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शहीद दिवस 2018: जब भगत सिंह की निशानियों के लिए निकालना पड़ा ड्रॉ

आकांक्षा अवस्थी | Updated on: 26 September 2018, 15:46 IST

"प्रेमी, पागल, और कवी एक ही चीज से बने होते हैं." भगत सिंह का ये नारा उनकी पूरी शख्सियत को पूरी तरह से बयान करता है. भगत सिंह का नाम उन क्रांतिकारियों में शामिल है, जिन्होंने 23 साल की छोटी सी उम्र में वतन के लिए जान दे दी.
भगत सिंह को लाहौर षड़यंत्र केस में जेल हुई थी, जब उनके साथियों ने उनसे पूछा की आपने खुद का और अपने साथियों का बचाव क्यों नहीं किया? तो उनका जवाब था की आज़ादी के लिए क़ुरबानी दी जाती है, सरकार के सामने याचिका नहीं.

फांसी के पहले के वो कुछ घंटे

लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत रोज की तरह ही हुई. सबको पता था की भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जानी है. लेकिन किसी को ये नहीं मालूम था की वक़्त के पहले ही तीनों को मौत की सजा दे दी जाएगी. जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब तब लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.

इधर भगत सिंह अपनी कोठरी में सुकून से बैठे किताबें पढ़ रहे थे. मानो मौत को गले लगाने के लिए बिल्कुल तैयार हों.
जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है. साथी कैदियों पर भगत सिंह का इतना असर था की वो इसी भी तरह उनके साथ को छोड़ना नहीं चाहते थे.

जब ये पता चला की वक़्त के पहले ही उन तीनों को फांसी दे दी जाएगी तो साथी क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.

बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया. भगत सिंह पर इस तरह से सब अपना हक़ जताना चाहते थे. भगत सिंह तब भी सबके दिलों में थे और भगत सिंह आज भी सबके दिलों में उतने ही जोश के साथ बसते हैं, जितना की 'इंकलाब जिंदाबाद'

इधर भगत सिंह अपनी कोठरी में सुकून से बैठे किताबें पढ़ रहे थे. मानो मौत को गले लगाने के लिए बिल्कुल तैयार हों.
जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है. साथी कैदियों पर भगत सिंह का इतना असर था की वो इसी भी तरह उनके साथ को छोड़ना नहीं चाहते थे.

जब ये पता चला की वक़्त के पहले ही उन तीनों को फांसी दे दी जाएगी तो साथी क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.

 

बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहाँ से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया. भगत सिंह पर इस तरह से सब अपना हक़ जताना चाहते थे. भगत सिंह तब भी सबके दिलों में थे और भगत सिंह आज भी सबके दिलों में उतने ही जोश के साथ बसते हैं, जितना की 'इंकलाब जिंदाबाद'

 

First published: 23 March 2018, 9:53 IST
 
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