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चाय बागानों से आ रही है बर्बादी की सुगबुगाहट

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 11 February 2016, 23:05 IST
QUICK PILL
  • पश्चिम बंगाल के चार जिलों दार्जीलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और अलीपुर द्वार के चाय बागान में दुनिया की सबसे बेहतरीन चाय पैदा होती है. लेकिन वास्तविक तौर पर इन चाय बागानों की जमीनी स्थिति बड़ी ही खराब है. 
  • आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उत्तरी बंगाल के डुअर्स इलाके में स्थित \r\nबागानों में पिछले तीन महीनों में 78 लोगों की मौत हो चुकी है. मजदूर \r\nयूनियन और सामाजिक संस्थाओं का अनुमान है कि यह संख्या 175 तक पहुंच चुकी \r\nहै और मौतों का कारण भूखमरी है.

महाराष्ट्र, पंजाब या देश में कहीं और जब किसानों की आत्महत्या नेशनल मीडिया में सुर्खियां बन रही थीं, उसी समय अलीपुर में पार्वती बराइक और प्रभु सरदार की मौत वीराने में कहीं खो गई.

पार्वती पश्चिमी बंगाल के अलीपुर द्वार जिले में डंकन ग्रुप के बिर्पारा चाय बागान में काम करती थीं. प्रभु भी इसी बागान से रिटायर हुए थे, जो पिछले साल मई में बंद हो गया था. हैरानी की नहीं है कि पार्वती और प्रभु दोनों की मौत भूख के कारण हुई थी.

अलीपुर द्वार के डंकन ग्रुप के बिर्पारा चाय बागान में काम करने वाली पार्वती की भूखमरी से मौत हो गई

बिर्पारा ऐसा अकेला नहीं है. चार जिलों दार्जीलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और अलीपुर द्वार में फैले 276 चाय बागानों में से 31 या तो बंद हो चुके हैं या बीमारू हैं. जिन 4,80,000 परिवारों को इन बागानों ने रोजगार दिया था, आज उनकी जिंदगी अनिश्चय में फंसी है.

बताते चलें कि दुनिया की सबसे कीमती चाय इसी क्षेत्र में पैदा होती है. लेकिन चर्चित दार्जीलिंग चाय की जमीन अपने ही देश के और दुनियाभर के सस्ते विकल्पों के सामने तेजी से खिसकती जा रही है.

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उत्तरी बंगाल के डुअर्स इलाके में स्थित बागानों में पिछले तीन महीनों में 78 लोगों की मौत हो चुकी है. मजदूर यूनियन और सामाजिक संस्थाओं का अनुमान है कि यह संख्या 175 तक पहुंच चुकी है और मौतों का कारण भूखमरी है. बहुत-सी जिंदगी अभी खतरे में भी हैं.

राज्य और केंद्र की सरकारें इस बात से इनकार कर रही हैं कि मौतों के पीछे प्राथमिक कारण भुखमरी और दरिद्रता है. अलीपुर द्वार और जलपाईगुड़ी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुपोषण, दरिद्रता या खून की कमी से मौत का एक भी मामला नहीं मिला.

अलीपुर द्वार और जलपाईगुड़ी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी की रिपोर्टों में ज्यादातर मौत का कारण कुपोषण, दरिद्रता या खून की कमी को बताया गया है

रिपोर्ट में मौत के जो कारण गिनाए गए हैं उनमें हृदय रोग, तपेदिक (टीबी) और हिमोग्लोबिन की कमी शामिल हैं. स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय को दखल देना पड़ा. स्वयं चीफ जस्टिस मंजुला चेल्लूर ने बंद हो चुके चाय बागानों का दौरा किया और चाय मजदूरों की पीड़ा सुनने के लिए इलाके में साप्ताहिक अदालत लगाने का आश्वासन भी दिया.

निराश करने वाली स्थिति

लेकिन चीफ जस्टिस और यहां तक कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दौरा भी हालात को ठीक नहीं कर पाया है. पश्चिमी बंगाल और केंद्र दोनों सरकारों द्वारा सिर्फ तदर्थ राहत की कोशिश की गई.

राज्य सरकार ने ताे बंद हो चुके चाय बागानों के मजदूरों के लिए तुच्छ मात्रा में राशन उपलब्ध कराया, जो स्वाभाविक रूप से कम पड़ गया.

कलकत्ता हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हस्तक्षेप के बावजूद मामले में कोई सुधार नहीं हुआ

कुछ खबरों के अनुसार मुख्यमंत्री ने डंकन के चेयरमैन जीपी गोयनका को यह भी कह दिया कि यदि बंद हुए बागान तत्काल नहीं खोले गए तो सरकार उनको अपने कब्जे में ले लेगी.

केंद्र उससे भी एक कदम आगे चला गया. केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय चाय बोर्ड (The Tea Board of India) ने पहले ही डंकन के बंद हो चुके 17 चाय बागानों में से 6 को अधिग्रहित करने की बात कह दी थी.

इसके प्रतिक्रियास्वरूप डंकन ने अदालत का दरवाजा खटखटा दिया. इसके बाद चाय बोर्ड को अपने कदम वापस खींचने पड़े. कारण यह था कि इस तरह के अधिग्रहण के लिए जिस औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) की अनुमति जरूरी होती है, उसकी उपस्थिति तो सिर्फ कागजों पर है और वह खुद ही कब्र के मुहाने पर है.

केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले भारतीय चाय बोर्ड ने डंकन के बंद हो चुके 17 चाय बागानों में से 6 को अधिग्रहित करने की बात कही थी

चाय बोर्ड के चेयरमैन संतोष सारंगी ने हाल ही में 31 चाय बागानों के निदेशकों और प्रबंधकों के साथ बैठक की थी. बैठक का मकसद विचार-विमर्श करना था कि कैसे उनको दोबारा अपने पांवों पर खड़ा किया जाए. लेकिन उसका भी कोई सकारात्मक प्रभाव नजर नहीं आया.

सारंगी ने संकेत दिया कि सरकार उन चाय बागानों को नीलाम करना चाहती है जिनकी लीज या तो खत्म हो चुकी है या रद्द. लेकिन इस कदम में बैंकों से लिए गए कर्ज और उनका नवीनीकरण सबसे बड़ी बाधा बन गए.

बागानों के प्रतिनिधियों ने अपनी ओर से कई अल्पकालीन और दीर्घकालीन उपाय सुझाए, जिनको मोटे तौर पर दो श्रेणियों में रखा जा सकता है -

1- वित्तीय नवीनीकरण

2- तत्काल सामाजिक हस्तक्षेप

बंगाल चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री से संबद्ध इंडियन टी एसोसिएशन का कहना है कि राज्य सरकार और चाय उद्योग दोनों काे ही इस बारहमासी बीमारी (बागानों के बुरे हालात) से छुटकारा पाने के लिए कुछ साहसी, कुछ तात्कालिक और कुछ दीर्घकालिक कदम उठाने होंगे.

ये कुछ अल्पकालिक कदम हैं जिन्हें तत्काल उठाने की जरूरत है:

* चाय उत्पादक इलाके से जुड़ी पूरी आबादी को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत लाना

* उन्हें अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाए*

सभी चाय मजदूरों को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून यानी मनरेगा के तहत लाया जाए

* राष्ट्रीय बीमा योजना 15 लाख चाय मजदूरों में से सिर्फ एक तिहाई को ही कवर करती है, इस योजना का लाभ सब तक पहुंचाना सुनिश्चित किया जाए

* चाय मजदूरों के आश्रितों को भी गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) की श्रेणी में शामिल किया जाए ताकि उन्हें भी स्वास्थ्य बीमा योजना का लाभ मिल पाए

चाय लॉबी का मानना है कि दोनों सरकारों को साथ मिलकर कदम उठाने होंगे. पुनरुद्धार के लिए उसके प्रस्तावों में शामिल हैं -

* बैंकों से लिए गए कर्ज का वित्तीय नवीनीकरण

* हरे पत्तों से संबंधित उपकर (Green Leaf Cess) में लगातार छूट

* बिजली की दरों में छूट

* सिंचाई के लिए अलग से बिजली कनेक्शन का प्रावधान

* चाय मजदूरों के घरों के लिए भी उचित बिजली दर

First published: 11 February 2016, 23:05 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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