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डिफेंस एक्सपोः गोवा में आयोजन को लेकर रक्षा मंत्रालय और ग्रामीणों में जंग

निहार गोखले | Updated on: 25 February 2016, 23:01 IST
QUICK PILL
  • अब तक इसका आयोजन अक्सर दिल्ली के प्रगति मैदान में किया जाता रहा है. बीते वर्ष रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने 28 से 31 मार्च 2016 तक इसका आयोजन गोवा में करने का फैसला किया.
  • जब आयोजन में करीब एक माह का वक्त बचा है तब कांग्रेस और अन्य दलों ने इस आयोजन की राह में रोड़े अटका रहे प्रदर्शनकारियों का साथ देना शुरू कर दिया है. पर्यावरणीय संगठनों द्वारा इस संबंध में गंभीर पारिस्थिकी चिंताएं भी जताई गईं.

दक्षिणी गोवा का एक 150 एकड़ का जमीन का टुकड़ा सैकड़ों ग्रामीणों और रक्षा मंत्रालय के बीच जंग का मैदान बन गया हैै. देश में सबसे बड़ी हथियार प्रदर्शनी के रक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजन के नाम पर जारी इस जंग में अगर विपक्ष की जीत होती है तो यह मोदी सरकार के लिए शर्मिंदगी का एक बड़ा कारण बन सकता है.

हर दूसरे साल रक्षा मंत्रालय द्वारा अंतरराष्ट्रीय हथियार एवं रक्षा उपकरण प्रदर्शनी (डिफएक्सपो) का आयोजन किया जाता है. इसमें हिस्सा लेने वालों में दुनिया के सर्वोच्च रक्षा उपकरण निर्माता भी शामिल होते हैं.

अब तक इसका आयोजन अक्सर दिल्ली के प्रगति मैदान में किया जाता रहा है. बीते वर्ष रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने 28 से 31 मार्च 2016 तक इसका आयोजन गोवा में करने का फैसला किया.

पर्रिकर अपने गृह राज्य गोवा में 2014 तक मुख्यमंत्री थे, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें लाकर रक्षा मंत्री बना दिया. इसके बाद गोवा में पर्रिकर के विश्वासपात्र लक्ष्मीकांत पारसेकर ने उनकी जगह ली.

पर्रिकर ने संभवत: सोचा होगा कि डिफएक्सपो के लिए जमीन पाना बेहद आसान होगा. रक्षा मंत्रालय ने जून 2015 में गोवा सरकार के पास इसके लिए औपचारिक आवेदन भेजा और आयोजन की तैयारियां करने लगी. 

लेकिन यह एक बुरे विचार के रूप में सामने आया. जब अगस्त 2015 में मंत्रालय ने इस फैसले की सार्वजनिक घोषणा की तो नैकेरी क्विटल गांव, जहां आयोजन होना है, के लोगों ने विरोध शुरू कर दिया.

जब आयोजन की तैयारियां की जाने लगीं तो 15 फरवरी को प्रदर्शनकारियों ने आयोजनस्थल पर जाने वाले रक्षा वाहनों समेत अन्य वाहनों को रोकना शुरू कर दिया. आयोजन स्थल एक पठार पर है जहां केवल एक संकरे रास्तों से पहुंचा जा सकता है. बुधवार को करीब 300 प्रदर्शनकारियों ने बाड़ लगाने का सामान ले जा रहे तीन ट्रकों को वापस भेज दिया.

प्रदर्शनकारियों ने "जेल भरो" आंदोलन चलाने का फैसला लिया और अब वे राज्यव्यापी बंद की तैयारी कर रहे हैं

अब जब आयोजन में करीब एक माह का वक्त बचा है तब कांग्रेस और अन्य दलों ने भी रास्ते रोकने के इस काम में प्रदर्शनकारियों का साथ देना शुरू कर दिया है. पर्यावरणीय संगठनों द्वारा इस संबंध में गंभीर पारिस्थिकी चिंताएं भी जताई गईं. 

इस घटनाक्रम ने रक्षा मंत्रालय को उलझन में डाल दिया है. डिफएक्सपो में दुनिया भर से बंदूक से लेकर लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनियां शामिल होती हैं. 20 मार्च तक प्रदर्शनी स्थल को इनके हवाले किया जाना है. 

इससे गोवा सरकार भी तमतमा गई है. हाल ही में मुख्यमंत्री पारसेकर ने धमकी भी दी थी कि अगर किसी ने डिफएक्सपो को रोकने की कोशिश की तो उनके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी. इसके जवाब में प्रदर्शनकारियों ने "जेल भरो" आंदोलन चलाने का फैसला लिया और अब वे राज्यव्यापी बंद की तैयारी कर रहे हैं.

क्यों हो रहा है डिफएक्सपो का विरोध?

पठार से कई गंभीर सामाजिक और पारिस्थिकी चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं. ऐतिहासिक रूप से यह ग्रामसमाज की जमीन रही है जिसे चारे, खेती और कुछ वनोपज के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

यहां के अधिकांश निवासी वेलिप और धंगर जनजातियों के आदिवासी हैं. गोवा के अन्य पठारों की ही तरह यह भी, क्षेत्र में भूजल रिचार्जिंग करता है.

डिफएक्सपो के खिलाफ प्रदर्शनकारियों में शामिल एक संगठन फेडरेशन ऑफ रेन्बो वरियर्स (एफआरडब्लू) के मुताबिक इस पठार में भारी मात्रा में जैवविविधता देखी जा सकती है. यहां पर निर्माण किए जाने से इस क्षेत्र के बाघ, तेंदुए, गवल समेत तमाम वन्यजीवों के जीवन पर खतरा मंडराने लगेगा.

वास्तव में अब यह जमीन विवादों का केंद्र बन चुकी है. गोवा सरकार ने इसका अधिग्रहण 2007 में किया था. तब इसका अधिग्रहण फूडपार्क निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण कानून की आपात धारा के तहत किया गया था. यहां के निवासी तब से इसका विरोध करते आ रहे हैं, जबकि उन्हें यहां पर रोजगार देने का वादा किया गया था. लेकिन पार्क आज तक बन नहीं पाया.

वास्तव में अब यह जमीन विवादों का केंद्र बन चुकी है. गोवा सरकार ने इसका अधिग्रहण 2007 में किया था

ऑरिग्त पॉरजेझो आवाज नामक एक संगठन के संचालक फ्रेड्डी फर्नंडीज ने कैच को बताया, "गोवा आईडीसी द्वारा जमीन लिए जाने के तकरीबन एक दशक बीतने के बावजूद अब तक कुछ नहीं किया गया. अब अचानक उन्होंने इसे रक्षा मंत्रालय को सौंप दिया."

कुछ समुदायों ने जमीन का मुआवजा लेने से भी इनकार कर दिया था. उन्होंने इसपर काम जारी रखा और दावा करते हैं कि अभी भी इस पर उन्हीं का अधिकार है.

अब स्थानीय लोगों को डर है कि रक्षा मंत्रालय को यह जमीन सौंपने के लिए डिफएक्सपो एक जरिया भर है.

जमीन से जुड़े सवाल

जहां पर्रिकर ने हाल ही में जोर दिया था कि इस जमीन की जरूरत केवल अस्थायी तौर पर ही है. सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आरटीआई से प्राप्त सूचना का हवाला देते हुए एक पत्र दिखाया जो 12 जून 2015 को पर्रिकर ने मुख्यमंत्री को लिखा था. इसमें पर्रिकर ने समुद्रतट के पास 150 एकड़ जमीन देने का निवेदन किया था ताकि इस स्थान पर डिफएक्सपो और एरो इंडिया (एयरशो) के लिए "स्थायी आयोजन स्थल" बनाया जा सके.

पत्र पाने के एक माह के अंदर ही पारसेकर ने 7 जुलाई को नैकरिम (Naquerim) पर एक जमीन देने का प्रस्ताव दे दिया.

कार्यकर्ताओं ने कहा कि आरटीआई के जरिये प्राप्त सूचना में सरकारी फाइलों में इसके पीछे कोई कारण नहीं दिया गया. इसमें केवल एक चर्चा का ही हवाला दिया गया है जो राज्य के मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिव के बीच सीएम आवास पर जून मध्य में हुई थी.

और इसके लिए कारण बताना जरूरी है क्योंकि जमीन का यही विशेष टुकड़ा देने की मजबूरी समझ से बाहर है. जैसा कि एफआरडब्लू ने बताया कि एयरो इंडिया को 10 हजार फीट रनवे की जरूरत है (पर्रिकर ने भी अपने निवेदन में यही कहा). इसका मतलब निकलता है कि इसके लिए करीब 9 लाख वर्गमीटर जमीन की जरूरत होगी. जबकि मौजूदा जमीन केवल 6 लाख वर्गमीटर ही है.

इसके अलावा यह फैसला 2012 में एयरो इंडिया के लिए वैकल्पिक स्थान तलाश करने के संबंध में बनी विशेषज्ञ समिति की सलाह के भी विपरीत जाता है. समिति ने गोवा को वैकल्पिक स्थान के रूप में स्वीकृति दी थी तब इसके मुताबिक निर्धारित स्थान उत्तरी गोवा का मोपा विलेज होना चाहिए था, न कि मौजूदा स्थल. गौरतलब है कि मोपा में एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा भी प्रस्तावित है.

First published: 25 February 2016, 23:01 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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