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माओवाद कम हो रहा है लेकिन माओवाद प्रभावित इलाके कम नहीं हुए

सुहास मुंशी | Updated on: 28 July 2016, 7:48 IST

पिछले कई सालों से केन्द्र और राज्य सरकारें भारत में नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव की बात कहती आ रही हैं. पिछले कुछ वर्षों से समय-समय पर यह भी खबर आती रही है कि केन्द्र नक्सल प्रभावित घोषित किए गए जिलों की संख्या घटाने जा रहा है. इस विचार के पीछे उद्देश्य इन क्षेत्रों में आवंटित की जाने वाले भारी-भरकम केंद्रीय बजट की राशि को बचाना है.

इन क्षेत्रों में लाखों की संख्या में सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं. अब केन्द्र सरकार का ध्यान एक बार फिर से माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या को कम करने पर है. लेकिन कहा जा रहा है कि ये जिले अभी भी माओवादियों के नियंत्रण में हैं. 

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हर बार केन्द्र यह प्रस्ताव रखता है और राज्य (मुख्यत: पांच राज्य-छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिसा और झारखंड) जो नक्सली हिंसा से प्रभावित हैं, इस कदम पर हाय-तौबा मचाने लगते हैं. वे नक्सली गतिविधियां बढ़ने का हवाला देते हुए और ज्यादा संसाधनों की मांग करते हैं.

इसकी वजह सीधी सी है. राज्य नहीं चाहते कि उन्हें केन्द्र से जो अलग से धन मिल रहा है, वह मिलना बंद हो जाए. उन्हें मालुम है कि इन जिलों को इस सूची से हटाने से उन्हें दी जाने वाली वित्तीय सहायता भी समाप्त कर दी जाएगी.

खबरें हैं कि केन्द्र एक बार फिर नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या कम करने पर विचार कर रहा है

कभी-कभी तो नक्सली हिंसा में कमी आने के पर्याप्त साक्ष्य होने और कभी-कभी केन्द्र से मिलने वाले धन को न्यायोचित न ठहरा पाने के बावजूद राज्य केंद्र सरकार की बात को स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं कि क्षेत्र के एक चौथाई हिस्से से नक्सली गतिविधियां समाप्त की जा चुकीं हैं. इस समय भी केन्द्र सरकार एक नई योजना के साथ आगे आई है.

खबरें हैं कि केन्द्र एक बार फिर नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या कम करने पर विचार कर रहा है. केंद्र सरकार की योजना माओवाद प्रभावित क्षेत्रों को 1/5 (20%) तक कम करने की है. रिपोर्ट के अनुसार 106 जिले, जिन्हें पहले माओवाद प्रभावित माना गया था, अब उनमें से 20 जिले इस सूची का हिस्सा नहीं होंगे. रेड कॉरिडोर से एक बार हट जाने के बाद ये जिले ज्यादा समय तक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों की सूची में नहीं रह पाएंगे.

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वर्ष 2006 में जब पहली बार नक्सली हिंसा से प्रभावित राज्यों का जियोग्राफिकल खाका खींचा गया था, देश के कुल 683 जिलों में से 105 जिले नक्सल प्रभावित घोषित किए गए थे. ये जिले बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिसा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के थे. इनमें से 44 जिले नक्सली हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित जिलों के रूप में चिन्हित किए गए थे.

रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र की योजना इस समय रेड कॉरिडोर की सूची से 20 जिलों को बाहर करने की है. माओवादी हिंसा से प्रभावित राज्यों के एक बार फिर केन्द्र के सामने तनकर खड़े होने की सम्भावना है. बावजूद इसके कि सभी तरह के साक्ष्य केन्द्र के विचारों के समर्थन में उपलब्ध हैं.

नक्सल कॉरिडोर की मौजूदा हालात

वर्ष 2010 के दौरान जब ग्रीनहंट आपरेशन चरम पर था, उसी समय नक्सली हिंसा भी चरम पर थी. उस साल नक्सलियों द्वारा पैरा-मिलिट्री फोर्स के 76 जवानों की निर्ममता के साथ हत्या कर दी गई थी. उस साल नक्सल प्रभावित जिलों में काफी संख्या में लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. इनकी संख्या लगभग 1,180 तक बताई गई थी. तब से लेकर आज तक वर्ष 2013 को छोड़ दिया जाय तो जान गंवाने वालों की संख्या में लगातार कमी आई है.

इस साल अभी तक यह संख्या 161 है. 2013 एक ऐसा साल था जब छतीसगढ़ के सुकमा जिले की दर्भा घाटी में हमला हुआ था. उसमें सलवा जुडूम अभियान के नेता और पूर्व मंत्री महेन्द्र कर्मा, छत्तीसगढ़ कांग्रेस प्रमुख नंद कुमार पटेल समेत 27 लोग मारे गए थे. यह हमला कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हुआ था.

इसके बाद माओवादी हिंसा की घटनाओं में कमी देखी गई है. साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल (एसएटीपी) के अनुसार 2013 में सबसे ज्यादा 228 घटनाएं हुईं. इसके बाद 2014 में 138 और 2015 में 63 घटनाएं ही हुईं. इस साल नक्सली हिंसा की घटना बढ़ी है. अब तक 82 घटनाएं दर्ज की गईं हैं. नक्सलियों से निपटने में राज्य के आक्रामक रुख के चलते अब तक 58 नक्सलियों के मारे जाने की खबर है.

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वास्तव में, गृह मंत्रालय के खुद के आंकड़ों के अनुसार नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या धीरे-धीरे कम की गई है. वर्ष 2008 में गृह मंत्रालय ने देश के 683 जिलों में से 223 जिलों को नक्सल प्रभावित माना था. 2009 में यह संख्या घटाकर 209 की गई. 2010 में इसे 200 के नीचे लाया गया. 2011 में गृह मंत्रालय ने नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 180 तय की.

पिछले तीन-चार साल से ज्यादा समय से झारखंड, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंसा की धटनाओं में 50 फीसदी तक की कमी देखी गई है. वहीं कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य जहां से नक्सलबाड़ी आन्दोलन की शुरुआत हुई, वहं भी हिंसक घटनाओं में कमी दर्ज की गई है.

वित्तीय हालत

केन्द्र सरकार ने राज्यों को फंडिंग करने के लिए कई साधन बनाए हैं. इसका उद्देश्य विकास को बढ़ावा देना, ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध कराना, सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण और ऐसे अभियान चलाना है जहां अत्यधिक हिंसा होती है और जिसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है.

इसके अलावा सुरक्षा संबंधी खर्च योजना, स्पेशल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्कीम, इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान राज्यों के धन के सबसे बड़े स्रोत हैं. एसआईएस के तहत केन्द्र सरकार ने पांच राज्यों को 1,943 करोड़ रुपए का आवंटन किया है ताकि वे ग्राउण्ड फोर्सेस के लिए ढांचागत विकास कर सकें. यह संशय जोर पकड़ता जा रहा है कि इसमें से 243 करोड़ रुपए का ही उपयोग हुआ है.

महाराष्ट्र जैसे राज्यों के पास तो, नक्सलियों से लड़ने के लिए जो धन उन्हें मिला है, उसका कोई लेखा-जोखा ही नहीं है. इसी तरह से आईएपी के तहत इस साल जनवरी तक आदिवासी क्षेत्रों को विकसित करने के लिए राज्यों को 9,059 करोड़ रुपए दिए गए हैं. इसी तरह का मामला एसआईएस का भी है.

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केन्द्र ने नक्सली हिंसा की सर्वाधिक चपेट में आए 44 जिलों में सड़क परियोजना के लिए अपनी मंजूरी दी है

हाल ही में केंद्र सरकार ने नक्सलवाद से प्रभावित राज्यों की मदद के लिए विशेष परियोजना शुरू की है ताकि वामपंथी उग्रवाद और रेड कॉरिडोर का समापन किया जा सके. जिलों को उनमें होने वाली हिंसा के आधार पर बांटा गया है.

केन्द्र ने नक्सली हिंसा की सर्वाधिक चपेट में आए 44 जिलों में सड़क परियोजना के लिए अपनी मंजूरी दी है. इस परियोजना के तहत 5412 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया जाएगा जिसमें 126 पुलों का निर्माण होगा. इस परियोजना का कुल खर्च 11,725 करोड़ रुपए होगा.

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इसके पहले राज्य केन्द्र को पत्र लिखते रहे हैं कि उनके जिलों में माओवाद बढ़ रहा है. कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल सरकार ने गृह मंत्रालय को लिखा था कि उसके राज्य में माओवाद से सर्वाधिक प्रभावित जिलों की संख्या बढ़ रही है.

इसी तरह से केन्द्र ने बड़ी लागत वाली कई परियोजनाएं लांच की हैं. यह अविश्वसनीय ही लगता है कि राज्य अपने रुख में बदलाव लाएंगे और केन्द्र को रेड कॉरिडोर का नक्शा फिर से खींचने की अनुमति देंगे और अपने मौजूदा आकार को कम करने देंगे.

First published: 28 July 2016, 7:48 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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