

2016 से 2017 के दौरान आई दो रिपोर्ट बताती हैं कि देश में बेरोज़गारी कम हो गई है. सेंटर फ़ॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी CMIE की रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2016 में देश में कुल 7 करोड़ 80 लाख बेरोजगार थे. इसी संस्था की अप्रैल 2017 में यह आंकड़ा घटकर 3 करोड़ 70 लाख हो गया. सवाल यह है कि बाकी 4 करोड़ 30 लाख लोग कहां गए?

नोटबंदी के बाद 4.3 करोड़ बेरोजगार हुए गायब
मार्च 2016 बताया गया था कि देश में 3 करोड़ 80 लाख लोग बेरोज़गार थे और 4 करोड़ वो थे, जिनके पास नौकरी तो नहीं थी पर वो कोई न कोई काम कर रहे थे.इसका मतलब ये हुआ की वो कोई न कोई काम करके अपनी आजीविका कमा रहे हैं.

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इसी बीच 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी हो गई. CMIE की एक और रिपोर्ट कहती है कि इसके बाद आंकड़ा तेजी से बदला. अप्रैल 2017 में पूरी तरह से बेरोजगार लोगों की संख्या अचानक 4.4 करोड़ से घटकर 1.6 करोड़ पर आ गई. रिपोर्ट्स के मुताबिक इसमें लेबर क्लास का वो बड़ा हिस्सा शामिल है जो नोटबंदी के दौरान बेरोजगार हो गया था. उनका यह भी मानना है कि इसे फिर से देश की लेबर फ़ोर्स में शामिल करना सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है. आंकड़ों की इस उलटफेर से बेरोजगारी का पूरा दृश्य ही बदला हुआ नजर आता है.

4 करोड़ बेरोजगारों के इस गायब होने के पीछे आंकड़ों के उलटफेर का ही सारा खेल है. साल 2017 के शुरुआती 4 महीनों को लेकर CMIE ने जो सर्वे किया था उसमें पता चला था कि जनवरी से अप्रैल के बीच में करीबन 15 लाख लोगों ने नौकरी गंवाई.

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क्या है कारण
दरअसल मामला ये है की देश में बेरोजगारी के सही आंकड़े मापने के लिए कोई भी विशेषीकृत सर्वे नहीं किया जाता है. अलग अलग सर्वे से जुटाए गए आंकडों को ही आधार बनाया जाता है. हैरानी यह है कि केंद्र सरकार को 2016 के बाद से पता ही नहीं कि बेरोजगारी की स्थिति क्या है क्योंकि श्रम मंत्रालय ने 2016 के बाद से ऐसा सर्वे ही नहीं कराया है. यह सर्वे लेबर ब्यूरो कराता था.

श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने इस बारे में एक जवाब में बताया कि इसे बेरोजगारी से जुड़े मुद्दे हल करने के लिए बनाई गई एक टास्क फ़ोर्स की सलाह के बाद बंद किया गया है. फिलहाल रोज़गार आंकड़ों के लिए सरकार EPFO से मिलने वाले डेटा पर निर्भर है.

NCS पोर्टल की रिपोर्ट
एनसीएस (नेशनल करियर सर्विस) पोर्टल नौकरी मांगने वालों और देने वालों को एक प्‍लेटफॉर्म देता है. रजिस्‍टर्ड इम्‍पलायर इस पोर्टल पर नौकरी मांगने वालों की प्रोफाइल छांटता है. अगर बेरोज़गार जरूरी शर्तें पूरा करता है तो उसे नौकरी मिल सकती है.
बता दें कि इस पोर्टल के जरिए अभी तक देश के 4 करोड़ युवाओं ने सीधे नौकरी मांगी है, पर मिली 8 लाख युवाओं को. ये कुल नौकरी मांगने वालों के दो फीसदी हैं. हालांकि एनसीएस पोर्टल पर 14.86 लाख एम्‍पलॉयर रजिस्‍टर्ड हैं. CMIE रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में बेरोज़गारों की संख्या में बीते एक साल में 7.1% का उछाल देखा गया है.

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इकॉनोमिक सर्वे के आंकड़े
साल 2016-17 के इकॉनोमिक सर्वे में भी इकॉनोमिक एडवाइजार अरविंद सुब्रमण्यन ने भी घटते रोज़गार के अवसरों को लेकर चिंता जाहिर की है. अरविंद के मुताबिक- 'रोज़गार पैदा करना फिलहाल भारत के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में एक है. इनफॉर्मल सेक्टर, अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर और सीजनल मजदूर भारतीय रोज़गार इंडस्ट्री में वर्क फ़ोर्स एक बड़ा हिस्सा है. फिलहाल इन तीनों को ही अंडर एम्पलॉयमेंट, स्किल शॉर्टेज, पुराने पड़ चुके मजदूर कानूनों और अमानवीय लेबर कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए काम करना पड़ता है.

First published: 27 March 2018, 15:07 IST
 
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