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उत्तर प्रदेश: दयाशंकर पर फिसली भाजपा को स्वाति का सहारा

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 25 July 2016, 8:37 IST

उत्तर  प्रदेश लगता है 'इलेक्शन मोड' में आ गया है. कम से कम वहां के तमाम राजनेता और राजनीतिक दल तो  पूरी तरह से. तभी तो हर छोटी से छोटी बात का बड़े से बड़ा बतंगड़ बनाया जा रहा है. हर बात को राजनीतिक लाभ-हानि की तराजू पर तौला जा रहा है. 

ताजा उदाहरण भाजपा के यूपी उपाध्यक्ष रहे दयाशंकर सिंह का है. उन्होंने बसपा प्रमुख मायावती को लेकर ऐसे कुछ कमेंट्स किए जो किसी भी सूरत में नहीं किए जाने योग्य थे. चूंकि अगले छह माह में ही यूपी में चुनाव का डंका बजने वाला है सो भारतीय जनता पार्टी को इससे भारी नुकसान नजर आया. 

उसे लगा कि, इससे तो दलितों के 20-21 प्रतिशत वोटों पर मायावती की पकड़ मजबूत हो जाएगी. बिना देर लगाए उसने उसी दिन न केवल दयाशंकर सिंह से उपाध्यक्षी छीन ली बल्कि उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया. 

मायावती ने कहा, अच्छा होता अगर दयाशंकर की पत्नी अपने पति पर भी केस करतीं

इसके बाद मायावती और उनके समर्थकों ने जो किया उसने भाजपा की आंखें खोल दी. बसपा नेताओं ने भी वही गलती दोहराई जो दयाशंकर सिंह ने की थी. उन्होंने अपनी 'फायरिंग रेंज' में सिंह के साथ उनकी बूढ़ी मां, पत्नी और बच्ची को भी शामिल कर लिया. और यहीं भाजपा के चाणक्यों को जगह मिल गई. 

दुर्भाग्य ही है कि, आजादी के 70 साल बाद भी ज्यादातर चुनाव धर्म और जाति की दीवारों में ही लड़े जा रहे हैं

उन्हें नुकसान में भी पार्टी के फायदे का रास्ता दिखाई देने लगा. इसी का परिणाम है कि, वह 23 जुलाई को पूरे उत्तर प्रदेश में 'बेटी के सम्मान में, भाजपा मैदान में' के नारे के साथ प्रदर्शन कर रही है. भाजपा और बसपा की इस लड़ाई में '27 साल यूपी बेहाल' के पोस्टर लगी बसपा के साथ कांग्रेस भी शामिल हो गई. 

यह देश का दुर्भाग्य ही है कि, आजादी के सत्तर साल बाद भी हमारे यहां ज्यादातर चुनाव धर्म और जाति की दीवारों में ही लड़े जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश को तो वैसे भी इस तरह की राजनीति का गढ़ माना जाता है. ऐसे में 'डेवलपमेंट और गुड गवर्नेंस' की बातें पीछे छूट जाती हैं. 

दयाशंकर सिंह ने कहा, क्या मायावती से कम है मेरी मां, पत्नी और बेटी की इज्जत?

बातें सारे दल और नेता उन्हीं की करते हैं लेकिन उनके दिमाग में गणित धर्म और जाति की ही रहती है. यही इस मामले में हुआ. दयाशंकर सिंह उत्तर प्रदेश की राजनीति में, हमेशा हावी रही 'ठाकुर-ब्राह्मण लॉबी' में से राजपूतों का प्रतिनिधित्व करते हैं. राजपूत भले ही यूपी में 8 प्रतिशत हों पर वे चुनावी राजनीति में मायने रखते हैं. 

उन्हें निकालते ही भाजपा को 'माया मिली ना राम' का अहसास हुआ. उसे लगा कि दयाशंकर सिंह के हमले से दलित तो मायावती के झंडे के नीचे इकट्ठा हो ही गए, नाराजगी में राजपूतों के भी भाजपा से छिटकने का खतरा खड़ा हो गया.

कहीं पर निगाहें-कहीं पर निशाना की तर्ज पर दयाशंकर सिंह के बजाय उसकी मां, बहन और बेटी को आगे कर दिया

ऐसे में उसके रणनीतिकारों ने तुरंत मामला संभाला. 'कहीं पर निगाहें-कहीं पर निशाना' की तर्ज पर दयाशंकर सिंह के बजाय उसकी मां, बहन और बेटी को आगे कर दिया. उनके मायावती पर जवाबी हमला करते ही वो बचाव में आ गईं. 

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एफआईआर के जवाब में 'जवाबी एफआईआर' हो गई. और ठाकुर वोटों के, भाजपा के साथ बने रहने के आसार भी बन गए. आज की राजनीति में किसी को 'पार्टी निकाले' का तो कोई अर्थ है नहीं. 'आज निकालो, कल वापस ले लो' की तर्ज पर देर-सबेर दयाशंकर सिंह वापस भाजपा में आ सकते हैं. और वे नहीं भी आएं या नहीं लिए जाएं तो उनकी पत्नी के रूप में पार्टी को एक नया नेता तो मिल ही गया.

First published: 25 July 2016, 8:37 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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