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प्रिय मोदी जी, बाहर जितनी ही घर की भी फिक्र कर लीजिए

श्रिया मोहन | Updated on: 29 June 2016, 13:32 IST

अगर अर्णब गोस्वामी को दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार में सबसे अलग नजर आने वाली कोई बात थी तो वह थी परोपकार और उदारता. वह उदारता जिसके साथ उन्होंने अपनी सक्रिय विदेश नीति के लिए प्रेरित करने वाले इरादों के बारे में बात की. "सम्मान", "समझ", दूसरों को "सुरक्षित" महसूस कराना और "अलग दृष्टिकोण" रखने वाले देशों के साथ निरंतर "वार्ता" एवं "संवाद" की आवश्यकता जैसे शब्दों को ऐसे प्रदर्शित किया गया मानो यह उनकी सैद्धांतिक सोच की महान पहचान हो.

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अगर हम भारत के बजाय किसी प्रशांत द्वीप समूह के होते तो शायद हमारे प्रधानमंत्री ग्रामीण संकट, छात्र अशांति और अल्पसंख्यक चिंताओं के बारे में हमारी चिंता को बेहतर समझते और सहानुभूति दर्शाते.

घरेलू मोर्चे पर प्रधानमंत्री इन सिद्धांतों पर कितना अमल करते हैं इसे समझने के लिए हमने उनके साक्षात्कार के कुछ हिस्सों पर लोगों की राय जानने की कोशिश की-

दलितों की सुरक्षा

"आज हम दुनियाभर के देशों के साथ संबंधों का निर्माण कर रहे हैं. जितने सम्मान के साथ मैं सऊदी अरब के साथ संलग्न हूं, उतने ही सम्मान के साथ मैं ईरान से जुड़ा हूं. जितने सम्मान के साथ मैं अमेरिका से बात करता हूं, उतने ही सम्मान के साथ मैं रूस से बात करता हूं... हमें यह समझने की जरूरत है कि हमें छोटे देशों को तुच्छ नहीं मानना चाहिए. मैं इस सिद्धांत का पालन करता हूं. दुनिया के छोटे देश भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने कि बड़े राष्ट्र महत्वपूर्ण हैं.

आपने देखा होगा कि मैंने प्रशांत द्वीप राष्ट्रों के लिए एक मंच बनाया है... ये करीब 10 लाख या 20 लाख की आबादी वाले छोटे देश हैं. लेकिन ये छोटे से द्वीपों पर बसे राष्ट्र ग्लोबल वार्मिंग से सबसे अधिक प्रभावित हैं. जब भारत ने अंतरराष्ट्रीय सौर मिशन शुरू किया और 122 राष्ट्र इसमें शामिल हो गए, तो इससे सबसे अधिक लाभ तो द्वीप राष्ट्रों को ही हुआ है. अब उनकी संख्या 50 हो गई है. 50 देशों का एक समूह भारत के इस दृष्टिकोण के साथ सुरक्षित महसूस करता है."

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भारत के इस दृष्टिकोण से लोग सुरक्षित महसूस करें, यह सुनिश्चित करना तुलनात्मक रूप से परोपकारी लक्ष्य है. यह अपने घर (देश) पर कितना लागू होता है? उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री मोदी के भारत के दृष्टिकोण से दलितों की आबादी कितनी सुरक्षित महसूस करती है?

दलित पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला द्वारा कैम्पस प्रांगण में आत्महत्या कर लेने के छह माह गुजर जाने के बाद भी हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर छात्रों के विरोध प्रदर्शन का एक गढ़ बना हुआ है. दलित भेदभाव के खिलाफ न्याय की मांग पर विरोध प्रदर्शन पूरे भारत में एक चरम बिंदु तक जा पहुंचा था.

प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण पर कैच ने सुरक्षा के बारे में रोहित के भाई राजा वेमुला से बात की. राजा ने कहा, "मेरे भाई की मौत से पहले किसी ने हमारी पहचान पर सवाल नहीं उठाया. उसकी मौत के बाद यह सरकार वह सबकुछ कर रही है जो वह कर सकती है, यह साबित करने के लिए कि हम दलित नहीं हैं. मेरा भाई एक दलित की तरह जिया और उसे एक दलित की तरह निलंबित किया गया था. अब उसकी मौत के बाद भी वे साबित करने में लगे हैं कि हम दलित नहीं हैं." राजा ने दावा किया कि उन्हें आज तक कोई मुआवजा और न्याय नहीं मिल पाया है.

उनका परिवार और परिसर के भीतर बनी ज्वाइंट एक्शन कमेटी की मांग थी कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत कुलपति अप्पा राव की गिरफ्तारी की जाए. राजा कहते हैं, "यदि एक रोहित अधिनियम न सही, हमें कम से कम भेदभाव से छात्रों की रक्षा करने वाले एक अधिनियम की जरूरत है."

ब्राह्मण हिंदू का नियंत्रण

टाइम्स नाओ के अपने साक्षात्कार में प्रधानमंत्री ने कहा, "विदेश नीति में बातचीत के लिए विचारों में समानता होना आवश्यक नहीं है. यहां तक कि जब विचार विरोधाभासी हों, वार्ता ही आगे का रास्ता है और समस्याओं को बातचीत के जरिए हल किया जाना चाहिए ... देखिए, विदेश नीति मानसिकता बदलने के विषय में नहीं है. विदेश नीति समान बैठक बिन्दु तलाशने के बारे में है. हमारे हित कहां और कितने मिलते हैं? हमें बैठना होता है और वार्ता करनी होती है.. हम अब एक द्विध्रुवी दुनिया में रहते हैं. दुनिया परस्पर जुड़ी हुई और एक-दूसरे पर आश्रित है. आपको एक ही समय पर हर किसी के साथ जुड़ना होगा. यहां तक कि अगर दो देश आपस में विरोधी हैं, तब भी उन्हें दोस्त होना होगा. अब समय बदल गया है."

कैच ने ने प्रधानमंत्री की खुद की द्विध्रुवी दुनिया के बारे में प्रोफेसर कांचा इलैया शेफर्ड से बात की. इलैया ने इस विषय पर विचार किया है कि क्यों अपने देश के अल्पसंख्यों की मांग की अनदेखी करते हुए मोदी विशेष तौर पर सऊदी अरब ये लेकर अफगानिस्तान, ईरान, पाकिस्तान, इराक और कई अन्य इस्लामी राष्ट्रों की यात्रा करते हैं और वहां भाईचारे और समानता के महान भाषण देते हैं.

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इलैया का मानना है कि विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव या वाजपेयी से की तुलना में अलग सोच दिखाई है.

इलैया कहते हैं, "मोदी में अब कोई गहरा हिन्दू नहीं है. वे अब कोई पुजारी नहीं बन सकते. वे एक प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लेकिन वे तो अपने खुद के ही मालिक नहीं हैं. उन्हें तो वही करना पड़ता है जो मोहन भागवत कहते हैं. एक हिंदू ब्राह्मण होने के नाते मोहन भागवत में उन दूसरे धर्मों के प्रति एक ऐतिहासिक शत्रुता है जो अन्य धर्मों के लोगों को समानता देते हैं."

इलैया के अनुसार, एक हिंदू दक्षिणपंथी शासन के तहत काम कर रहे मोदी खुद अन्य पिछड़ा वर्ग से होने के नाते बाहर एक उत्कृष्ट "विदेश नीति राजदूत हैं और अंदर भीतर से ब्राह्मणवादी कौटिल्य जैसे प्रधानमंत्री हैं." इसी कारण वे यहां कम प्रभावी और बाहर अधिक प्रभावी हैं.

मोदी को इस बात के लिए जाना जाता है कि उन्होंने सऊदी अरब के किंग को 629 ईसा पूर्व में हुए एक अन्य पिछड़ा वर्ग के राजा चेरामल पेरूमल का मुखौटा भेंट किया, जिसने अपना राज्य छोड़ दिया और 622 ईसा पूर्व में इस्लाम ग्रहण कर लिया था. इलैया बताते हैं, 'मोदी ने उसकी सराहना की. उन्होंने किंग को वह मुखौटा दिया, क्योंकि यही हमारे संबंध हैं."

"आरएसएस के ब्राह्मण हिंदू धर्म पर नियंत्रण रखते हैं और अगर वे उनके माध्यम से अपनी शर्तों को थोपने में कामयाब नहीं हो पाते तो उनकी (मोदी की) टांग खींच लेंगे. नरेंद्र मोदी या तो अपनी कुर्सी खतरे में डालें या विदेश नीति के माध्यम से अभिनय करते हुए ऐसी ही पैंतरेबाजी करें."

असंतोष की जगह

मोदी ने कहा, "बड़ी बात है कि संसद चर्चा के लिए है. संसद असंतोष दिखाने के लिए है. संसद किसी के विरोध में तर्क पेश करने के लिए है, संसद किसी के समर्थन में तर्क देने के लिए है. संसद की इस मूल भावना को बनाए रखना हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जो लोकतंत्र के मूल्यों में विश्वास रखता है."

कैच ने यह समझने के लिए योगेंद्र यादव से बात की कि मोदी विदेश में किस तरह के सिद्धांत की बात करते हैं और जब खेत, जल और ग्रामीण संकट जैसी घरेलू चिंताओं की बात आती है तो वे इन सिद्धांतों को कितना अपनाते हैं?

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यादव कहते हैं, "प्रधानमंत्री का मानना है कि वैश्विक मंच पर भारत के एक आवाज के रूप में उभरने के लिए छोटे या बड़े, शक्तिशाली या शक्तिहीन, मुख्यधारा में शामिल या हाशिए पर अटके हर व्यक्ति को शामिल करना आवश्यक है. और यह सही भी है. वास्तव में मेरी इच्छा है कि वे घरेलू स्थितियों के लिए भी अपनी यह अंतर्दृष्टि लागू करते. जिस नेता के रूप में वे खुद को याद कराने के लिए बेताब हैं, उस तरह के नेता के रूप में उभरने के लिए जरूरी है कि सबकी बात सुनी जाए. दुर्भाग्य से, उन्होंने खुद के लिए एक ऐसी राजनीतिक रणनीति चुनी है जो ध्रुवीकरण की है. उनको पक्का भरोसा है कि अगले चुनावों तक बेरोजगारी या खेत संकट या ग्रामीण संकट के मुद्दों को गैर मुद्दों में तब्दील किया जा सकता है."

यादव कहते हैं, "बड़ा सवाल यह है कि क्यों प्रधानमंत्री को इन सवालों के जवाब देने की आवश्यकता महसूस हुई?"

उनका विश्लेषण कहता है कि इस सवाल के जवाब का सीधा लेना-देना बाजार के डर से है. यादव कहते हैं,"राजन चले गए, स्वामी एक अनियंत्रित तोप बन गए थे और हाल ही में एनएसजी वाली मुसीबत आ गई. गंभीर डर था कि बाजार डूब जाएगा. इसलिए लोगों में विश्वास बहाल करने की जरूरत थी."

बढ़ी टीआरपी और मोदी भक्तों की तालियों के बीच, एक बड़े पैमाने पर खामोश वह भारत जिसके पास कोई अधिकार नहीं है, इस बात के लिए इंतजार कर रहा है कि कोई उसकी भी सुन ले. मोदी में उसका भरोसा टूटता जा रहा है.

(यहां व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं. संस्थान का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं)

First published: 29 June 2016, 13:32 IST
 
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