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प्रधानमंत्रीजी! सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था जिसने आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया

चारू कार्तिकेय | Updated on: 17 August 2016, 8:32 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस उद्बोधन का एक छोटा सा अंश बमुश्किल हिन्दुस्तानियों को लुभा पाया. सारी सुर्खियां बलूचिस्तान के हिस्से आईं और स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में कही गई मोदी की बातें किसी के ध्यान में ही नहीं रहीं. शायद यह अच्छा ही रहा क्योंकि यह एक तरह से झूठा प्रचार था.

लेकिन यह जरूरी है कि देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा किए जा रहे इस झूठे प्रचार की कोशिश को जनता के सामने रखा जाए.

लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सिपाही था. हर कोई चाहता था देश को आजादी मिले. उन्होंने फिर कहा, 'हो सकता हैं, कुछ लोग जेल न जा सके हों, कुछ लोग बलिदान नहीं कर सके हों, इसके बावजूद हर भारतीय के मन में आजादी की अलख जगी थी.'

भाषण की इन पंक्तियों में प्रधानमंत्री का दर्द साफ झलकता है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यदि कोई जेल नहीं गया या बलिदान नहीं किया तो इसका मतलब यह तो नहीं है कि वह आजादी नहीं चाहता था.

प्रधानमंत्री किन भारतीयों की बात कर रहे थे?

वे किन भारतीयों की बात कर रहे थे? कई लोगों का मानना है कि मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रारम्भिक सदस्यों की बात कर रहे थे, यानी कि मोदी की भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक संस्थापक, जिनके बारे में तथ्यात्मक सबूत हैं कि वे आजादी के आंदोलन से दूर रहे.

इतिहास में कई जगह उल्लेख है कि संघ आजादी के आंदोलन से विमुख रहा था, उसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ किसी तरह की लड़ाई लड़ने से इनकार कर दिया था. संघ के संस्थापक केबी हेडगेवार ने बड़ी ही सावधानी से संघ को किसी भी ऐसी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होने दिया जो कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ लगे.

संघ ने आजादी के आंदोलन के सबसे बडे नेता मोहनदास करमचंद गांधी के खिलाफ नफरत फैलाने और दुष्प्रचार करने का काम जमकर किया, विशेषकर, उनके हिन्दू-मुस्लिम एकता के विचारों के कारण जो कि संघ को कतई रास नहीं आता था.

हेडगेवार के बाद उनके उत्तराधिकारी एमएस गोलवलकर (संघ के मौजूदा तमाम सिद्धान्तों के जनक) ने भी उन्हीं का अनुसरण किया. बल्कि ब्रिटिश शासन की खिलाफत करने पर अफसोस तक जताया.

संघ-भाजपा भारत में अपनी चुनावी स्थिति को मजबूत करने के लिए खुद को स्वाधीनता संग्राम से जोड़ने में लगे हैं

संघ ने तिरंगे को राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक नहीं माना और इसके भगवा रंग को अपनी निर्देशात्मक ताकत बनाया. यहां तक कि हाल के कुछ सालों तक भी संघ देश भर में अपने कार्यालयों में तिरंगा फहराने से इनकार करता रहा.

इसलिए और दूसरी अन्य वजहों से इतिहासकार यह मानते आए हैं कि संघ स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा नहीं था और अब जबर्दस्ती स्वयं को इससे जुड़ा हुआ बताने की कोशिश कर रहा है.

यह विश्लेषण इसलिए किया जा रहा है कि मोदी के भाषण में ये शब्द इसी संदर्भ में आए हैं. वह ‘कोई’ जो न तो जेल गया और न ही स्वतंत्रता संग्राम के दौरान किसी आंदोलन में शामिल हुआ, वह संघ का कार्यकर्ता या नेता है, जिसका स्वाधीनता संग्राम से कोई लेना-देना नहीं है.

राजनीतिक टिप्पणीकार जाॅन दयाल के शब्दों में, ‘मोदी के शब्दों ने इतिहास की सारी किताबों को झुठला दिया. पुलिस और अदालतों के रिकाॅर्ड को भी गलत साबित कर दिया, जिनमें उन दागियों के माफीनामें दर्ज हैं, जिन्होंने उस आदमी के नेतृत्व में दुनिया के सबसे बड़े जन आंदोलन में अपने लोगों को भाग लेने से मना कर दिया जिसे लोग महात्मा कहते हैं.’

जनता दल युनाइटेड के महासचिव केसी त्यागी ने भी कुछ ऐसा ही विचार व्यक्त किया. ‘प्रधानमंत्री का यह बयान अपने राजनीतिक पूर्वजों की ओर इंगित था. हिन्दू महासभा का स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान नहीं था और प्रधानमंत्री कहना चाह रहे हैं कि ये लोग बिना आजादी की लड़ाई का कष्ट उठाए, आजादी चाहते थे. इसी प्रकार, आपातकाल के दौरान न तो प्रधानमंत्री और न ही संघ-भाजपा का उनका कोई साथी जेल गया.

सीपीएम (एम) के मोहम्मद सलीम भी इस बात पर सहमति जताते हुए कहते हैं कि प्रधानमंत्री दरअसल स्वतंत्रता संग्राम में भाग न लेने के संघ के निर्णय पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहे थे.

संघ का मानना था कि अंग्रेजों ने भारत को मुगलों के मुस्लिम राज से आजाद करवाया था. यह एक तरह से ‘गलत को कम गलत कहने जैसा है.’

चूंकि संघ-भाजपा भारत में अपनी चुनावी स्थिति को मजबूत करने के लिए प्रयासरत है, इसलिए लगता है, इन्हें अब यह जरूरत महसूस हुई है कि खुद को स्वाधीनता संग्राम से जोड़ें. प्रधानमंत्री ने चतुराई दिखाते हुए एक झूठ को लाल किले की प्राचीर से सच बनाने की कोशिश की है, लेकिन यह कोशिश ईमानदार नहीं थी, इसलिए इसको सबके सामने लाना जरूरी था.

First published: 17 August 2016, 8:32 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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