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दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया IRDA को निर्देश, जेनेटिक डिसऑर्डर को बीमा के दायरे में रखा जाए

कैच ब्यूरो | Updated on: 27 February 2018, 10:44 IST

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि बीमा कंपनी द्वारा जेनेटिक डिसऑर्डर को पॉलिसी के दायरे से बाहर रखना भेदभाव वाला, अस्पष्ट और असंवैधानिक है. दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि स्वास्थ्य के अधिकार में बीमा का इस्तेमाल जरूरी है. दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा की ये संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करता है.

हाई कोर्ट ने इंश्योरेंस रेग्युलेशन डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (आईआरडीए) से कहा है कि वह इंश्योरेंस कॉन्ट्रैक्ट में जेनेटिक डिसऑर्डर को पॉलिसी के दायरे से बाहर रखने के मामले को दोबारा देखे. कोर्ट ने ये भी कहा की आईआरडीए इस बात को सुनिश्चित करें कि कोई भी इंश्योरेंस कंपनी जेनेटिक डिसऑर्डर(अनुवांशिक विकृति) के आधार पर दावे को खारिज न करें.
हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए इंश्योरेंस कपनी को निर्देश दिया है कि वह आवेदक को 5 लाख रुपये और दावे की तारीख से अब तक 12 फीसदी ब्याज का भुगतान करे.

 

क्या है मामला

मौजूदा मामले में एक शख्स ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड से 2000 में 5 लाख की पॉलिसी ली थी. इस दौरान उन्हें इलाज के लिए दो बार 2004 और 2006 में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था और उन्हें इंश्योरेंस कंपनी से मेडिक्लेम मिल गया. फिर वह बीमार हुए और 27 नवंबर से लेकर 30 नवंबर 2011 के बीच अस्पताल में इलाज कराया और इसका खर्च 7 लाख 78 हजार का खर्च आया. लेकिन इस बार दावे को इंश्योरेंस कंपनी ने खारिज कर दिया. क्यूंकि जेनेटिक डिसऑर्डर पॉलिसी के दायरे से बाहर है.

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न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने स्पष्ट रूप से यह माना है कि स्वास्थ्य बीमा का अधिकार स्वास्थ्य सेवा के अधिकार और स्वास्थ्य के अधिकार का एक अभिन्न अंग है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में ये मान्यता प्राप्त है.

याचिकाकर्ता की दलील थी कि जब उन्होंने पॉलिसी ली थी तब ये पॉलिसी के दायरे से बाहर नहीं थी लेकिन बाद में इसे जोड़ दिया गया और इसके लिए उन्हें पहले सूचित नहीं किया गया. निचली अदालत ने इंश्योरेंस कंपनी से कहा था कि वह आवेदक को 5 लाख रुपये का भुगतान करे लेकिन इस फैसले को इंश्योरेंस कंपनी ने चुनौती दी थी. हाई कोर्ट के सामने मुद्दा ये था कि क्या जेनेटिक डिसऑर्डर के नाम पर हेल्थ इंश्योरेंस में भेदभाव हो सकता है?

 

स्वास्थ्य का अधिकार जीवन के अधिकार में शामिल

स्वास्थ्य बीमा का अधिकार स्वास्थ्य सेवा के अधिकार और स्वास्थ्य के अधिकार का एक अभिन्न अंग है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में ये मान्यता प्राप्त है. यह भी माना गया है कि बीमा पॉलिसी में `आनुवांशिक विकारों ‘का विशिष्ट क्लॉज बहुत व्यापक, अस्पष्ट और भेदभावपूर्ण है – इसलिए ये भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है. कोर्ट ने पाया है कि स्वास्थ्य बीमा से सभी रूपों में आनुवंशिक विकारों को बाहर कर बाहर रखा गया तो चिकित्सा बीमा लेने का पूरा उद्देश्य परास्त हो जायेगा.

आनुवंशिक विकार का 'व्यापक बहिष्कार'

बीमा कंपनी और बीमाधारक के बीच केवल एक अनुबंध का मुद्दा ही नहीं है बल्कि स्वास्थय के अधिकार के व्यापक कैनवास में ये फैल जाता है.

First published: 27 February 2018, 10:44 IST
 
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