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मोदी जी, नोटबंदी से हुए फायदों पर बजट में चुप्पी क्यों है

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 14 February 2017, 7:44 IST
(कैच न्यूज़)

वर्ष 2016-17 का आर्थिक सर्वे सिर्फ अपने साहित्यक संदर्भों के कारण ही ध्यान आकर्षित नहीं करता है, बल्कि अपने सतर्क रवैये के कारण भी यह चौंकाता है. इस सतर्क सुर (जो कि मोदी सरकार की विशेषता नहीं है) का सबसे बड़ा कारण अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी के कारण होने वाले असर को लेकर अनिश्चितता रही. 

आर्थिक सर्वे में साफ कहा गया है कि डिमोनेटाइजेशन के कारण होने वाले फायदों और नुकसान के आकलन में अभी लंबा समय लगेगा. लेकिन इसके बावजूद सर्वे यह कहने का जोखिम उठाता है कि इसके कारण जीडीपी ग्रोथ रेट में अधिकतम 0.5 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है.

भारी मेहनत के बाद सरकार ने अब तक नोटबंदी के जो फायदे गिनाए हैं उनमें सबसे आसान यही रहा है कि इससे प्रत्यक्ष कर संग्रह और संबंधित आर्थिक दंड (कालेधन की घोषणा पर) में भारी वृद्धि हुई है. दूसरा लाभ आश्वासन के रूप में यह बताया गया है कि बैंकों के पास जो भी भारी जमा राशि आई है उसके कारण अब वे ब्याज दरों में कमी करेंगे जिससे मांग को बढ़ावा मिलेगा. 

इन दोनों का ही उल्लेख वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट भाषण में किया गया. साथ ही इसके अन्य दूसरे कई फायदे भी गिनाए गए जैसे कि कालेधन, भ्रष्टाचार, जाली नोट और आतंकवाद की फंडिंग को रोकने के लिए लड़ाई. लेकिन सरकार इन वादों को अपने बजट में ही पूरा करने में असफल रही है और हमारे पास फिलहाल यह मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है कि डिमोनेटाइजेशन से जिस तरह के फायदों की बात की गई थी वे साकार नहीं हो सके हैं. 

क्यों बढ़ा 17 फ़ीसदी राजस्व

वर्ष 2016-17 के लिए सरकार का कुल कर राजस्व पिछले वर्ष की तुलना में 17 प्रतिशत बढा है. अगले साल सरकार इसमें 12 प्रतिशत बढ़ोतरी की उम्मीद कर रही है. इसी तरह से वर्ष 2016-17 के लिए आयकर प्राप्ति पिछले वर्ष की तुलना में 23 प्रतिशत बढ़ी है और अगले साल इसके 25 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है.

भारत के मुख्य आर्थिक सलाकरण अरविंद सुब्रमण्यन ने इसी सप्ताह के शुरू में एक साक्षात्कार में कहा था कि नोटबंदी के 4 असर में से एक है सर्विस टैक्स की प्राप्ति. इस साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि लंबित चल रहे जीएसटी के कारण नोटबंदी के असर को अलग से मापना एक मुश्किल काम होगा.

यहां भी वित्त मंत्रालय ने जो आंकड़े दिए हैं उनसे किसी तरह के बड़े परिवर्तन की झलक नहीं दिखती है. सर्विस टैक्स इस साल 17 प्रतिशत बढ़ा है और इसके अगले साल 11 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है. इस तरह से किसी भी कर राजस्व या अनुमान में कोई बहुत बड़े परिवर्तन की उम्मीद बजट में नहीं की गई है. 

चालू वित्त वर्ष के लिए इसमें जो महत्वपूर्ण सफाई दी जा सकती है वह यह कि फिलहाल ये सभी आंकड़े अभी सरकार के संशोधित अनुमानों पर आधारित हैं और इनमें परिवर्तन हो सकता है जबकि अंतिम दो माह के वास्तविक आंकड़े में प्राप्त हो जाते हैं. लेकिन डिमोनेटाइजेशन से जिस तरह के भारी उछाल की अपेक्षा की जा रही थी वह तो स्पष्ट रूप से नहीं दिख रहा है, विशेषकर जब हम यह देखें कि कुल कर राजस्व के बारे में संशोधित अनुमानों और बजट अनुमानों में अंतर मात्र 4 प्रतिशत ही है.

हां लेकिन राजस्व प्राप्ति के एक मामले में सरकार इस तरह से भाग्यशाली कही जा सकती है कि सरकार को पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज के डिविडेंड की मद में गैर कर राजस्व के अंतर्गत 23,167 करोड़ रुपये प्राप्त हुए. इसलिए कोई हैरानी की बात नहीं कि वित्त मंत्री के पास डिमोनेटाइजेशन के बाद आए इस बजट में किसी बोनांजा के लिए जगह नहीं बची थी.

बजट से बड़ी घोषणाएं नदारद

इसलिए बजट में न तो किसी वेल्फेयर स्कीम के लिए कोई बड़ी बढ़ोतरी की घोषणा की गई और न ही ऐसी कोई बड़ी घोषणा की गई जिससे कि सरकार के बिग बैंग दावों को अमली जामा पहनाया जा सके. उदाहरण के लिए स्मार्टसिटी के लिए 9000 करोड़ का बजट आवंटन इस बार के संशोधित बजट अनुमान 9559 करोड़ से कम रखा गया है.

मनरेगा के लिए दिया गया 48000 करोड़ रुपया आकर्षक लगता है लेकिन तभी तक जब तक कि हमें यह जानकारी न हो कि चालू वित्त वर्ष में मनरेगा बजट अनुमान 47499 करोड़ रहा है. एक और उदाहरण ले सकते हैं. स्टॉर्टअप इंडिया ऐस्पायरेशन फंड के लिए पिछले साल 600 करोड़ आवंटित किए गए थे, जिसमें से अब तक 100 करोड़ उपयोग हुए हैं. अब अगले साल के बजट में इस मद में कोई राशि नहीं दी गई है.

इस तरह कई मायनों में यूनियन बजट वित्त मंत्री अरुण जेटली का सच स्वीकार करने जैसा पल रहा. बड़े-बड़े वादों से परे इस बजट भाषण में जेटली यह मानने को मजबूर हुए कि सरकार ने जो अनेक शानदार स्कीमें अब तक शुरू की हैं उनमें से कई अपने वादों पर खरी नहीं उतरी हैं. इस तरह से तीसरे साल में पेश वित्त मंत्री अरुण जेटली के इस बजट को उनका सबसे ईमानदार बजट कहा जा सकता है. क्योंकि, जैसा कहावत है कि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते.

First published: 14 February 2017, 7:44 IST
 
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