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दिल्ली की आंगनवाड़ियों को बदलाव की जरूरत है...

श्रिया मोहन | Updated on: 25 March 2016, 8:35 IST

दिल्ली की आंगनवाड़ियों को तत्काल बदलाव की दरकार है. देश की राजधानी में पूर्व और पश्चिम में फैली सार्वजनिक जमीन पर बसी हुई सबसे बड़ी स्लम बस्तियों के बच्चे सरकार द्वारा संचालित आंगनवाड़ियों पर ही निर्भर रहते हैं और अक्सर कुपोषित होते हैं. पिछले साल नवंबर में क्राई द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार सभी शहरी स्लम बस्तियों के आधे बच्चे कुपोषित हैं.

आंगनवाड़ी योजना महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) के तहत वर्ष 1975 में शुरू की गई थीं. इनका उद्देश्य पका पकाए खाद्य पदार्थों की आपूर्ति कर बच्चों के कुपोषण से लड़ना था. साथ ही इसका मकसद टीकाकरण जैसी आधारभूत स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना और रेफरल सेवा की तरह काम करना था.

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इसके उद्देश्यों में 12वीं पंचवर्षीय योजना में एक और उद्देश्य जोड़ दिया गया. यह था- आंगनवाड़ियो को उन गरीब माता-पिता के बच्चों के लिए डे-केयर सेंटर की तरह काम करना था, जो मजदूरी या अन्य काम करते हैं. ऐसा इसलिए ताकि जब वे काम करने जाएं तो उनके बच्चों को सुरक्षित जगह मिल सके.

बजट में कटौती के चलते आंगनवाड़ी केंद्रों की हालत बहुत बुरी है

कई योजनाओं को उस समय स्थगित करना पड़ा जब वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा वर्ष 2015-16 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बजट में 50 प्रतिशत से भी अधिक की कटौती कर दी गई. इसकी हालत उस समय और बुरी हो गई जब इस वर्ष एकीकृत बाल विकास योजना का बजट सात प्रतिशत घटाकर 14,000 करोड़ पर समेट दिया गया.

ऐसी नीतियों के चलते और जगह की कमी के कारण दिल्ली की आंगनवाड़ियों का दम घुट रहा है. जब इस शहर में किराए दिनों-दिन बढ़ता जा रहा हैं, शहर में एकीकृत बाल योजना की आंगनवाड़ियों का बजट पिछले तीन साल से मात्र 750 रुपए प्रति माह है.

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इतने कम पैसे में जिस तरह की जगह आंगनवाड़ियों को मिल पा रही है, उनमें खुले आंगन, बरामदे, स्लम बस्तियों के घरों में सामने के कमरे या गंदे गोदाम जैसे स्थान शामिल हैं. वहां भूमि स्वामी के सामान बिखरे रहते हैं. ये इतने छोटे-छोटे कमरे होते हैं, जिनका आकार 30 से 40 वर्ग फीट से अधिक नहीं होता. इनमें न पूरी रोशनी आ पाती है और न ही ये हवादार होते हैं. हैरत की बात है कि इतने छोटे-छोटे कमरों में आसपास के क्षेत्र के 30 या इससे भी अधिक बच्चों को बैठाने की अपेक्षा की जाती है.

दिल्ली: एकीकृत बाल योजना की आंगनवाड़ियों का बजट पिछले तीन साल से मात्र 750 रुपए प्रति माह है

जगह की कमी के कारण ही आंगनवाड़ियों का मूल विचार तो त्यागा ही जा चुका है, अब तो ये सिर्फ भोजन वितरण के केंद्र और बीमार बच्चों के लिए रेफरल बूथ बनकर रह गए हैं. जब-तब आशा कार्यकर्ता बच्चों के टीकाकरण की खानापूर्ति और दिखावा करती हैं, लेकिन अब तो यहां के परिवारों को भी यह बात सुनने की आदत हो गई है कि टीकों की आपूर्ति कम है, इस कारण निरंतर टीकाकरण नहीं हो पाता.

मोबाइल क्रेच– आंगनवाड़ी का विकल्प

मोबाइल क्रेच वर्ष 1969 में उस समय लॉन्च हो गए थे, जब आंगनवाड़ी केंद्र अस्तित्व में भी नहीं आए थे. इनकी शुरुआत निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों के बच्चों की दिन में देखभाल के मकसद से एनजीओ के रूप में हुई थी. आज की तारीख में दिल्ली-एनसीआर और मुम्बई में मोबाइल क्रेच 650 का आंकड़ा पार कर चुके हैं. ये 7.5 लाख बच्चों को दिनभर की सुरक्षित देखभाल या आंगनवाड़ी उपलब्ध करा रहे हैं.

मोबाइल क्रेच की शुरुआत निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों के बच्चों की दिन में देखभाल के मकसद से एनजीओ के रूप में हुई थी

उन्होंने निर्माण कार्यों में लगे मजदूरों के बच्चों पर ध्यान देने का निर्णय इसलिए लिया क्योंकि ये सबसे कमजोर होते हैं. माता और पिता दोनों के कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने के कारण उनके लिए अपने बच्चों को भी कंस्ट्रक्शन साइट पर ले जाना मजबूरी हो जाती थी, जिससे वे बच्चे विषाक्त पदार्थों के सम्पर्क में आते थे और उनका खतरा भी बढ़ जाता था.

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गुड़गांव में अंसल एपीआई की कंस्ट्रक्शन साइट पर भी एक मोबाइल क्रेच चलता है जो न सिर्फ खुला है, बल्कि पूरी तरह हवादार और आनंदमयी तरीके से पेंट की गई आंगनवाड़ी है. इसकी दीवारें बच्चों द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स और चार्टों से भरी हुई हैं. यहां के शिक्षक बच्चों को मजेदार खेलों में लगाए रखते हैं और वहां से उत्साह और मजे की खूब चीखें सुनी जा सकती हैं.

यहां बच्चों को खाने में खिचड़ी और उबले अंडे दिए जाते हैं, जिन्हें वे पूरे चाव से चट कर जाते हैं. बाद में जब उनके माता-पिता के आने और उन्हें ले जाने का समय होता है तो उन्हें कालीन गलीचे के बने गद्देदार बिस्तर पर लेटने की छूट दे दी जाती है.

मोबाइल क्रेच पूरी तरह से कंस्ट्रक्शन कंपनी के सहयोग से चलाए जाते हैं, ऐसे में भारत सरकार के सामने सीखने के लिए एक शानदार मॉडल उपलब्ध है. जब देश की राजधानी में बच्चों के खिलाफ अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं तो जरूरत है कि हमारे शहरों के सबसे मासूम और सबसे कमजोर वर्ग यानी बच्चों के लिए आंगनवाड़ी संरक्षण क्षेत्रों के रूप में खड़ी हों.

First published: 25 March 2016, 8:35 IST
 
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