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मर्सिडीज़ हिट एंड रन: क्या बेटे के अपराध की सज़ा पिता को दी जा सकती है?

सौरव दत्ता | Updated on: 13 April 2016, 8:37 IST
QUICK PILL
  • दिल्ली के सिविल लाइंस में हुए हिट एंड रन मामले में पुलिस ने आरोपी नाबालिग लड़के पिता को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ अपराध के लिए उकसाने और कल्पेबल होमिसाइड का मामला दर्ज किया है.
  • हालांकि अदालत में पुलिस को इस वजह से झाड़ सुननी पड़ी क्योंकि वह इस बात को साबित करने में बुरी तरह विफल रहे कि नाबालिग आरोपी के पिता ने जानबूझकर ऐसी लापरवाही बरती जिससे सिद्धार्थ शर्मा की मौत हुई.

पिता के पापों की सजा बच्चे को नहीं मिलनी चाहिए. यह एक पुरानी कहावत है. क्या इसका उल्टा सोचा जा सकता है. मसलन बच्चे की गलती के लिए पिता को सजा नहीं मिलनी चाहिए? खासकर तब की गई गलती आपराधिक कानून के तहत कठोर सजा की मांग करती हो.

पुलिस की लापरवाही

9 अप्रैल को दिल्ली हिट एंड रन मामले में आरोपी नाबालिग बच्चे के पिता को जमानत देते हुए मजिस्ट्रेट ने कहा कि पुलिस इस बात को साबित करने में बुरी तरफ विफल रही है कि अपराध को उकसाने की कार्रवाई हत्या की तरह थी. 

मामला हिट एंड रन का है जिसमें पुलिस ने मर्सिडीज चला रहे नाबालिग बच्चे की गलती के लिए पिता को गिरफ्तार किया था. दिल्ली के सिविल लाइंस इलाके में हुए इस हादसे में एक व्यक्ति की जान जा चुकी है.

निश्चित तौर पर न्यायिक सुनवाई के दौरान किसी को जमानत भर मिल जाने से पूरे मुकदमे पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन फिर भी यह अहम जरूर है.

32 वर्षीय सिद्धार्थ शर्मा की मर्सिडीज से कुचलकर मारे जाने के पांच दिन बाद तक आरोपी नाबालिग को गिरफ्तार नहीं किए जाने की वजह से  दिल्ली पुलिस की जबरदस्त आलोचना हो चुकी है. शर्मा के परिवार वालों ने नाबालिग आरोपी और उसके पिता की गिरफ्तारी की मांग करते हुए उन्हें कठोर सजा दिए जाने की मांग की थी.

शर्मा के परिवार वालों का कहना था कि नाबालिग आरोपी इससे पहले भी इस तरह के वारदातों को अंजाम दे चुका है लेकिन इसके बावजूद उसके पिता ने उसे गाड़ी चलाने से मना नहीं किया. 

फरवरी महीने में ही इस नाबालिग आरोपी ने सड़क हादसे को अंजाम दिया था. इसके अलावा नाबालिग के पिता को पता था कि 18 साल से कम उम्र के लड़के को गाड़ी चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती लेकिन फिर भी उसने ऐसा किया.

पुलिस अब पिता को गिरफ्तार कर चुकी है और उस पर भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध करने के लिए उकसाने और कल्पेबल होमिसाइड का आरोप लगाया है. दोनों ही धाराएं संगीन हैं और इसके तहत सजा होने पर जेल और जुर्माना दोनों हो सकता है.

जवाबदेही और नियंत्रण

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी उनके माता-पिता पर होती है. लेकिन यह कहना कि बच्चे की हर गलती के लिए सिर्फ और सिर्फ उनके माता और पिता ही जिम्मेदार हैं, सही नहीं होगा.

यह सही है कि पिता ने बेटे को कई मौके पर कार चलाने की अनुमति दी. तो क्या उसे आपराधिक तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

पुलिस ने नाबालिग के पिता को आईपीसी की धारा 109 और 304 के तहत गिरफ्तार किया है. पहला ममाला अपराध के लिए उकसाने का है तो दूसरा मामला कल्पेबल होमिसाइड का है. अब यहां सवाल यह उठता है कि पुलिस अदालत में यह बात कैसे साबित करेगी कि नाबालिग के पिता की तरफ से जान बूझकर की गई लापरवाही की वजह से सिद्धार्थ शर्मा की मौत हुई?

क्या अभियोजन पक्ष यह साबित कर सकता है कि नाबालिग के पिता की वजह से शर्मा की मौत हुई ? ऐसा करना असंभव है.

आरोपी के पिता पर जुर्माना लगाया जा सकता है और इससे कोई इनकार भी नहीं कर रहा लेकिन उसे आपराधिक तौर पर जिम्मेदार ठहराना बेहद गलत है. आपराधिक कानून में किसी व्यक्ति को दोषी साबित करने के लिए मंशा और कार्य को साबित करना होता है.

जहां तक मंशा की बात है तो पिता ने अपने बेटे को किसी की जान लेने के लिए नहीं भेजा. दूसरे देश में ऐसे कानून है जिसकी मदद से बच्चों की गलती के लिए अभिभावक को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. 

शर्मा के परिवार वालों ने कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में बैठकर इस मामले में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने की मांग की. बैठक में  जमा हुए लोेगों ने उन्हें अपना समर्थन देने का वादा किया.

निश्चित तौर पर किसी की मौत उसके परिवार वालों के लिए झटके की तरह होती है. लेकिन विरोध सभा में किसी को दोषी करार दे देना कंगारु कोर्ट की तरह होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पुलिस क्या करतीहै और फिर न्यायालय ऐसी स्थिति बनने का मौका ही क्यों देते हैं. 

First published: 13 April 2016, 8:37 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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