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पुण्यतिथि विशेष: जब राजेंद्र प्रसाद ने हाथ जोड़ कर मांगी थी अपने नौकर से माफ़ी

आकांशा अवस्थी | Updated on: 28 February 2018, 10:56 IST

सादगी, सेवा, त्याग, देशभक्ति और स्वतंत्रता आंदोलन में खुद को झोंक देने वाले डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति बनें. महात्मा गाँधी ने उन्हें अपने सहयोगी के रूप में चुना था और साबरमती आश्रम की तर्ज पर सदाकत आश्रम की एक नई प्रयोगशाला का दायित्व भी सौंपा था.
बिहार प्रान्त के एक छोटे से गाँव जीरादेयू में 3 दिसम्बर, 1884 में राजेन्द्र प्रसाद का जन्म हुआ था. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समर्थक राजेंद्र प्रसाद को ब्रिटिश प्रशासन ने 1931 के 'नमक सत्याग्रह' और 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान जेल जाना पड़ा.

1950 में जब भारत गणतंत्र बना, तो प्रसाद को संविधान सभा द्वारा पहला राष्ट्रपति बनाया गया. बतौर 'महामहिम' प्रसाद ने गैर-पक्षपात और पदधारी से मुक्ति की परंपरा स्थापित की.

स्वदेशी आंदोलन
राजेन्द्र प्रसाद भी नये आंदोलन की ओर आकर्षित हुए. अब पहली बार राजेन्द्र प्रसाद ने पुस्तकों की तरफ़ कम ध्यान देना शुरू किया. स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन ने राजेन्द्र प्रसाद के छात्रालय के छात्रों को बहुत प्रभावित किया. उन्होंने सब विदेशी कपड़ों को जलाने की क़सम खाई.
गोपाल कृष्ण गोखले ने सन् 1905 में 'सर्वेन्ट्स ऑफ़ इंडिया सोसाइटी' आरम्भ की थी. उनका ध्येय था ऐसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक तैयार करना जो भारत में संवैधानिक सुधार करें. इस योग्य युवा छात्र से वह बहुत प्रभावित थे और उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद को इस सोसाइटी में शामिल होने के लिये प्रेरित किया.

 

स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भागीदारी
राजेन्द्र प्रसाद ने अन्य नेताओं के साथ राष्ट्र निर्माण का अति विशाल कार्य ले लिया. उस समय उनके भीतर जल रही राष्ट्रीयता की ज्वाला को कोई नहीं बुझा सकता था. राजेन्द्र प्रसाद गांधी जी के बहुत निष्ठावान अनुयायी थे. उन्होंने स्वयं को पूरी तरह स्वाधीनता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया. उन्हें और पूरे भारत को गांधी के रूप में आंदोलन के लिये नया नेता और सत्याग्रह व असहयोग के रूप में एक नया अस्त्र मिला.

 

राजेन्द्र प्रसाद और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
यह अनिवार्य था कि राजनीति का दृश्य बदले. राजेन्द्र प्रसाद ने जागरूकता का वर्णन इस प्रकार किया है, "अब राजनीति शिक्षितों और व्यवसायी लोगों के कमरों से निकलकर देहात की झोपड़ियों में प्रवेश कर गई थी और इसमें हिस्सा लेने वाले थे किसान."

कवि राजेन्द्र
सन 1934 में भूकम्प पीड़ितों के लिये राहत कार्य करने के दौरान राजेन्द्र प्रसाद के भाई महेन्द्र प्रसाद का निधन हो गया. राजेन्द्र बाबू ने लिखा है, "इस संकट काल में मेरे भाई के देहान्त से मुझे भारी धक्का लगा और अपने मन को सांत्वना देने के लिए मैंने गीतों का सहारा लिया."

राष्ट्रपति राजेन्द्र
वे भारत के एकमात्र राष्ट्रपति थे जिन्होंने दो कार्य-कालों तक राष्ट्रपति पद पर कार्य किया. राष्ट्रपति के पद पर राजेन्द्र प्रसाद ने सदभावना के लिए कई देशों की यात्रायें भी की. उन्होंने इस आण्विक युग में शान्ति की आवश्यकता पर ज़ोर दिया. राजेन्द्र बाबू का यह विश्वास था कि अतीत और वर्तमान में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है.
प्राचीन सभ्यता विरासत में मिलने के कारण वह अतीत को हमारी वर्तमान समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रेरणा का स्रोत समझते थे. हमारी विरासत नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से परिपूर्ण हैं और हमें भविष्य में आधुनिक समय की चुनौतियों का सामना करने में सहायता कर सकती हैं. प्राचीन और नैतिक मूल्यों में सामंजस्य तो करना ही होगा.

राष्ट्रपति राजेंद्र जब अपने नौकर के सामने हाथ जोड़े
बारह वर्षों के लिए राष्ट्रपति भवन उनका घर था. उसकी राजसी भव्यता और शान सुरुचिपूर्ण सादगी में बदल गई थी. राष्ट्रपति का एक पुराना नौकर था, तुलसी.
एक दिन सुबह कमरे की झाड़पोंछ करते हुए उससे राजेन्द्र प्रसाद जी के डेस्क से एक हाथी दांत का पेन नीचे ज़मीन पर गिर गया और पेन टूट गया, राजेन्द्र प्रसाद बहुत गुस्सा हुए. उन्होंने तुरन्त तुलसी को अपनी निजी सेवा से हटा दिया. पर उन्हें लगता रहा कि उन्होंने तुलसी के साथ अन्याय किया है. राजेन्द्र प्रसाद ने तुलसी को अपने कमरे में बुलाया. उसने देखा कि राष्ट्रपति सिर झुकाये और हाथ जोड़े उसके सामने खड़े हैं.
उन्होंने धीमे स्वर में कहा, "तुलसी मुझे माफ कर दो." तुलसी इतना चकित हुआ कि उससे कुछ बोला ही नहीं गया.
राष्ट्रपति ने फिर नम्र स्वर में दोहराया, "तुलसी, तुम क्षमा नहीं करोगे क्या?"
और इस तरह से देश के राष्ट्रपति की ये सादगी पर नम्रता देखने में आयी.

 

भारत रत्न
सन 1962 में अवकाश प्राप्त करने पर राष्ट्र ने उन्हें "भारत रत्‍न" की सर्वश्रेष्ठ उपाधि से सम्मानित किया. यह उस पुत्र के लिये कृतज्ञता का प्रतीक था जिसने अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर आधी शताब्दी तक अपनी मातृभूमि की सेवा की थी.

अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिये उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना. यहाँ पर 28 फ़रवरी 1963 में उनके जीवन की कहानी समाप्त हुई. यह कहानी थी श्रेष्ठ भारतीय मूल्यों और परम्परा की चट्टान सदृश्य आदर्शों की. हमको इन पर गर्व है और ये सदा राष्ट्र को प्रेरणा देते रहेंगे.

 

12 साल तक संभाला राष्ट्रपति का पद

आजादी से पहले 2 दिसंबर 1946 को वे अंतरिम सरकार में खाद्य और कृषि मंत्री बने. आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को भारत को गणतंत्र राष्ट्र का दर्जा मिलने के साथ राजेंद्र बाबू देश के प्रथम राष्ट्रपति बने. वर्ष 1957 में वह दोबारा राष्ट्रपति चुने गए. इस तरह प्रेसीडेंसी के लिए दो बार चुने जाने वाले वह एकमात्र शख्सियत बने. 12 साल तक पद पर बने रहने के बाद 1962 में राष्ट्रपति पद से हटे.

प्रसाद भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के महान नेता थे और भारतीय संविधान के शिल्पकार भी. राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने कई देशों की सद्भावना यात्रा की. उन्होंने एटमी युग में शांति बनाए रखने पर जोर दिया दिया था.

साल 1962 में राजेंद्र बाबू को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा गया. बाद में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया और पटना के सदाकत आश्रम में जीवन बिताने लगे. 28 फरवरी, 1963 को बीमारी के चलते उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.

First published: 28 February 2018, 10:54 IST
 
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