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संख्या बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है जजों का नजरिया बदलना

डॉ पी पुल्लाराव | Updated on: 25 April 2016, 22:07 IST

भारत के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने रोते हुए देखना सचमुच दुखदायी दृश्य था. इदी अमीन के युगांडा को छोड़ दिया जाए तो शायद ही दुनिया में ऐसा दृश्य पहले कभी देखा गया होगा. युगांडा में कई जजों को अदालत से खींच बाहर निकाला गया और उसके बाद वो कभी नहीं दिखे.

मुख्य न्यायाधीश इसलिए रो पड़े कि वो जजों की कमी पूरी नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि अगर उनके पास और जज होते तो वो लंबित पड़े तीन करोड़ मामलों का निपटारा कर चुके होते.

संभव है कि भारतीय अदालतों को ज्यादा जजों की जरूरत हो लेकिन उनकी संख्या बढ़ने से लंबित मामलों की संख्या कम होगी इसपर मुझे गहरा संदेह है.

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लंबित मामलों का बैकलॉग खत्म करने का एक ही तरीका है कि मुख्य न्यायाधीश ऐसे मामलों को रद्द कर दें जिनमें से एक की पैरवी मैं कर रहा हूं.

मैं अदालत में पांच लाख किसानों, आदिवासियों और दलितों का पैरोपार हूं जिन्हें विस्थापन, बेदखली समेत कई अन्य तरह की ज्यादतियों की सामना करना पड़ा है. इन सभी लोगों पोलावरम बांध परियोजना के कारण ये सब सहना पड़ा.

पोलावरम बांध भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा बांध होगा जिससे सबसे अधिक लोग विस्थापित होंगे

पोलावरम बांध भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा बांध होगा और इससे विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या भी सबसे ज्यादा होगी. फिर भी कानून के कान पर जूं नहीं रेंगती.

इस बांध का निर्माण पूर्वी गोदावरी और पश्चिम गोदावरी जिले के बीच गोदावरी नदी पर 2005 में शुरू हुआ था. बांध के लिए 85 हजार एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया. करीब 50 हजार लोगों को इसके कारण बेदखल किया गया है. इस बांध को बनने में अभी 15 साल लगेंगे.

फिर भी राज्य सरकार और ठेकेदारों ने एक संयुक्त परिवार बना लिया है. उन्होंने पहले 200 मील लंबी नहरों की खुदायी कि जिनमें 15 साल बाद पानी आएगा. फिर भी किसानों की जमीन ले ली गयी. जिस जमीन का संभावित उपयोग 20 साल बाद होगा.

पोलावरम और देवीपटनम मंडलो में किसानों से जमीन खाली करा ली गयी जबकि कम से कम अगले 10 सालों तक उस जमीन की कोई जरूरत नहीं है.

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आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद पोलावरम को केंद्रीय परियोजना घोषित किया गया. इसकी निगरानी का काम केंद्रीय जल मंत्रालय को सौंपा गया. हमने पाया कि इस मामले में संवैधानिक अधिकारों का गंभीर हनन हुआ है और हम इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट गए. ये मामला अदालत के अवकाशकालीन जज के सामने दायर किया गया.

जून, 2015 के बाद हमें एक सीनियर एडवोकेट मिले जो राज्य अदालत के मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे. जब हमारा मामला सुप्रीम कोर्ट के जज यूयू ललित के सामने पेश हुआ तो उन्होंने कहा, "मैं इस मामले की सुनवायी नहीं कर सकता क्योंकि बहुत साल पहले मैं सरकार की तरफ से पोलावरम मामले में वकालत कर चुका हूं."

हमारे लिए मामले में वकील की व्यवस्था करना बहुत भारी पड़ा था. ऐसे में अगर मामले के अदालत में आने से पहले ही इस मुश्किल को हल कर लिया जाता तो ये न्याय के हित में होता.

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15 दिन बाद हमारा मामला एक दूसरे बेंच के सामने पेश हुआ. इस बार हमने एक अन्य वकील को मामले में पेश होने के लिए तैयार किया. लेकिन मामले में राज्य और केंद्र सरकार को नोटिस देने के बजाय हमसे कहा, "आप हाई कोर्ट जाइए."

हमारे वकील ने कहा कि इस मामले में छह केंद्रीय मंत्रालयों को नोटिस देनी पड़ेगी. फिर भी सर्वोच्च अदालत ने कहा कि आप पहले आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट जाइए.

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जब आंध्र हाई कोर्ट गए तो वहां के तत्कालीन एक्टिंग चीफ जस्टिस बी भोसले ने हमारी याचिका पर सकारात्मक रुख दिखाया. उन्होंने हजारों किसानों और आदिसवासियों को होने वाले भारी नुकसान का नोटिस लिया और जल संसाधन मंत्रालय और ग्रामीण विकास और आदिवासी मंत्रालय, सामाजिक न्याय मंत्रालय, आंध्र प्रदेश सरकार और तेलंगाना सरकार को नोटिस भेजा. लेकिन तीन तारीखों के बाद हमने देखा कि माननीय जस्टिस की भाषा बदल गयी.

जब हमने मुद्दा उठाया कि कई मंत्रालयों ने अदालत की नोटिस का जवाब देना तक जरूरी नहीं समझा तो उन्होंने उसका उचित संज्ञान नहीं लिया. हमें लगा कि अदालत अब इस मामले में हिचक रही है. कुछ तारीखों के बाद हमें सुझाव दिया गया कि हम मामला वापस ले लें. हमने अपने वकील के माध्यम से जानना चाहा कि "यहां से मामला वापस लेकर हम कहां जाएंगे?"

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हमने कहा कि अगर हमारे मामले में कोई मेरिट नहीं तो इसे खारिज कर दिया जाए. काफी टालमटोल के बाद अदालत ने मामला खारिज कर दिया.

अब अगर हम कोई महंगा सीनियर एडवोकेट नहीं कर पाएंगे तो सुप्रीम कोर्ट में हमारा मामला शायद ही सुना जाए. इस मामले से पांच लाख लोगों की जिंदगी प्रभावित होनी है.

हमारा अनुभव है कि गरीब याचिकाकर्ताओं के लिए सुप्रीम कोर्ट में न्याय पाना बहुत ही मुश्किल है. हमारा ये भी अनुभव है कि हाई कोर्ट भी राज्य या केंद्र सरकार के खिलाफ लड़ने वाले गरीब वादियों की मदद नहीं करता.

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को चाहिए कि वो अदालत में ऐसे वादियों की तरफ से गैर-सीनियर एडवोकेट को भी हाजिर होने की इजाजत दें.

जब हम खुद एक साल बाद वापस सुप्रीम कोर्ट में जा रहे हैं तो हमारे सिर पर सबसे बड़ा सवाल है कि हमें एक उदार सीनियर वकील कहां से मिलेगा?

First published: 25 April 2016, 22:07 IST
 
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