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जब अटल बिहारी ने कहा- मौत से ठन गई... हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा

आदित्य साहू | Updated on: 16 August 2018, 9:01 IST

पूर्व प्रधानमंत्री और वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी की तबीयत पिछले 24 घंटों में बहुत ज्यादा बिगड़ गई है. उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानि एम्स में जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया है. एम्स ने एक बयान जारी कर कहा कि दुर्भाग्यवश, पिछले 24 घंटों में अटल बिहारी वाजपेयी की हालत ज्यादा बिगड़ गई है. उनकी हालत नाजुक है और वह जीवन रक्षक प्रणाली पर हैं.

एम्स ने बताया कि उनकी तबीयत में कोई सुधार नहीं है और आने वाले कुछ घंटे बेहद नाजुक हैं. बता दें कि अटल को किडनी की नली में संक्रमण, छाती में जकड़न, मूत्रनली में संक्रमण आदि के बाद 11 जून को एम्स में भर्ती कराया गया था. अटल बिहारी वाजपेयी डिमेंशिया नामक बीमारी से पीड़ित हैं और वह साल 2009 से ही व्हीलचेयर पर हैं.

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25 दिसंबर 1924 को जन्मे और भारत छोड़ो आंदोलन के जरिए 1942 में भारतीय राजनीति में कदम रखने वाले वाजपेयी 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लखनऊ से लोकसभा सदस्य चुने गए. बतौर प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूर्ण करने वाले वो पहले और अभी तक एकमात्र गैर-कांग्रेसी नेता हैं.

बहुत कम लोगों को पता है कि वह एक बेहतरीन राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक बेहतरीन कवि भी थे. उनकी कई कविताएं आज भी प्रसिद्ध हैं. उऩ्होंने अपने भाषणों में अपनी कविताओं को खूब प्रयोग किया जिसकी वजह से वह एक दमदार वक्ता माने जाते थे. उनकी प्रसिद्ध रचना "हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा" जैसीे कविताओं से सभी के ह्रदय को जीतने वाले अटल बिहारी की कविताओं आज भी हृदय को झकझोर देती हैं. आप भी पढ़िए उनकी कुछ बेहतरीन कविताएं-

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-मौत से ठन गई

ठन गई
मौत से ठन गई.
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?
तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई
मौत से ठन गई

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-हार नहीं मानूंगा, रार नया ठानूंगा

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर ,
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,
 झरे सब पीले पात,
कोयल की कूक रात,
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी?
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा,
रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूं.

First published: 16 August 2018, 8:56 IST
 
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