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जब कुरान लिखी गई थी उस समय रमजान का उच्चारण क्या था?

पेगी मोहन | Updated on: 20 June 2016, 22:43 IST
(गेट्टी)

हर साल ईद-उल-फितर त्यौहार के पहले यह बहस छिड़ जाती है कि इस पवित्र माह को हम रमजान कहें या रमदान.  इसके साथ ही यह सवाल तुरन्त ही कौंध उठता है कि जब कुरान लिखी गई थी तब उस समय सही उच्चारण क्या था? 

इसका जवाब यह मिलता है कि दोनों में कुछ भी नहीं. हम सौभाग्यशाली हैं कि हमें पता है कि आधुनिक अरबी भाषा में इसका उच्चारण क्या होता है.

आठवीं सदी के अरबी भाषाविद् और व्याकरणाचार्य शिबवाह के अनुसार सैकड़ों साल पहले अरब में -द- का उच्चारण जिस तरह से किया जाता था वैसा उच्चारण न तो हिंदी में होता है और न ही अंग्रेज़ी में. भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान इसे -द- कहते हैं तो पश्चिमी देशों के मुसलमान -द- को -ड- कहते हैं. 

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अरबी भाषा में 'ज़्वाद' अक्षर का स्वर अंग्रेज़ी के 'ज़ेड' के बजाए 'जेडएच' की संयुक्त ध्वनित होता है इसीलिए अरबी में इसे रमदान कहते हैं जबकि उर्दू में आमतौर पर इसे रमज़ान कहते हैं.

यह देखना आसान होगा कि शुरुआत में फारसी लोगों ने जब 'जेडएच' ध्वनि का उच्चारण किया होगा तो उन्हें 'ज़ेड' ज्यादा आसान लगा होगा. फारसी भाषा न केवल ईरान की बल्कि पूरे मध्य एशिया की सांस्कृतिक और बोलचाल की भाषा रही है. 

क्रमिक विकास

भारतीय उपमहाद्वीप में जहां फारसी भाषा स्थानीय बोलियों में घुल-मिलकर उर्दू हो गई वहां अंग्रेजी के रमदान की बजाय स्थानीय शब्द रमजान इस्तेमाल होता है.

रमदान अरबी का शब्द है लेकिन आज की अरबी 8वीं शताब्दी की अरबी नहीं है. इसलिए यह दावा नहीं किया जा सकता कि जैसा उच्चारण आज किया जाता है वैसा ही पहले भी किया जाता था.

कुछ शोधों से जानकारी मिलती है कि जब कुरान लिखी गई थी उस समय कई शब्दों का उच्चारण आज से एकदम अलग था. इस बात के भी कई उदाहरण मिल जाएंगे कि समय के साथ शब्दों, अक्षरों और उच्चारण में बदलाव आते रहते हैं. 

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क़ुरान जिस उच्चारण के साथ उस समय पढ़ी जाती रही होगी वैसी अब नहीं पढ़ी जाती. ऐसे में यह विशुद्ध रूप से भाषायी शब्दावली है. ऐसे में रमजान के स्थान पर रमदान का पक्ष लेने की कोई वजह नहीं है.

आधुनिक काल के भाषाविद् भी उच्चारण या व्याकरण के नियमों से ज्यादा ताल्लुक नहीं रखते. बल्कि इसकी जगह वे उन शब्दों और देशज भाषाओं को पसन्द करते हैं जो पारिस्थितिक तंत्र से नई विकसित हुई हो. 

समुदायों का उच्चारण भी उनकी बोलचाल मेें दिखाई पड़ जाता है. ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि जेडएच की जगह जेड हो गया हो. बिहार के गांवों में रमजान कहा जाता है तो कैरेबियाई देशों में रमजॉन. 

इससे यही पता चलता है कि दो पैतृक प्रवाह के मिश्रित होने से, पुराने समुदायों के जीवन में नई धारणा या प्रभाव के रूप में इसका समावेश हो गया होगा.

ताकत का असर

रमदान शब्द ऐसे समय प्रतिस्पर्धा में है जह हम अपनी आंखों के सामने इतिहास को घटित होता देख रहे हैं. एक बात और सऊदी अरब सबसे संपन्न, प्रभावशाली और धर्म के लिहाज़ से भी सबसे कट्टर देश माना जाता है. 

कहना न होगा कि तेल के अकूत भंडार की वजह से सऊद अरब बेहद समृद्ध और मजबूत हैं. वह दूसरे देशों के लिए चुनौती उत्पन्न कर रहा है. दूसरी ओर ईरान अब धीरे-धीरे आर्थिक दिशा में तरक्की कर रहा है.

शायद यह वजह हो सकती है कि यहां के मुसलमानों का एक तबका अरबी शब्दों को अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाने में लगा हुआ हो जैसी आठवीं सदी में बोली जाती हो. क्योंकि दोनों का रहन-सहन एक है. उनमें से कुछ लोगों का मानना हो सकता है कि वे अपना मूल शब्द हमें दे रहे हों. इसीलिए 'रमज़ान' तेजी से 'रमदान' हो रहा है.

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ख़ुदा जैसे बेहद प्रचलित शब्द पर भी अरबी का मुलम्मा चढ़ रहा है और इसीलिए 'ख़ुदा हाफिज़' भी 'अल्लाह हाफिज़' हुआ जा रहा है. आखिर में निर्णय यह निकला कि रमजान या रमदान अथवा रमजॉन हमारी राजनीतिक इच्छा दर्शाती है. 

संस्कृति को पत्थर पर नक्काशी की तरह नहीं उकेरा जा सकता और निष्ठाएं बदलती रहती हैं. लोग उसी तरफ जाएंगे जहां वे खुद को ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा शक्तिशाली महसूस करेंगे. एक भाषाविद् होने के नाते मैं ज्यादा परवाह नहीं करती. मैं सिर्फ बैठकर देखती हूं और यह जानती हूं कि यह सब पहले भी घटित हो चुका है और आगे भी होगा. बदलाव, संघर्ष, खींचातानी जीवन के तत्व हैं ही.

First published: 20 June 2016, 22:43 IST
 
पेगी मोहन @catchhindi

लेखिका भाषाविद् हैं.

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